Saturday , 12 September 2026
Home स्पेशल डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
स्पेशलउत्तराखंड न्यूज़देहरादूनपौड़ी गढ़वालसरोकार

डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग की ओर से “डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। संगोष्ठी में उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं, लोकगीतों और सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल माध्यमों के जरिए संरक्षित एवं प्रचारित करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति एवं संगोष्ठी के संरक्षक प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में गढ़ गौरव और प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी तथा विशेष उद्बोधन के लिए जागर सम्राट एवं पद्मश्री डॉ. प्रीतम भरतवाण मौजूद रहे। कार्यक्रम का स्वागत उद्बोधन हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. मंजुला राणा ने दिया। मंच संचालन लोक निष्पादन केंद्र के निदेशक गणेश खुगशाल ‘गणी’ ने किया।

मुख्य अतिथि नरेंद्र सिंह नेगी ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं गैर-शैक्षणिक गतिविधियों की सराहना करते हुए डिजिटल युग के बदलते स्वरूप पर अपने विचार रखे। उन्होंने लोकगायक के रूप में अपनी यात्रा के अनुभव साझा करते हुए कहा कि लोक संस्कृति समाज की पहचान और उसकी जड़ों से जुड़ी होती है। डिजिटल माध्यमों ने कलाकारों को अपनी रचनाओं को व्यापक मंच देने के साथ ही विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद और आदान-प्रदान के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं।

उन्होंने डिजिटल दौर की संभावनाओं के साथ उससे जुड़ी चुनौतियों पर भी चर्चा की। नेगी ने उभरते गीतकारों और कलाकारों से आह्वान किया कि वे लोकसंस्कृति के मूल स्वरूप को समझते हुए लोकजीवन से जुड़े गीतों और रचनाओं का सृजन करें, ताकि आधुनिकता के बीच सांस्कृतिक विरासत की पहचान कायम रह सके।

अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह ने संगोष्ठी के आयोजन के लिए विभाग और आयोजन मंडल को बधाई दी। उन्होंने विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को अपनी लोक और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के कण-कण में लोक संस्कृति के संवाहक सूत्र मौजूद हैं। विद्यार्थियों और अध्यापकों के बीच आपसी सामंजस्य तथा भारतीय जीवन परंपरा में निहित लोक मूल्यों को समझना आज बेहद जरूरी है।

विशेष उद्बोधन में पद्मश्री डॉ. प्रीतम भरतवाण ने पर्वतीय लोक संस्कृति और लोकगीत परंपरा के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार में योगदान देने वाली विभूतियों को नमन किया। उन्होंने पर्वतीय लोकजीवन में कर्म के महत्व को रेखांकित करते हुए वर्तमान समय को केवल ‘कलियुग’ न मानकर ‘करयुग’ बताया।

भरतवाण ने कहा कि डिजिटल युग में अपनी लोक संस्कृति और जड़ों को जानना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। उन्होंने डिजिटल माध्यमों में गंभीरता और स्वीकार्यता के अभाव पर चिंता जताते हुए ढोल सागर, पंवाड़ जैसी पर्वतीय लोक विधाओं के संरक्षण और व्यापक प्रचार-प्रसार पर जोर दिया।

इससे पहले प्रो. मंजुला राणा ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए डिजिटल दौर में “क्या खोया और क्या पाया” जैसे महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने युवाओं में घटते धैर्य और सहिष्णुता पर भी विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी के संयोजक डॉ. कपिल देव पंवार ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए विषय की उपयोगिता और वर्तमान संदर्भ में इसकी आवश्यकता को रेखांकित किया।

Written by
Hill Mail

हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े। हिल-मेल प्रयत्न कर रहा है कि हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं की जानकारी जल्दी से जल्दी लोगों को मिलती रहे।

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

ओपीयू-आईवीएफ तकनीक से साहीवाल गाय ने दिया बद्री बछिया को जन्म

गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर और राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान...