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वैदिक मंत्रोच्चार के बीच खुले बद्रीनाथ के कपाट

चमोली जिले में स्थापित हिंदुओं के सर्वोच्च तीर्थ भगवान विष्णु के बैकुंठ धाम बद्रीनाथ मंदिर के कपाट रविवार को ग्रीष्म काल के लिए बर्फ की फुहारों के बीच खोल दिए गए। इस अवसर पर हजारों की संख्या में पहुंचे तीर्थयात्रियों ने भगवान बद्रीनाथ व अखंड

चमोली जिले में स्थापित हिंदुओं के सर्वोच्च तीर्थ भगवान विष्णु के बैकुंठ धाम बद्रीनाथ मंदिर के कपाट रविवार को ग्रीष्म काल के लिए बर्फ की फुहारों के बीच खोल दिए गए। इस अवसर पर हजारों की संख्या में पहुंचे तीर्थयात्रियों ने भगवान बद्रीनाथ व अखंड ज्योति के दर्शन किए।

आधिकारिक सूत्रों ने यहां बताया कि बद्रीनाथ के कपाट रविवार तड़के चार बजे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच आम लोगों के दर्शन के लिए खोल दिए गए। इस अवसर पर प्रमुख रूप से रिलायंस समूह के चेयरमैन व उद्योगपति अनिल अंबानी और कारपोरेट लाबिस्ट नीरा राडिया सहित तमाम प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित थे।

जिस समय मंदिर के कपाट खोले गए, उस समय पूरे क्षेत्र में बर्फबारी हो रही थी लेकिन इसके बावजूद हजारों की संख्या में श्रृद्धालु मौके पर उपस्थित थे। भगवान बद्रीनाथ के जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा था।

बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी रावल केशव नंबूरी ने कपाट खोलने और पूजा करने की परम्परा का निर्वाह किया। बद्रीनाथ भगवान की पूजा के दौरान परंपरागत ढंग से उनके विग्रह पर तिल का तेल लगाने और अखंड दीपक जलाने के लिए तेल पेर कर उसे रखने वाले बर्तन श्गाडू घड़ी को टिहरी के राजदरबार से लेकर बद्रीनाथ के लिए कल पहुंचा दिया गया था।

मंदिर में लंबी लंबी लाइनों से लोगों को निजात दिलाने के लिए यात्रियों के पंजीकरण की व्यवस्था शुरू की गई है। यात्रियों का पंजीकरण करने के बाद उन्हें दर्शन के लिए समय दिया जा रहा है, ताकि वे लाइन में खड़े रहने से बच जाएं।

मंदिर के मुख्य कार्याधिकारी बीडी सिंह ने बताया कि यात्रियों का पहले आओ पहले पाओ के आधार पर पंजीकरण कराया जा रहा है, जिससे यात्रियों को मंदिर के प्रवेश द्वार पर दर्शनों के लिए निर्धारित समय दिया जा रहा है और उस समय पर आकर यात्री दर्शन कर रहे हैं।

सिंह ने बताया कि करीब दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ धाम में रविवार को एक आकलन के अनुसार पांच हजार श्रद्धालुओं ने बद्रीनाथ के दर्शन किए।

हिंदुओं को सर्वोच्च तीर्थ

बद्रीनाथ मंदिर, जिसे बद्रीनारायण मंदिर भी कहते हैं, अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है। यह हिंदुओं के चार धाम में से एक धाम भी है। ऋषिकेष से यह 294 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।

बद्रीनाथ उत्तर दिशा में हिमालय की अधित्यका पर हिंदुओं का मुख्य यात्राधाम माना जाता है। मंदिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखंड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। यह भारत के चार धामों में प्रमुख तीर्थ है। प्रत्येक हिंदू की यह कामना होती है कि वह बद्रीनाथ का दर्शन एक बार अवश्य ही करे। यहां पर शीत के कारण अलकनंदा में स्नान करना अत्यन्त ही कठिन है। अलकनंदा के तो दर्शन ही किये जाते हैं। यात्री तप्तकुंड में स्नान करते हैं। वनतुलसी की माला, चले की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

कथा

बद्रीनाथ की मूर्ति शालग्रामशिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। कहा जाता है कि यह मूर्ति देवताओं ने नारदकुंड से निकालकर स्थापित की थी। सिद्ध, ऋ,षि मुनि इसके प्रधान अर्चक थे। जब बौद्धों का प्राबल्य हुआ तब उन्होंने इसे बुद्ध की मूर्ति मानकर पूजा आरंभ की। शंकराचार्य की प्रचारयात्रा के समय बौद्ध तिब्बत भागते हुए मूर्ति को अलकनंदा में फेंक गए। शंकराचार्य ने अलकनंदा से पुनः बाहर निकालकर उसकी स्थापना की। तदनंतर मूर्ति पुनः स्थानांतरित हो गई और तीसरी बार तप्तकुंड से निकालकर रामानुजाचार्य ने इसकी स्थापना की।

मन्दिर में बद्रीनाथ की दाहिनी ओर कुबेर की मूर्ति है। उनके सामने उद्धवजी हैं तथा उत्सवमूर्ति है। उत्सवमूर्ति शीतकाल में बरफ जमने पर जोशीमठ में ले जायी जाती है। उद्धवजी के पास ही चरणपादुका है। बायीं ओर नर-नारायण की मूर्ति है। इनके समीप ही श्रीदेवी और भूदेवी है।

पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई, तो यह 12 धाराओं में बंट गई। इस स्थान पर मौजूद धारा अलकनंदा के नाम से विख्यात हुई और यह स्थान बद्रीनाथ, भगवान विष्णु का वास बना। भगवान विष्णु की प्रतिमा वाला वर्तमान मंदिर 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और माना जाता है कि आदि शंकराचार्य, आठवीं शताब्दी के दार्शनिक संत ने इसका निर्माण कराया था। इसके पश्चिम में 27 किमी की दूरी पर स्थित बद्रीनाथ शिखर कि ऊंचाई 7,138 मीटर है। बद्रीनाथ में एक मंदिर है, जिसमें बद्रीनाथ या विष्णु की वेदी है। यह 2,000 वर्ष से भी अधिक समय से एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान रहा है।

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