चैत्र मास की संक्रांति को आयोजित होने वाले उत्तराखंड के लोक पर्व फूलदेई के अवसर पर भराड़ीसैंण स्थित विधानसभा भवन में बड़ी संख्या में क्षेत्र के बच्चों ने पारम्परिक मांगल गीतों के साथ रंग-बिरंगे प्राकृतिक पुष्पों की वर्षा की।
बच्चों के साथ विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खण्डूड़ी, कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, डॉ. धनसिंह रावत, सौरभ बहुगुणा, डॉ. प्रेम चन्द अग्रवाल, विधायक अनिल नौटियाल आदि ने बच्चों से भेंट कर अपनी लोक संस्कृति एवं लोक परम्पराओं से जुड़ने के लिए उनका उत्साह वर्धन किया।

विधान सभा अध्यक्ष के साथ सभी ने इस पावन पर्व की बधाई देते हुए कहा कि हमारे पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने तथा उसके संरक्षण का संदेश देते हैं। अपनी लोक परम्पराओं एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संजोये रखने की भी जरूरत बतायी।
उत्तराखंड में बसंत का आगमन चैत्र संक्रांति से होता है। यह पर्व कहीं-कहीं आठ दिन तो कहीं महीने भर उल्लास के साथ मनाया जाता है। जंगल बुरांशों से लद जाते हैं। खेतों में फ्यूंली की रंगत देखते ही बनती है। कहीं घास के बीच लुका-छिपी खेलते डुंडी बिराली के फूल तो कहीं खेतों की मेंड़ों पर इठलाते हवा संग गुनगुनाते फूलों के ये रंग पयांपाती के संग लोकजीवन में नई उमंग भर देते हैं। प्रकृति का यह अतुल वैभव बचपन के लिए पहाड़ पर फूलों का उत्सव लेकर आता है।

सुख-समृद्धि की कामना करती फुलारियों की टोलियों का घर-घर स्वागत होता। वह घर जहां खोली के गणेश और मोरी के नारैण बिराजते थे। छज्जे-तिबारियों में बैठे बुजुर्ग इन बच्चों के रूप में अपना बचपन फिर से जी रहे होते। फुलारियों को देने के लिए चूल्हे पर रखी बाट्टी में चैलाय के खील उछल रहे होते और कहीं लोक संस्कृति की मिठास में सनी भेली रखी होती। कहीं चावल मिलते तो कहीं पैसे जो फुलचोला (सामूहिक भोज) के दिन काम आते। घोघा (देवडोली) को सुसज्जित कर पूरे गांव में घुमाया एवं नचाया जाता।

गांव के हर घर की देहली पर फूल डालने के बाद हम सब फुलारी बौड़ी के महादेव के पास इकट्ठा होते। कोणजियों में बचे फूल महादेव पर चढ़ा दिये जाते और रंग-बिरंगे फूलों की वह बड़ी राशि पुष्पोत्सव को सार्थक कर देती।


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