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अगर आज नहीं जागे, तो कल हिमालय नहीं बचेगा

इसी सच से सामना हुआ स्पेन से आई जैमा कोलील का। जैमा भारत हिमालय में ट्रेकिंग के लिए आई थीं। उनका इरादा पहाड़ों की सुंदरता देखने, खुद को प्रकृति के करीब महसूस करने और कुछ दिनों के लिए शहरों की भागदौड़ से दूर रहने का था। लेकिन जो उन्होंने देखा, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को अंदर तक झकझोर देने के लिए काफी था। जहां बर्फ, पत्थर और मौन होना चाहिए था, वहां कचरा बिखरा पड़ा था।

यहीं से शुरू हुआ उनका सफर, एक साधारण ट्रेकर से जिम्मेदारी की मिसाल बनने तक। जैमा ने न तो सोशल मीडिया पर पहले शिकायत की, न ही किसी सरकार का इंतजार किया। उन्होंने झुककर कचरा उठाया। फिर एक बोरी भरी, फिर दूसरी। धीरे-धीरे यह व्यक्तिगत प्रयास एक अभियान में बदल गया।

उन्होंने अपने कंधों पर 200 किलो से अधिक कचरा ढोकर पहाड़ से नीचे पहुंचाया। यह साहस का प्रदर्शन नहीं था, यह संवेदना की ताकत थी। यह दिखावा नहीं था, यह आईना था, जो हमें हमारी लापरवाही दिखा रहा था।

उनका अभियान ‘108 पीक कैंपेन’ सिर्फ सफाई का कार्यक्रम नहीं था। यह एक चेतावनी थी, कि पहाड़ सहन तो कर रहे हैं, लेकिन चुप नहीं रहेंगे।

ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। नदियां सिकुड़ रही हैं। मौसम अनियमित हो रहा है। भूस्खलन, बाढ़ और सूखा, ये सिर्फ प्राकृतिक आपदाएं नहीं, बल्कि हमारी उपेक्षा की प्रतिक्रिया हैं।

हम इसे अक्सर ‘विकास’ का नाम देकर आगे बढ़ जाते हैं। सड़कें चाहिए, होटल चाहिए, भीड़ चाहिए, लेकिन जिम्मेदारी नहीं। जैमा ने सिर्फ कचरा नहीं उठाया, उन्होंने लोगों को जोड़ा। वह पहाड़ी गांवों में गईं, बच्चों से बैठकर बात की, महिलाओं को अपने अभियान से जोड़ा, और समझाया कि प्रकृति से रिश्ता सिर्फ उपयोग का नहीं, संरक्षण का भी है।

उन्होंने बच्चों को बताया कि अगर वे आज प्लास्टिक फेंकेंगे, तो कल वही प्लास्टिक उनकी नदी, उनकी मिट्टी और उनके भविष्य में लौटेगा। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भरता और स्थानीय समाधान से जोड़ा। कपड़े के थैले, कचरा अलग करने की आदत और सामूहिक जिम्मेदारी।

एक विदेशी महिला ने हमारे घर की सफाई की। यह बात शर्म की नहीं, चेतावनी की घंटी है। यह हमारे लिए एक आईना है, जो हमें हमारी अनदेखी, हमारी आदतें और हमारी चुप्पी दिखाता है।

अब सवाल सरकार से नहीं, हमसे है। हम क्या कर रहे हैं अपने पहाड़ों के लिए? अपनी नदियों के लिए? अपने जंगलों के लिए? अगर आज नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हिमालय को सिर्फ तस्वीरों, किताबों और कहानियों में ही जानेंगी।

बदलाव बहुत बड़ा नहीं मांगता। छोटे-छोटे कदम ही काफी हैं, कचरा न फैलाना, प्लास्टिक से बचना, पेड़ लगाना, बच्चों को प्रकृति से जोड़ना और सबसे जरूरी, जागरूक रहना और दूसरों को जागरूक करना।

यह कहानी सिर्फ जैमा कोलील की नहीं है। यह हर उत्तराखंडी की आत्मा से सवाल है। यह हमें सोचने, जागने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

क्योंकि हिमालय हमारी जड़ है, हमारी संस्कृति है, हमारी पहचान है और इसे बचाना सिर्फ विकल्प नहीं, हमारा कर्तव्य है।

Written by
Hill Mail

हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े। हिल-मेल प्रयत्न कर रहा है कि हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं की जानकारी जल्दी से जल्दी लोगों को मिलती रहे।

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