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गैरसैंण: राज्य आन्दोलन के सपनों का केन्द्र

उत्तराखंड राज्य आन्दोलन का मूल उद्देश्य केवल पृथक राज्य बनाना नहीं था, बल्कि पहाड़ की आवश्यकताओं के अनुरूप शासन व्यवस्था स्थापित करना था। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाना उसी संकल्प और जनभावना को साकार करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त डंगवाल, देहरादून

उत्तराखंड के प्रत्येक जागरूक नागरिक, गैरसैंण पदयात्रा आन्दोलन के प्रत्येक सदस्य तथा राज्य आन्दोलन की मूल भावना से जुड़े प्रत्येक उत्तराखंडवासी को यह बात भली-भांति समझ लेनी चाहिए कि गैरसैंण को उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बनाने की मांग कोई साधारण राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह उत्तराखंड के इतिहास, संवैधानिक अधिकारों, जनभावनाओं, क्षेत्रीय न्याय और राज्य की अस्मिता का प्रश्न है।

उत्तराखंड राज्य का गठन केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए नहीं हुआ था। यह दशकों के संघर्ष, त्याग, बलिदान और शहादत का परिणाम था। हजारों लोगों ने पृथक राज्य आन्दोलन में भाग इसलिए लिया क्योंकि उनका विश्वास था कि हिमालयी क्षेत्रों की विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक और विकासात्मक आवश्यकताओं को समझने वाली शासन व्यवस्था तभी प्रभावी ढंग से कार्य कर सकती है, जब उसका केन्द्र स्वयं पहाड़ों के मध्य स्थापित हो।

जिस तर्क और विचारधारा ने उत्तराखंड राज्य के गठन को उचित ठहराया, वही तर्क गैरसैंण को उसकी स्थायी राजधानी घोषित करने को भी अनिवार्य बनाता है।

दुर्भाग्यवश, पिछले पच्चीस वर्षों में राष्ट्रीय दलों द्वारा संचालित सरकारों ने इस विषय को जानबूझकर टालने, भटकाने और कमजोर करने का कार्य किया है। समितियां बनीं, घोषणाएं हुईं, आश्वासन दिए गए, लेकिन मूल प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। राज्य आन्दोलन की मूल भावना को लगातार उपेक्षित किया गया है और जनता के धैर्य की निरंतर परीक्षा ली गई है।

प्रश्न सीधा है —
• यदि उत्तराखंड पहाड़ों के लिए बना है, तो उसकी शासन व्यवस्था पहाड़ों से दूर क्यों रहे?
• आज भी पलायन जारी है।
• सैकड़ों गांव वीरान हो चुके हैं।
• रोजगार के अवसर मुख्यतः मैदानी क्षेत्रों तक सीमित हैं।
• पर्वतीय जिलों में विकास असंतुलित है।
• नीतिगत निर्णय प्रायः उन लोगों द्वारा लिए जाते हैं जो पहाड़ की वास्तविकताओं से दूर हैं।

आगामी परिसीमन (Delimitation) इस विषय को और अधिक गंभीर बना देता है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पर्वतीय क्षेत्रों की राजनीतिक आवाज और प्रभाव दोनों और अधिक कमजोर हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि उत्तराखंड के संतुलित विकास तथा पर्वतीय समाज के हितों की रक्षा के लिए एक अपरिहार्य आवश्यकता बन जाता है।

गैरसैंण के पक्ष में तर्क स्पष्ट, तार्किक और सशक्त हैं—

• गैरसैंण उत्तराखंड के भौगोलिक केन्द्र के निकट स्थित है।
• यह गढ़वाल और कुमाऊं के बीच प्राकृतिक सेतु का कार्य करता है।
• यह राज्य आन्दोलन की मूल आकांक्षाओं और जनभावनाओं का प्रतीक है।
• यह संतुलित क्षेत्रीय विकास को सुनिश्चित करने में सहायक है।
• यह शासन को पहाड़ों की वास्तविक समस्याओं और चुनौतियों के अधिक निकट लाता है।
• यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक, सामाजिक और जनसांख्यिकीय पहचान की रक्षा करता है।

इन सिद्धांतों पर किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता।

जब उत्तराखंड लगभग एक लाख करोड़ रुपये के ऋण के बोझ से दबा हुआ है, तब दो राजधानियों का बोझ उठाना न तो आर्थिक दृष्टि से उचित है और न ही प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक। जनता के करों से प्राप्त धन का उपयोग विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आधारभूत संरचना को सुदृढ़ करने में होना चाहिए, न कि प्रशासनिक अनिश्चितता को बनाए रखने में।

अतः उत्तराखंड की जनता यह मांग करती है कि राज्य विधानसभा तत्काल गैरसैंण को उत्तराखंड की स्थायी राजधानी घोषित करने का प्रस्ताव पारित करे तथा राजधानी स्थानान्तरण के लिए एक स्पष्ट, समयबद्ध और कानूनी रूप से बाध्यकारी कार्ययोजना घोषित करे।

  • अब प्रतीक्षा नहीं।
  • अब टालमटोल नहीं।
  • अब निर्णायक कार्रवाई का समय है।

गैरसैंण राजधानी आन्दोलन को अब एक अनुशासित, लक्ष्य-केन्द्रित और जन-आधारित महाआन्दोलन का स्वरूप देना होगा। युवाओं, मातृशक्ति, किसानों, पूर्व सैनिकों, बुद्धिजीवियों, कर्मचारियों, व्यापारियों तथा उत्तराखंड की मूल भावना में विश्वास रखने वाले प्रत्येक नागरिक को इस अभियान से जुड़ना होगा।

यह संघर्ष लोकतांत्रिक होगा। यह संघर्ष संवैधानिक होगा। यह संघर्ष शांतिपूर्ण होगा। किन्तु यह संघर्ष अडिग और अविराम भी होगा।

गैरसैंण केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है। गैरसैंण एक संकल्प है। गैरसैंण एक विचार है। गैरसैंण उत्तराखण्ड आन्दोलन का अधूरा अध्याय है। और जब तक यह अध्याय पूरा नहीं होता, संघर्ष जारी रहेगा।

“स्थायी राजधानी गैरसैंण — अभी, इसी पीढ़ी में; किसी अनिश्चित भविष्य में नहीं।”

“गैरसैंण नहीं, तो उत्तराखंड आन्दोलन अधूरा है।”

Written by
Hill Mail

हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े। हिल-मेल प्रयत्न कर रहा है कि हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं की जानकारी जल्दी से जल्दी लोगों को मिलती रहे।

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