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जैविक एवं प्राकृतिक खेती में अंतर

प्राकृतिक खेती पद्धति में देशी बीज, देशी गाय का गोबर, गौमूत्र, वनस्पति अर्क का उपयोग होता है तथा मिट्टी के स्वास्थ्य को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। प्राकृतिक प्रक्रियाओं, जैसे आच्छादन (पेड़ पौधों के अवशेष) व जीवामृत के प्रयोग से मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और देशी केंचुओं के माध्यम से पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रोत्साहित किया जाता है। जिससे बाहरी आदानों पर निर्भरता शून्य या कम होती है।

डा. राजेन्द्र कुकसाल

जैविक खेती और प्राकृतिक खेती दोनों ही कृत्रिम / सेंथेटिक रसायन मुक्त खेती के तरीके हैं, लेकिन खेती की इन दोनों पद्धतियों में महत्वपूर्ण भिन्नताएं हैं।

1- जैविक खेती विदेशी पद्धति है जिसमें बाहरी चीजों जैसे प्रमाणित बीज, कम्पोस्ट खाद, गोबर की खाद, केंचुएं आइसीनिया फेटिडा (Eisenia Fetida) की खाद, जैविक उर्वरक, जैविक पेस्टीसाइड व अन्य स्वीकृत जैविक आदानों का उपयोग किया जाता है।

प्राकृतिक खेती ईश्वरीय व्यवस्था है, प्रकृति ने जीव जन्तु पेड़ पौधे सभी के जीवन यापन की सुदृढ़ व्यवस्था की है। जंगल में खड़े बड़े बड़े वृक्ष बिना मानवीय सहायता के हरे भरे व स्वस्थ रहते हैं, यदि इन वृक्षों की पत्तियों का किसी भी प्रयोग शाला में परीक्षण करवाते हैं तो इन में किसी भी प्रकार से पोषक तत्वों की कोई कमी नहीं मिलती इन वृक्षों ने सारे पोषण तत्व प्रकृति से ही लिये है प्राकृतिक खेती में किये जाने वाले कृषि कार्यों में प्रकृति के सिद्धांतों / नियमों का अनुपालन करने का प्रयास किया जाता है।

सबसे पहले जापान के किसान व दार्शनिक मसानोबू फुकुओका (Masanobu Fukuoka) ने 1975 में एक पुस्तक, द वन-स्ट्रॉ रेवोल्यूशन The One – Straw Revolution में प्राकृतिक कृषि पद्धति का वर्णन किया है।

दुनिया में प्राकृतिक खेती के कई माड्यूल है किन्तु अपने देश में पद्मश्री सुभाष पालेकर का जीरो बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) माड्यूल प्रचलन में है तथा मान्यता प्राप्त है। यह एक स्वदेशी पद्धति है जिसमें बाहरी निवेशों के बिना प्राकृतिक / आध्यात्मिक तरीके से खेती की जाती है।

ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF) ज्ञान विज्ञान व आध्यात्म पर आधारित है। ज्ञानेन्द्रिया से प्राप्त जानकारी / अनुभव ज्ञान हुआ जो घटित हुआ उसे प्रयोग एवं तार्किक तरीके से समझने को विज्ञान कहते हैं ज्ञान एवं विज्ञान की अपनी सीमाएं हैं उससे आगे आध्यात्म। प्रकृति के माध्यम से ईश्वर को / उसकी शक्तियों को पहिचानना या अनुभव करना आध्यात्म है।

भारतीय दर्शन / अध्यात्म के अनुसार प्रत्येक जीव का शरीर पंच भूत या पांच तत्वों से बना है पृथ्वी, आकाश, जल, वायु और अग्नि (सूर्य)। आयु पूर्ण करने पर या नष्ट होने पर फिर इन्हीं पांच तत्वों में विलीन हो जाते हैं जहां से आया वहीं चला गया इस प्रकार यह खाद्य चक्र चलता रहता है।

100 किलो ग्राम हरी फसल को यदि पूरी तरह सुखाते हैं तो 22 किलो ग्राम सूखी घास प्राप्त होती है याने 78 % पानी निकल गया यदि इस 22 किलो ग्राम सूखी घास को जलाते हैं तो 1.5 किलो ग्राम राख प्राप्त होती है याने 20.5% अग्नी व वायु के रूप में वायु मंडल में समा गयी मात्र 1.5 % भूमि में मिला।

पेड़ पौधे 98% अपना भोजन / पोषण हवा पानी व सूर्य के प्रकाश से प्राप्त कर लेते हैं शेष 2 % पोषण अच्छी स्वस्थ भुरभुरी मिट्टी में उपलब्ध जीवाणुओं की सहायता से प्राप्त कर लेते हैं। पेड़ पौधे की हरी पत्तियां सूर्य के प्रकाश में वायु मंडल की कार्बन डायआक्साइड व पानी के सहयोग से प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं तथा पोषक तत्व भूमि से लेते हैं। भूमि में सभी आवश्यक पोषक तत्वों का भंडार उपलब्ध है जड़ों द्वारा इन पोषक तत्वों को अवशोषित कर पत्तियों तक पहुंचता है।

