जानकारी के अनुसार, एक जुलाई को दून लाइब्रेरी में टूरिस्ट संदेश फाउंडेशन की ओर से स्वरोजगार दिवस के अवसर पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग मौजूद थे। लैंसडौन विधायक महंत दिलीप रावत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए और अपने संबोधन के दौरान उन्होंने क्रांति, नेतृत्व और व्यक्तित्व पर विचार व्यक्त किए।
अपने भाषण के दौरान विधायक ने स्वतंत्रता सेनानी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का उदाहरण देते हुए कहा कि “बुद्धिमान आदमी क्रांति नहीं करता, वह विचार करता है। इसलिए गढ़वाली को बुद्धिमान नहीं कहा जा सकता।” विधायक के इस कथन पर सभागार में मौजूद कई लोगों ने तत्काल आपत्ति जताई। विरोध करने वालों का कहना था कि देश के महान स्वतंत्रता सेनानी और पेशावर कांड के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के बारे में इस प्रकार की टिप्पणी अनुचित और उनकी गरिमा के प्रतिकूल है।
कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार चारु तिवारी सहित कई लोगों ने विधायक के बयान का विरोध किया। विरोध बढ़ने पर विधायक दिलीप रावत ने तुरंत अपने कथन को स्पष्ट करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि उनका आशय किसी भी तरह से वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का अपमान करना नहीं था, बल्कि वह यह बताना चाहते थे कि क्रांति के लिए केवल शिक्षा नहीं, बल्कि जुनून और साहस की आवश्यकता होती है।
हालांकि जब विधायक ने यह कहा कि उनका मतलब था कि वीर चंद्र सिंह गढ़वाली “ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे”, तब भी कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इस टिप्पणी पर असहमति जताई। इसके बाद विधायक ने दोबारा अपनी बात रखते हुए कहा कि उनका आशय यह था कि अत्यधिक तर्क-वितर्क करने वाला व्यक्ति कई बार क्रांतिकारी निर्णय नहीं ले पाता, जबकि जुनून और दृढ़ संकल्प रखने वाले लोग इतिहास बदल देते हैं।
विवाद बढ़ने के बाद विधायक दिलीप रावत ने मीडिया के समक्ष भी अपनी सफाई दी। उन्होंने कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। उनके अनुसार उनका आशय केवल इतना था कि “क्रांति के लिए पढ़ाई नहीं, बल्कि जुनून चाहिए। अधिक सोचने-विचारने वाला व्यक्ति कई बार क्रांति नहीं कर पाता। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का योगदान अतुलनीय है और उनकी क्रांति को मैं कभी नहीं भूल सकता। वह मेरे रिश्तेदार भी रहे हैं।”
कार्यक्रम में मौजूद पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ‘मैती’ ने भी कहा कि विधायक का उद्देश्य वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का अपमान करना नहीं था। उनके अनुसार विधायक यह समझाने का प्रयास कर रहे थे कि इतिहास में कई क्रांतियां केवल शिक्षा के बल पर नहीं, बल्कि साहस, त्याग और दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण सफल हुई हैं।
वहीं, धाद संस्था के अध्यक्ष लोकेश नवानी ने भी इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य बातचीत का हिस्सा बताया। उनका कहना था कि कार्यक्रम के दौरान हुई चर्चा को अनावश्यक रूप से विवाद का रूप दिया जा रहा है और इसमें ऐसा कोई उद्देश्य नहीं था जिससे किसी महापुरुष का अपमान हो।
हालांकि, दूसरी ओर कई सामाजिक और बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों का मानना है कि सार्वजनिक मंचों पर स्वतंत्रता सेनानियों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बारे में बोलते समय जनप्रतिनिधियों को शब्दों का चयन बेहद सावधानी से करना चाहिए। उनका कहना है कि ऐसे व्यक्तित्व पूरे समाज की धरोहर हैं और उनके संबंध में दिए गए बयान संवेदनशीलता तथा सम्मान के साथ होने चाहिए।
फिलहाल विधायक दिलीप रावत की सफाई सामने आने के बाद भी यह मामला चर्चा में बना हुआ है। सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक पक्ष विधायक की मंशा को सही ठहरा रहा है, जबकि दूसरा पक्ष उनके शब्दों को अनुचित बताते हुए सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करने की मांग कर रहा है।


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