Friday , 4 September 2026
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मोदी-शाह-डोभाल का ‘मिशन कश्मीर’

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 की विदाई का प्लान पॉवर कॉरिडोर की शीर्ष हस्तियों के बीच लोकसभा चुनाव से पहले ही आ चुका था। इस मुद्दे पर असल काम जून 2019 के दूसरे सप्ताह में शुरू हुआ। लोकसभा चुनाव में मिले प्रचंड बहुमत के बादप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जल्द से जल्द इस प्लान को अमलीजामा पहनाना चाहते थे। पीएम मोदी ने ‘मिशन कश्मीर’ की बागडोर एनएसए अजीत डोभाल को सौंपी और उन्होंने अपने अनुभव और रणनीतिक सूझबूझ से ऐसा खाका तैयार किया कि किसी को कानोंकान भनक तक नहीं लगी।

हिल-मेल ब्यूरो, श्रीनगर

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के इतिहास में ऐतिहासिक अध्याय जोड़ दिया है। जम्मू-कश्मीर अब केंद्र शासित (यूटी) प्रदेश है। लद्दाख क्षेत्र को अलग यूटीबना दिया गया है। पिछले सत्तर साल से जिस अनुच्छेद 370 के तहत घाटी को विशेषाधिकार मिले थे, उसे एक ही मास्टरस्ट्रोक से बेअसर कर दिया गया। अनुच्छेद 370 को हटाने का फैसला जितना अप्रत्याशित है, इसके पीछे की तैयारियां उतनी ही दिलचस्प हैं। बहुत ही पेशेवर तरीके से इस फैसले को अमलीजामा पहनाने  का रणनीतिक खाका खींचा गया। सभी सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय कर ऐसी पुख्ता रणनीति बनाई गई कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं लगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के एजेंडे में अनुच्छेद 370 को हटाना हमेशा से प्राथमिकता में था। मोदी-शाह की मजबूत इच्छाशक्ति वाले इस ऐतिहासिक फैसले को अमलीजामा पहनाने में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की भूमिका अहम रही। यही वजह है कि इसे ‘एमएसडी’ यानी मोदी, शाह, डोभाल का ‘मिशन कश्मीर’ कहा गया। इस एक रणनीतिक चाल की बदौलत कश्मीर में अलगाववादी सदमे में चले गए। अनुच्छेद 370 के हिमायती सियासी सूरमा हैरान-परेशान हैं और पाकिस्तान बौखलाया हुआ है। उसे कुछ नहीं सूझ रहा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में अजीत डोभाल ऐसा बहुत कुछ कर चुके हैं कि अब जब भी देश की आंतरिक सुरक्षा और रणनीतिक तैयारियों की बात होगी अजीत डोभाल का जिक्र होगा और उनके तौर-तरीकों की नजीर दी जाएगी। यह एक ऐसा फैसला है, जो भारत को नई दिशा देने वाला है। अनुच्छेद-370 पर प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से हरी झंडी मिलने के बाद सरकारी अधिकारी और ब्यूरोक्रेसी ग्राउंड वर्क में जुट गई थी। केंद्र जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर ये आकलन करने में लग गया कि अगर इस फैसले को लागू करने के बाद कुछ अनहोनी होती है तो उससे कैसे निपटा जाएगा।

लोकसभा चुनाव से पहले ही बन चुकी थी रणनीति

दरअसल, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 की विदाई का प्लान पॉवर कॉरिडोर की शीर्ष हस्तियों के बीच लोकसभा चुनाव से पहले ही आ चुका था। इस मुद्दे पर असल काम जून 2019 के दूसरे सप्ताह में शुरू हुआ। लोकसभा चुनाव के बाद प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने वाली भाजपा जल्द से जल्द इस प्लान को अमलीजामा पहनाना चाहती थी। योजना के अनुसार, जून के दूसरे सप्ताह में अमित शाह कश्मीर दौरे पर गए। इस दौरान गृह मंत्री ने सीनियर नौकरशाहों और सेना के बड़े अधिकारियों से लंबी बातचीत की।

