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ड्राइविंग छूटी तो सुशील ने टोफू निर्माण को बनाया स्वरोजगार का जरिया

स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण ड्राइविंग का काम छोड़ने वाले कोटद्वार के मानपुर निवासी सुशील कुमार भट्ट ने परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय स्वरोजगार की राह चुनी। सरकारी योजना और बैंक ऋण का सहारा लेकर उन्होंने टोफू निर्माण की इकाई शुरू की। करीब एक वर्ष पहले शुरू हुई यह इकाई अब स्थानीय बाजार में प्रोटीनयुक्त खाद्य उत्पाद की मांग पूरी करने के साथ एक युवक को रोजगार भी दे रही है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में प्रदेश में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए संचालित योजनाओं के तहत पात्र लोगों को आर्थिक और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है। सुशील की पहल इसी प्रयास का उदाहरण है। ड्राइविंग छोड़ने के बाद वह लंबे समय तक रोजगार के नए विकल्प तलाशते रहे। इसी दौरान उन्हें टोफू निर्माण के बारे में जानकारी मिली। दोस्तों के सहयोग और प्रोत्साहन से उन्होंने इस व्यवसाय को अपनाने का निर्णय लिया।

सुशील ने जिला सहकारी बैंक से पांच लाख रुपये का ऋण लेकर मानपुर में टोफू निर्माण इकाई स्थापित की। प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उन्नयन योजना (पीएमएफएमई) के तहत उन्हें 35 प्रतिशत सब्सिडी का लाभ भी मिला। बैंक ऋण और सरकारी सहायता से मशीनरी लगाने तथा कारोबार शुरू करने में उन्हें मदद मिली। हालांकि शुरुआती दौर में बाजार तैयार करने, ग्राहकों तक उत्पाद पहुंचाने और कारोबार को स्थापित करने जैसी कई चुनौतियां सामने आईं।

सुशील ने इन चुनौतियों का सामना करते हुए उत्पाद की गुणवत्ता और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया। धीरे-धीरे स्थानीय लोगों में उनके उत्पाद की पहचान बनने लगी और टोफू की मांग बढ़ने लगी। वर्तमान में आधुनिक मशीनों और तकनीक की मदद से सोयाबीन और मूंगफली के दूध से टोफू तैयार किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर बढ़ती मांग के कारण उन्हें प्रतिमाह करीब 15 से 20 हजार रुपये की आय हो रही है।

इस इकाई से गौरव बड़थ्वाल भी जुड़े हैं। गौरव पहले दुबई के एक होटल में काम करते थे। कोरोना काल के बाद वह वापस लौटे, लेकिन दोबारा विदेश जाकर काम करने का अवसर नहीं मिल सका। ऐसे में टोफू निर्माण इकाई उनके लिए अपने घर के पास रोजगार का माध्यम बन गई। गौरव के अनुसार टोफू प्रोटीनयुक्त खाद्य उत्पाद है और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण इसकी मांग भी बढ़ रही है। उनका मानना है कि स्थानीय स्तर पर ऐसी छोटी इकाइयां स्थापित होने से युवाओं को अपने क्षेत्र में ही रोजगार मिल सकता है।

उद्योग विभाग के अधिकारियों के अनुसार पीएमएफएमई योजना छोटे और घरेलू खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को प्रोत्साहित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को निर्धारित प्रावधानों के अनुसार वित्तीय सहायता और अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। इससे स्थानीय संसाधनों और उपलब्ध अवसरों का उपयोग करते हुए नए उद्यम खड़े करने में मदद मिलती है।

पीएमएफएमई के माध्यम से अरसा, रोट, पापड़, चिप्स, गन्ने के जूस, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों से संबंधित गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं। सुशील कुमार भट्ट की कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, बैंकिंग सहयोग और सरकारी योजना का लाभ लेकर रोजगार की तलाश करने वाला व्यक्ति खुद रोजगार देने वाला भी बन सकता है। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में उत्पाद की बिक्री बढ़ाने और अधिक ग्राहकों तक पहुंच बनाने पर ध्यान दिया जाएगा। स्थानीय बाजार में मांग बढ़ने से छोटे उद्यमियों के लिए संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

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Hill Mail

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