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वर्दी से खेती तक: पैरा कमांडो हीरा सिंह पटवाल की पहाड़ बचाने की नई जंग

30 साल पैरा SF में सेवा के बाद कमांडो हीरा सिंह पटवाल अल्मोड़ा के अपने गांव लौटे। बंजर ज़मीन को खेती में बदला, पशुपालन शुरू किया और आत्मनिर्भरता की मिसाल बने। वे युवाओं को गांव लौटने, खेती अपनाने और पहाड़ बचाने का संदेश दे रहे हैं।

कभी सिर पर मैरून बेरेट, सीने में देश के लिए जान देने का जज़्बा और आंखों में हर मिशन को सफल करने की आग पैरा स्पेशल फोर्सेज के कमांडो हीरा सिंह पटवाल ने तीन दशकों तक देश की सबसे कठिन और खतरनाक जिम्मेदारियां निभाईं। लेकिन 2022 में जब उन्होंने वर्दी उतारी, तो उनका मिशन खत्म नहीं हुआ। बस दुश्मन बदल गया, अब उनकी लड़ाई पलायन, बंजर होती ज़मीन और टूटते गांवों के खिलाफ है।

करीब 30 साल भारतीय सेना की पैरा SF जैसी दुनिया की सबसे घातक यूनिट में सेवा देने के बाद हीरा सिंह पटवाल उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया क्षेत्र के पास स्थित अपने पैतृक गांव कोठ्युड़ा लौट आए। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने शहर की सुविधाओं या आरामदायक जीवन को नहीं चुना, बल्कि पहाड़ की कठिन चढ़ाइयों और सादगी भरी जिंदगी को अपना अगला मिशन बना लिया।

गांव लौटकर सबसे पहले उन्होंने अपने पुश्तैनी घर को दोबारा बसाया। इसके बाद वर्षों से बंजर पड़ी ज़मीन को मेहनत और लगन से फिर से उपजाऊ बनाया। मुख्य सड़क से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित यह इलाका, जिसे कई लोग आज भी जंगल कह देते हैं, आज उनकी मेहनत की पहचान बन चुका है।आज उनके पास 6 गायें, 1 भैंस, 40 बकरियां और 4 वफादार कुत्ते हैं। करीब 30 नाली जमीन पर वे गेहूं, धान, आलू, गडरी, मूली, प्याज और लहसुन की खेती कर रहे हैं। आने वाले वर्षों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने नींबू और कीवी का बगीचा भी तैयार किया है, जो भविष्य में आय का मजबूत स्रोत बनेगा।

पिछले करीब 14 महीनों में हीरा सिंह अपनी भैंस से तैयार किया गया करीब 160 किलो घी बेच चुके हैं। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि गांव में रहकर भी सम्मानजनक आमदनी और आत्मनिर्भर जीवन संभव है। उनका मॉडल बताता है कि सही सोच और मेहनत से खेती और पशुपालन भी एक सशक्त व्यवसाय बन सकता है।

हीरा सिंह सिर्फ अपने लिए नहीं जी रहे। वे गांव के युवाओं को खेती, पशुपालन और जैविक उत्पादन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। गांव के बच्चों के लिए वे अनुशासन, मेहनत और आत्मनिर्भरता की जीवंत पाठशाला बन चुके हैं। उनका संघर्ष सिर्फ रोज़गार का नहीं, बल्कि पहाड़ों की संस्कृति, जमीन और प्रकृति को बचाने का भी है।

आज हीरा सिंह पटवाल उन युवाओं के लिए मिसाल हैं जो मानते हैं कि गांव लौटना असंभव या मजबूरी है। वे साबित करते हैं कि रिवर्स माइग्रेशन कोई हार नहीं, बल्कि एक मजबूत और सम्मानजनक विकल्प है।

वर्दी उतारने के बाद भी उनका मिशन जारी है, इस बार देश की सीमाओं की नहीं, बल्कि पहाड़ों के भविष्य की रक्षा का।

Written by
Hill Mail

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