सभी प्रमुख लोगों को दी अहम जिम्मेदारी

डोभाल ने मुख्य लोगों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी। इसमें राज्य के चीफ सेक्रेटरी बीआर सुब्रह्मण्यम, पुलिस प्रमुख दिलबाग सिंह, जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के सलाहकार के विजय कुमार और कश्मीर घाटी में 15वीं कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लन शामिल थे। चीफ सेक्रेटरी सुब्रह्मण्यम को जम्मू-कश्मीर और प्रधानमंत्री कार्यालय के बीच समन्वय का जिम्मा दिया गया था।उन्होंने राज्य में खाद्य आपूर्ति का काम भी देखा, ताकि पाबंदियां झेल रहे लोगों को किसी प्रकार की दिक्कत न आए।

 

जम्मू कश्मीर पुलिस महकमे के प्रमुख दिलबाग सिंह ने संदिग्ध पुलिस अधिकारियों को पहचानने और उनके मंसूबों को नाकाम करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने पुलिस बल के जवानों को जमीन पर रहकर प्रेरित किया। सेना और अर्द्धसैनिक बलों के साथ तालमेल बनाए रखा। ताकि हर स्तर पर इंटेलिजेंस इनपुट का आदान-प्रदान हो सके।

कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन को मौत के घाट उतारने वाले विजय कुमार को राज्यपाल शासन के अंतर्गत सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा सौंपा गया। अर्द्धसैनिक बलों और प्रदेश के पुलिस अधिकारियों के बीच सामंजस्य बिठाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर रही। जम्मू कश्मीर की जेलों में बंद आतंकियों को देश के दूर दराज के इलाकों में भेजने का बड़ा काम भी उन्हीं की देखरेख में हुआ।

कश्मीर में पुराने अनुभव से हुआ फायदा

अनुच्छेद 370 को हटाने की रणनीति बनाने में एनएसए अजीत डोभाल को अपने कश्मीर के अनुभव से भी फायदा मिला। इंटेलिजेंस ब्यूरो के अतिरिक्त निदेशक के पद पर रहने के दौरान उन्होंने कश्मीर घाटी में काफी काम किया। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद के हालात को संभालने के लिए उनके आईबी के दिनों के कई पुराने साथी भी मददगार साबित हुए। उनके संपर्कों से इस फैसले को लागू करने में काफी मदद मिली।

डोभाल का सीक्रेट श्रीनगर दौरा

जब जम्मू-कश्मीर और केंद्र करगिल युद्ध की 20वीं वर्षगांठ मनाने में व्यस्त थे, उसी दौरान एनएसए अजीत डोभाल ने 23 और 24 जुलाई को श्रीनगर का सीक्रेट दौरा किया। इस ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए अजीत डोभाल तब तक आर्मी, एयर फोर्स, एनटीआरओ, आईबी, रॉ, अर्द्धसैनिक बलों और राज्य की ब्यूरोक्रेसी के साथ सामंजस्य बना चुके थे। एनएसए ने इस प्लान को लागू करने के लिए बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर जुटाए।

 

20 ड्रोन के लाइवफुटेज से निगरानी

इस योजना को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए पाकिस्तान की ओर से सतर्क रहना बेहद जरूरी था। एनएसए ने सर्विलांस और टोही विमानों की मदद ली और बॉर्डर, एलओसी, पीओके पर लगातार निगरानी रखी गई। आतंकवादियों और अलगाववादियों की गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए 20 ड्रोन के लाइव फुटेज की मदद ली गई। ये ड्रोन एलओसीऔर अमरनाथ यात्रा पर रूट की निगरानी कर रहे थे। एयर फोर्स को बिना कारण बताए कहा गया कि वो देश के अलग-अलग ठिकानों से अर्द्धसैनिक बलों के मूवमेंट के लिए 10 सी-17 और 6 सी-130J विमानों को मुहैया कराए। पिछले सप्ताह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सेना प्रमुख और एयर फोर्स प्रमुख से सीधे बात की और उन्हें सेनाओं को तैनात करने का आदेश दिया। इसके साथ ही उन्हें ट्रांसपोर्ट सुविधा को तैयार रखने को कहा गया।

