Saturday , 5 September 2026
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देवप्रयाग से लंबगांव तक धधके जंगल: पूरी रात आग की लपटों में जलती रही वन संपदा, वन विभाग की टीमें जूझती रहीं

देवप्रयाग से सटे बेली के आरक्षित वन क्षेत्र में रविवार देर रात आग ने भयावह रूप ले लिया। बताया जा रहा है कि महड़ क्षेत्र के पौखाल गांव में ग्रामीणों द्वारा खेतों में जलाए गए आड़े की आग धीरे-धीरे फैलते हुए जंगल तक पहुंच गई। तेज हवाओं ने आग को और भड़का दिया, जिससे भागीरथी तट से लेकर पहाड़ की ऊंची चोटियों तक आग फैल गई। देखते ही देखते आग देवप्रयाग-टिहरी मोटर मार्ग स्थित सुंदरनगर क्षेत्र तक पहुंच गई।

जंगलों में उठती आग की ऊंची लपटों और धुएं से पूरा नदी घाटी क्षेत्र प्रभावित रहा। आग के कारण वातावरण में गर्मी भी बढ़ गई और धुएं के कारण लोगों को सांस लेने में परेशानी का सामना करना पड़ा। स्थानीय लोगों ने रातभर आग की भयावह तस्वीरें देखीं, जिससे क्षेत्र में दहशत का माहौल बना रहा।

वन विभाग के रेंजर एमएस रावत ने बताया कि आग पर नियंत्रण पाने के लिए विभाग की 19 सदस्यीय टीम रविवार रात से लगातार मोर्चा संभाले हुए है। टीम ने सबसे पहले आग को देवप्रयाग नगर की ओर बढ़ने से रोकने पर ध्यान केंद्रित किया, जिसमें आंशिक सफलता मिली। हालांकि भागीरथी तट की ओर फैली आग को बुझाने के लिए वन कर्मियों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है।

इधर लंबगांव रेंज के संयारी और बौंसाडी तोक के जंगलों में भी रविवार देर शाम अचानक भीषण आग भड़क उठी। यहां भी आशंका जताई जा रही है कि ग्रामीणों द्वारा खेतों में जलाए गए आड़े की वजह से आग जंगल तक पहुंची। तेज हवा के कारण आग तेजी से फैलती चली गई और कुछ ही समय में बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया।

सूचना मिलते ही रेंजर सौरभ सिंह के नेतृत्व में वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और रातभर आग बुझाने में जुटी रही। लेकिन आग इतनी विकराल थी कि देर रात तक उस पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका। सोमवार तड़के टीम ने फिर से मोर्चा संभाला और कई घंटों की कड़ी मशक्कत के बाद दोपहर में आग पर काफी हद तक काबू पाया गया।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार आग लगने के सटीक कारणों की जांच की जा रही है। विभाग ने लोगों से अपील की है कि जंगलों के आसपास आग जलाने में सावधानी बरतें और यात्रा के दौरान जलती बीड़ी, सिगरेट या माचिस की तिल्ली जंगलों की ओर न फेंकें। साथ ही कूड़ा-कचरा जलाने से भी बचने को कहा गया है।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बेली और आसपास के जंगल उनके लिए घास-पत्ती और जलावन लकड़ी का प्रमुख स्रोत रहे हैं। ऐसे में जंगलों में लगी आग से न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान हुआ है, बल्कि ग्रामीणों के सामने ईंधन और पशुओं के चारे का संकट भी खड़ा हो सकता है। लगातार बढ़ती वनाग्नि की घटनाओं ने एक बार फिर जंगलों की सुरक्षा और जनजागरूकता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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