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जोशीमठ : दरारों में मलबा भरने से विज्ञानी नहीं सहमत

जोशीमठ में भूधंसाव की स्थिति निरंतर गंभीर होती दिख रही है। भवनों और जमीन पर उभरी दरारें न सिर्फ चौड़ी होती जा रही हैं, बल्कि कई जगह दरारों की लंबाई भी बढ़ रही है। इस स्थिति पर अंकुश लगाने के लिए दरारों में मलबा भी भरा जाने लगा है। हालांकि, भूविज्ञानी इससे सहमत नहीं दिख रहे। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के पूर्व निदेशक व एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट का कहना है कि भूधंसाव जैसी वृहद स्थिति में दरारों को भरने का प्रयास समय व धन दोनों की बर्बादी है।

प्रोफसर एमपीएस बिष्ट के अनुसार, जोशीमठ की जमीन ग्लेशियर के पीछे खिसकने के बाद शेष बचे मलबे से बनी है। ऐसी जमीन की प्रकृति नीचे की तरफ सरकने की होती है। इसके साथ ही जोशीमठ के करीब-करीब नीचे से ऐतिहासिक भूकंपीय फाल्ट लाइन मेन सेन तरल थ्रस्ट (एमसीटी) भी गुजर रहा है। लिहाजा, भूधंसाव की स्थिति गंभीर दिख रही है। सतह पर उभरी और गंभीर होती दरारों में पानी जाने से रोकने के लिए सरकारी तंत्र इन दिनों इनमें मलबा भर रहा है। कुछ जगह दरारों को प्लास्टिक से भी ढका जा रहा है। हालांकि, लगभग पूरे जोशीमठ में भूधंसाव व दरारों के उभरने के चलते यह प्रयास निरर्थक साबित होता दिख रहा है। क्योंकि, यहां की जमीन की प्रकृति नमी व पानी को शीघ्र सोखने की है। जहां दरारें नहीं हैं, वहां से भी जमीन नमी व पानी को सोख रही है। ऐसे में दरारों में मलबा भरने से कोई असर नहीं पड़ेगा। उनके अनुसार, जोशीमठ क्षेत्र में भूधंसाव की स्थिति बताती है कि सरकार को उपाय के रूप में प्राथमिकता के आधार पर विस्थापन के विकल्प पर आगे बढ़ना होगा। इससे जोशीमठ से दबाव भी कम हो सकेगा।
विस्थापन में प्लानिंग का रखें ध्यान

प्रोफेसर एमपीएस बिष्ट ने कहा कि वर्ष 1970 में अतिवृष्टि जनित आपदा में बिरही ताल टूटने के दौरान पीपलकोटी क्षेत्र में बदरीनाथ राजमार्ग का 14 किलोमीटर भाग पूरी तरह ध्वस्त हो गया था। यहां पर सड़क का नए सिरे से निर्माण करने के दौरान अनियंत्रित ब्लास्टिंग की गई। जिससे पहाड़ कच्चे पड़ गए और आज भी यह पूरा क्षेत्र कई भूस्खलन का जोन बना है। लिहाजा, विस्थापन की प्रक्रिया में पूर्व की गलतियों से सीख लेकर बेहतर प्रबंधन व तकनीकी मानकों का ध्यान रखना होगा। जोशीमठ क्षेत्र में जमीन की संवेदनशीलता के लिए बाहरी कारण के साथ बड़ा आंतरिक कारण भी जिम्मेदार है। क्योंकि, यहां से ऐतिहासिक भूकंपीय फाल्ट मेन सेंट्रल थ्रस्ट भी गुजर रहा है। जो भूगर्भ में लावे वाली साथ से कनेक्ट होकर वहां की ऊर्जा को हलचल के साथ सतह तक प्रभावित करता है। समझा का सकता है कि पर्यावरणीय कारणों से खिसकने की प्रकृति रखने वाली भूमि के लिए इस तरह की हलचल अधिक खतरनाक बना देती है।

जोशीमठ की जमीन के बारे में सबसे पहले मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट (1976) में बताया गया था कि जोशीमठ की जमीन ढीले मैट्रिक्स में बड़े असंतुलित बोल्डरों से बनी हैं। यहां की पहाड़ियों में कई स्थानों पर एक के ऊपर एक बोल्डर रखे दिख जाएंगे। इन बोल्डरों के बीच की मिट्टी हट गई है, इसलिए जमीन के भीतर का नजारा साफ दिख जाता है। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हाइड्रोलॉजी के एक वैज्ञानिक ने बताया कि गूगल अर्थ में देखें, तो जोशीमठ सीधी ढलान पर बसा है। न जाने कितने प्राकृतिक जलस्रोत रास्ता बदल कर शहर की जमीन के नीचे बह रहे हैं, जो जमीन के अंदर की मिट्टी को लगातार काट रहे हैं। इन जलस्रोतों को खोजना व रोकना असंभव है। ड्रेनेज के लिए नई लाइनें बिछाकर बारिश या रोजमर्रा के इस्तेमाल के पानी को तो निकाला जा सकता है, मगर जमीन के नीचे अदृश्य जलस्रोत से बह रहे पानी को कैसे निकाला जा सकता है? यह अपनी तरह की एक प्राकृतिक ड्रेनेज व्यवस्था है, जो पहाड़ों पर आम है।

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जलवायु परिवर्तन से बदला मिजाज

उच्च हिमालय के जोशीमठ जैसे दक्षिणी भाग में भारी वर्षा का प्रभाव रहता है, जबकि उत्तरी छोर जैसे मलारी की तरफ बढ़ते हुए रेन शैडो जोन आता है। यहां बेहद शीत वाली स्थिति के कारण सीधे बर्फबारी होती है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के चलते पूरे क्षेत्र का स्वभाव बदल गया है। क्योंकि, जोशीमठ के ऊपरी क्षेत्र के पहाड़ बर्फबारी के चलते ठोस रहते थे और इन्हें भूस्खलन से महफूज माना जाता था। लेकिन, जलवायु परिवर्तन के चलते इन क्षेत्रों में भी बारिश रिकार्ड की जा रही है। इससे ग्लेशियर या स्नो-कवर वाले क्षेत्र पीछे खिसक रहे हैं। बर्फ के कारण जो जमीन ठोस रहती थी, वह अब ढीली पड़ने लगी है। इसके चलते जामीन में भूस्खलन या धंसाव की स्थिति पैदा हो रही है। ग्लेशियर क्षेत्रों की एक प्रकृति होती है। इनके मलबे में या तो बड़े बोल्डर रहंगे या रेत जैसे बारीक कण। इन दोनों का स्वभाव नीचे की तरफ खिसकने का रहता है। जोशीमठ क्षेत्र में बारीक मिट्टी है या फिर बड़े बोल्डर। अत्यधिक बारिश के चलते इनके खिसकने की गति भी बढ़ जाती है। ऐसा ही कुछ जोशीमठ में देखा जा रहा है। गंभीर यह कि यहां का रेन शैडो वाला उत्तरी भाग भी अब वर्षा के कारण निरंतर ढीला पड़ रहा है। जिससे जोशीमठ क्षेत्र में मानवजनित कारणों के अलावा पर्यावरणीय कारणों से भी दोहरा दबाव पड़ रहा है।

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