2000 सैटेलाइट फोन का नेटवर्क

पुलिस और सेना को कहा गया कि उनके पास जितने भी सैटेलाइट फोन हैं सभी को जमा किया जाए। आखिरकार 2000 सैटेलाइट फोन को सेना के अफसरों और राज्य सरकार के अफसरों के बीच बांटा गया ताकि इस फैसले को लागू करने के बाद जरूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल किया जाए। घाटी में लगभग 45 हजार जवान तैनात किए गए। इस पूरी कवायद के दौरान एनएसए और उनकी टीम ने पूरी गोपनीयता बनाए रखी। मीडिया और लोगों को इस दौरान जो एकमात्र जानकारी मिली वो ये थी कि कश्मीर में सुरक्षाबलों की भारी संख्या में तैनाती हो रही है। इस दौरान इजरायली ड्रोन को भी पीर पंजाल रेंज में भेजा गया ताकि जरूरत पड़ने पर भीड़ को काबू करने में इसका इस्तेमाल किया जा सके।

अलर्ट पर रहा काउंटर टेररिज्म ग्रिड

श्रीनगर एयरपोर्ट से सुखोई-30 और मिराज-2000 लड़ाकू विमानों ने दर्जनों उड़ानें भरीं। एनएसए अजीत डोभाल ने काउंटर टेररिज्म ग्रिड के अधिकारियों के साथ बैठक की और प्लान पर विस्तृत चर्चा की, ताकि योजना को लागू करने के बाद आतंकी हमलों की सूरत में इसका जवाब तैयार रखा जा सके। इस बीच, सरकार ने सेना को एलओसी के पास मौजूद आतंकी कैंपों पर जोरदार जवाबी कार्रवाई की अनुमति दे दी। सेना ने पाक फायरिंग का जवाब देने के लिए बोफोर्स तोप का इस्तेमाल किया।

जम्मू-कश्मीर में एनएसए की मीटिंग के दौरान ही अमरनाथ यात्रा में कटौती का फैसला लिया गया। इसी बैठक में एनएसए ने सुझाव दिया कि जम्मू-कश्मीर से सभी सैलानियों को बाहर निकलने को कहा जाए। इस बैठक में अर्द्धसैनिक बलों की 100 और कंपनियों को वहां भेजने का फैसला लिया गया। इसका इस्तेमाल बैक-अप के रूप में करने पर सहमति बनी। इस दौरान सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत हर उस स्थान पर गए और सुरक्षा इंतजामों का जायजा लिया जहां इस योजना को लागू करने के बाद सुरक्षा संबंधी चिंता पैदा हो सकती थी।

अमित शाह ने संभाला सियासी मिशन

रणनीतिक तैयारी के बाद इस मिशन को शुरू करने और सियासी अंजाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने हाथ में ले ली। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद इस फैसले से जुड़े सभी कानूनी पहलुओं की समीक्षा एक कोर टीम के साथ कर रहे थे। इस टीम में कानून और न्याय सचिव आलोक श्रीवास्तव, अतिरिक्त सचिव लॉ (होम) आर एस वर्मा, एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल, गृह सचिव राजीब गौबा और कश्मीर पर उनकी टीम के लोग शामिल थे। सेना प्रमुख, खुफिया एजेंसियों के प्रमुख और केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के प्रमुख भी चौबीसों घंटे गृह सचिव सचिव और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव के साथ संपर्क में थे।

चार अगस्त को शुरू हुआ काउंटडाउन

चार अगस्त की रात को जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव ने राज्य के डीजीपी दिलबाग सिंह को कई एहतियाती कदम उठाने को कहा। इसमें कश्मीरी नेताओं की नजरबंदी और गिरफ्तारी, मोबाइल सेवाओं को बंद करना, लैंडलाइन टेलीफोन सेवाओं की सुविधा खत्म करना, धारा-144 लागू करना और कर्फ्यू लागू करने के लिए ड्रिल करना शामिल था। हर कदम को बाकायदा प्लान के साथ तय किया गया। चार अगस्त को फैसला हुआ कि पांच अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक होगी और इस मिशन की जानकारी मंत्रिमंडल के सदस्यों को दी जाएगी और प्रस्ताव पास किया जाएगा। इसके बाद जम्मू-कश्मीर से जुड़े संकल्पों और विधेयकों को पहले राज्यसभा और फिर लोकसभा में पेश किया जाएगा। इसी तरह कानून मंत्रालय को जिम्मा दिया गया कि अनुच्छेद-370 को खत्म करने से जुड़ी अधिसूचना राष्ट्रपति भवन द्वारा ठीक समय पर जारी की जा सके।