शाकाहारी जीव जंतु वनस्पति पर निर्भर रहती है तथा मांसाहारी जीव जंतु शाकाहारी जीव जंतुओं पर इस प्रकार प्रकृति ने सभी जीवों के भरण पोषण हेतु एक सुदृढ़ खाद्य चक्र की व्यवस्था की हुई है।

प्राकृतिक खेती पद्धति में देशी बीज, देशी गाय का गोबर, गौमूत्र, वनस्पति अर्क का उपयोग होता है तथा मिट्टी के स्वास्थ्य को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है। प्राकृतिक प्रक्रियाओं, जैसे आच्छादन (पेड़ पौधों के अवशेष) व जीवामृत के प्रयोग से मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और देशी केंचुओं के माध्यम से पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रोत्साहित किया जाता है। जिससे बाहरी आदानों पर निर्भरता शून्य या कम होती है।

मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों की आबादी ही मृदा के स्वास्थ्य को निर्धारित करतें हैं। मृदा को अभी तक एक निर्जीव भौतिक वस्तु मात्र माना जाता था। किन्तु वास्तव में मृदा एक जीवित क्रियाशील तंत्र है, जिसके अपने जैविक रसायनिक और भौतिक गुण होते हैं। इनमें से किसी एक के भी परिवर्तन अथवा बदलाव होने से मृदा के मूल भूत स्वरूप एवं स्वभाव में परिवर्तन ला देता है। मृदा स्वास्थ्य पोषण सुरक्षा का एक मूल भूत घटक है। यह उत्पादित आहार की गुणवत्ता और मात्रा को भी प्रभावित करता है।

2- जैविक खेती में उत्पादों के प्रमाणीकरण हेतु तीसरे पक्ष की आवश्यकता होती है जैविक उत्पाद प्रमाणीकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा यह सुनिश्चित किया जाता है कि किसी उत्पाद को जैविक रूप से उगाया गया है, संसाधित किया गया है, और प्रमाणित किया गया है। यह एक तृतीय-पक्ष सत्यापन प्रक्रिया है जो यह सुनिश्चित करती है कि उत्पाद जैविक मानकों का पालन करता है। भारत में The National Programme for Organic Production (NPOP) जैविक उत्पादन का राष्ट्रीय कार्यक्रम, यूरो रेगुलेशन के मानकों एवं International Federation of Organic Agriculture Movements ( IFOAM) जैविक कृषि आंदोलन का अंतरराष्ट्रीय फेडरेशन की निर्देशिका को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority (APEDA) को देश में एनपीओपी कार्यक्रम हेतु कार्यदाई संस्था बनाया गया है। यदि कोई कृषक / कृषक समूह / उत्पादक अपने जैविक उत्पाद का निर्यात करना चाहता है तो उसे, APEDA द्वारा मान्यता प्राप्त एजेंसी के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य है। उत्तराखंड में एपीडा द्वारा उत्तराखंड बीज एवं जैविक उत्पाद प्रमाणीकरण एजेंसी को जैविक उत्पाद प्रमाणीकरण हेतु अधिकृत किया गया है।

जबकि प्राकृतिक खेती में प्रमाणीकरण इसके लिए किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है इस पद्धति में उत्पादक / किसान व उपभोक्ता का आपसी विश्वास होता है।

3- जैविक खेती में पोषण हेतु अधिक मात्रा में जैविक / जीवांश / कम्पोस्ट खादों व अन्य निवेशों की आवश्यकता होती है जिससे लागत बहुत अधिक आती है जबकि ज़ीरो बजट प्राकृतिक खेती में जीवामृत, आच्छादन से मिट्टी में उपस्थित जीवाणुओं एवं केंचुओं को सक्रिय कर मिट्टी के स्वास्थ्य को बढ़ाने पर जोर दिया जाता है जिसमें लागत बहुत कम आती है साथ ही अन्तरवर्तीय फसलें उगा कर याने मुख्य फसल की लागत का मूल्य सह फसल उत्पादन कर निकालने के प्रयास किए जाते हैं।

जैविक खेती एक विशिष्ट प्रणाली है जो रासायनिक आदानों को हटाती है, जबकि प्राकृतिक खेती एक व्यापक दृष्टिकोण है जो ज्ञान विज्ञान प्रकृति व आध्यात्म पर आधारित है जिसमें प्राकृतिक संसाधनों और प्रक्रियाओं का उपयोग करके खेती की जाती है।

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