जनरल बीसी जोशी को उत्तराखंड की आन, बान और शान कहा जाता था। नब्बे के दशक में पहाड़ से निकले युवाओं ने देशभक्ति का जज्बा लिए जब भी सेना में कदम बढ़ाया तो उनके दिल में बीसी जोशी का नाम प्रेरणा बना। वह पहाड़ के पहले शख्स थे, जो सेना प्रमुख के पद पर पहुंचे। सैन्यधाम कहे जाने वाले उत्तराखंड के लिए जनरल जोशी का सेना प्रमुख बनना गौरव का ऐसा लम्हा था, जिसकी गूंज कई वर्षों तक सुनी जाती रही। जनरल बीसी जोशी के इस मुकाम तक पहुंचने में उनकी पत्नी मंजुला जोशी का भी बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्होंने हर समय जनरल बीसी जोशी का साथ दिया।
देवभूमि उत्तराखंड के बारे में कहा जाता है कि शायद ही कोई गांव ऐसा हो जहां से लोग सेना में जाकर देशसेवा न कर रहे हों। ऐसे में जब उनका लाल सेना में सर्वाेच्च पद पर पहुंचा हो तो उनकी खुशी का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 1 जुलाई 1993 को उन्होंने आर्मी चीफ का पदभार संभाला। इससे पहले वह पूर्वी और दक्षिणी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ के तौर पर सेवा कर चुके थे। 1971 की भारत-पाक जंग में भी वह शामिल हुए थे। नई दिल्ली में सेना मुख्यालय में महानिदेशक (योजना) और महानिदेशक सैन्य संचालन (डीजीएमओ) के रूप भी सेवा दे चुके थे।
परम विशिष्ट सेवा पदक और अति विशिष्ट सेवा पदक पाने वाले उत्तराखंड के सपूत जनरल बिपिन चंद्र जोशी का भारतीय सेना के प्रमुख रहते 19 नवंबर 1994 को निधन हो गया। जब निधन हुआ उस समय उनकी उम्र 58 साल थी, नई दिल्ली स्थित सैन्य अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। वह 1995 में सेवानिवृत्त होने वाले थे पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गई। वह भारतीय सेना के एकमात्र चीफ हैं जिनकी मृत्यु कार्यकाल के दौरान हुई।
आज भले ही यह दोनों लोग हमारे बीच नहीं हैं पर जनरल बिपिन चंद्र जोशी और उनकी पत्नी मंजुला जोशी को पूरे देश लोग सदैव याद करेंगे। वह युवा पीढ़ी को सदैव देशसेवा और प्रेरणा पुंज के रूप में राह दिखाते रहेंगे। कहा जाता है कि एक सफल आदमी के पीछे उनकी पत्नी का भी अहम योगदान होता है और यह बात मंजुला जोशी ने करके दिखाई।


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