डोभाल के‘हीलिंग टच’से विरोधी भी हैरान

इस ऐतिहासिक फैसले के लागू करने के लिए जम्मू-कश्मीर में कई तरह की पाबंदियां लगानी पड़ीं। लद्दाख और जम्मू क्षेत्र में हालात तेजी से सामान्य हुए। कश्मीर घाटी में स्थिति सामान्य रही। पहले जुमा और फिर ईद का त्यौहार शांति से निपटा। घाटी में अब भी सुरक्षाबल तैनात हैं, लोगों के मन में कई सवाल हैं। हालांकि इन सभी तरह के सवालों के जवाब के तौर पर एनएसए डोभाल कश्मीर में ही डटे रहे। एनएसए डोभाल मोदी सरकार में कैबिनेट रैंक की हैसियत रखते हैं। सुरक्षा के मसलों पर प्रधानमंत्री मोदी डोभाल पर भरोसा करते हैं, ऐसे में वहां पर उनकी मौजूदगी काफी अहम रही। अजीत डोभाल ने वहां लगातार अधिकारियों से मुलाकात की। बदलाव के दौर में उन्होंने खुद पूरी व्यवस्था का जमीनी जायजा लिया।‘हीलिंग टच’ की पहल के साथ एनएसए डोभाल आम लोगों के बीच गए। खास बात यह है कि उन्होंने अपनी इस कोशिश को आतंक का गढ़ कहे जाने वाले दक्षिण कश्मीर के शोपियां से आगे बढ़ाया। तमाम पाबंदियों के बीच वह लोगों से मिले। उनका हालचाल जाना और सड़क पर ही उनके साथ खाना खाया। इस कवायद का मकसद घाटी में रह रहे लोगों के बीच केंद्र सरकार के इस फैसले के प्रति भरोसा जगाना था। शोपियां में आम लोगों के साथ भोजन करने के बाद डोभाल वहां के पुलिस अधिकारियों से मिले। अजीत डोभाल ने सुरक्षा बल के जवानों से भी मुलाकात की और सुरक्षा का हाल जाना। वह अनंतनाग में आम लोगों से मिले और उनकी परेशानियां समझने की कोशिश की। डोभाल ने पुलवामा और अवंतीपुरा जिले का भी दौरा किया। ईद के दिन डोभाल अपनी पूरी टीम के साथ श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में पहुंचे। इन इलाकों में सौरा, पंपोर, लाल चौक और हजरतबल शामिल हैं। सौरा श्रीनगर का वो इलाका है जहां पहले भारत विरोधी प्रदर्शन हुआ करते थे। डोभाल की यह ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ सोच चर्चा का विषय बन गई।

पीएम मोदी का ट्वीट

जम्मू-कश्मीर, लद्दाख नई सुबह, एक बेहतर कल के लिए तैयार…

ऐतिहासिक क्षण। एकता और अखंडता के लिए सारा देश एकजुट। जय हिंद! हमारे संसदीय लोकतंत्र के लिए यह एक गौरव का क्षण है, जहां जम्मू-कश्मीर से जुड़े ऐतिहासिक बिल भारी समर्थन से पारित किए गए हैं।

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मैं जम्मू-कश्मीर की बहनों और भाइयों के साहस और जज्बे को सलाम करता हूं। वर्षों तक कुछ स्वार्थी तत्वों ने इमोशनल ब्लैकमेलिंग का काम किया, लोगों को गुमराह किया और विकास की अनदेखी की। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख अब ऐसे लोगों के चंगुल से आजाद है। एक नई सुबह, एक बेहतर कल के लिए तैयार है!

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ये कदम जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के युवाओं को मुख्यधारा में लाएंगे, साथ ही उन्हें उनके कौशल और प्रतिभा को प्रदर्शित करने के अनगिनत अवसर प्रदान करेंगे। इससे वहां के इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार होगा, व्यापार-उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, रोजगार के नए अवसर बनेंगे और आपसी दूरियां मिटेंगी।

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लद्दाख के लोगों को विशेष रूप से बधाई! मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने की उनकी दशकों पुरानी मांग आज पूरी हो गई है। इस फैसले से लद्दाख के विकास को अभूतपूर्व बल मिलेगा। लोगों के जीवन में समृद्धि और खुशहाली आएगी।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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