लॉकडाउन से रीचार्ज हो गई प्रकृति, लॉकडाउन का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कई किलोमीटर दूर से पहाड़ों के मनोरम दृश्य एक नई दुनिया का आभास करा रहे हैं। ऐसा लग रहा जैसे प्रकृति रीचार्ज हो गई है।
नमामि गंगे प्रोजेक्ट से गंगा का पानी कितना साफ हुआ, इसका कोई आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है। न ही अभी ऐसा कोई शोध सामने आया है लेकिन खुली आंख से देखकर कोई भी यह बता सकता है कि पिछले कई वर्षों में गंगा का पानी इतना साफ़ नहीं हुआ, जितना कोरोना के चलते हुए लॉकडाउन के दौरान हो गया है। सड़कों से गाड़ियां हटीं और हवा के प्रदूषणकारी तत्वों का ग्राफ नीचे लुढ़क गया। गाड़ियों के हटने से जो शोर थमा तो शहरों में भी दिन के समय कोयल के कूकने की आवाज़ सुनाई देने लगी। हरिद्वार में जो गंगा जल आचमन योग्य नहीं रह गया था वहां पानी में तैरती मछलियां दिखायी देने लगीं। जंगल के जानवर अपने छीन लिए गए पुराने रास्तों पर भटकते आ पहुंचे। हाथी हरकी पैड़ी पहुंच गए। बारासिंगा चौराहों पर आ धमके। शहर के बाहरी छोर पर गुलदार की गुर्राहट सुनाई देने लगी। सहारनपुर से गंगोत्री के ग्लेशियर नजर आने लगे। कोविड-19 नाम के वायरस ने इंसानों को घरों में रहने को मजबूर किया तो प्रकृति जैसे रीचार्ज हो गई।
‘40 वर्ष पहले जैसी स्वच्छ दिख रही गंगा’
कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए 22 मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन लागू हुआ। इस लॉकडाउन में अर्थव्यवस्था की रफ्तार ठहर गई। फैक्ट्रियां बंद हुईं तो नदियों में गिरने वाला कचरा भी हट गया। हरिद्वार में गंगा की सूरत बदल गई तो दिल्ली में यमुना की रंगत भी निखर गई। पर्यावरणविद् कहते हैं कि हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा नदी पहले की तुलना में साफ नज़र आने लगी।
देहरदून वन प्रभाग में नमामि गंगे जिला क्रियान्वयन समिति के सदस्य विनोद जुगलान कहते हैं कि फैक्ट्रियों के साथ ही, बद्रीनाथ से लेकर हरिद्वार तक जितने भी होटल और आश्रमों का मैला प्रदूषित पानी गंगा और उसकी सहायक नदियों में गिराया जा रहा था, साथ ही निर्माणाधीन ऑलवेदर रोज कटिंग का मलबा अनाधिकृत रूप से गंगा में गिराया जा रहा था, ये सभी कार्य लॉकडाउन की वजह से बंद हैं। परिणामस्वरूप गंगा इस समय लगभग 40 वर्ष पहले जैसी निर्मल नजर रही है। वह कहते हैं कि लॉकडाउन का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। हमारे खेतों के निकट वन्यजीवों को आसानी से विचरण करते देखा जा सकता है। हमारे घर के आसपास चिड़ियों की चहचहाना आम बात हो गई है। जल की सतह पर गिरी हुई सभी चीजें जैसे पत्थर और जलीय जीव स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।
हवा में प्रदूषण का स्तर गिरा
देहरादून की हवा भी फेफड़ों की बीमार करने लग गई थी। लेकिन लॉकडाउन में लाखों गाड़ियां घरों के अंदर खड़ी हो गईं और हवा की गुणवत्ता में बहुत सुधार आ गया। लॉकडाउन के दौरान हल्द्वानी में हवा में पीएम-10 का स्तर मार्च की तुलना में अप्रैल महीने में 50 प्रतिशत तक कम हो गया। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक लॉक डाउन के दौरान देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, काशीपुर, रुद्रपुर और हल्द्वानी में हवा की गुणवत्ता बेहतर हुई है। पर्टिकुलर मैटर-10 के कणों की मात्रा में भारी गिरावट आ गई है।
सार्वजनिक परिवहन को मज़बूत बनाना होगा
देहरादून में सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्यूनिटीज फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल कहते हैं कि लॉकडाउन के चलते साफ हुई हवा हमारे लिए एक वेकअप कॉल है। ये वक्त अब बातचीत का नहीं है बल्कि एक्शन का है। उनके मुताबिक वायु प्रदूषण में परिवहन सेक्टर का बड़ा रोल है। करीब 20-25 प्रतिशत प्रदूषण परिवहन-गाड़ियों के धुएं की वजह से होता है। इसलिए अब हमें परिवहन क्षेत्र में बड़े बदलाव लाने होंगे। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को बेहतर बनाना होगा ताकि सड़कों पर कम गाड़ियां उतरें। इसके साथ ही पेट्रोल-डीज़ल से इलेक्ट्रिक गाड़ियों की ओर जाना होगा। लेकिन बिना सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाए हम सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कम नहीं कर सकते। प्रदूषण कम होने से विजिबिलिटी भी बेहतर हो गई। देहरादून से धुंधलाती दिखने वाली मसूरी की पहाड़ियां साफ दिखने लगी। बल्कि रात के समय मसूरी से आगे टिहरी भी टिमटिमाता दिखाई देने लगा।
इंसान घरों में कैद हुए और पशु-पक्षी रिहा हुए
सड़कों से गाड़ियां हटने से ध्वनि प्रदूषण भी कम हुआ है। सुबह से ही गाड़ियों के शोर में चिड़ियों की चहचहाहट कहीं गुम हो गई थी। लॉकडाउन के समय आप अपने घरों से देर तक चिड़ियों की चहहाहट सुन सकते हैं। हमारे आसपास से गुम लगने वाली कोयल दरअसल वहीं मौजूद थी लेकिन हम उसकी कूक सुन नहीं पाते थे। अब देर दोपहरी तक कोयल की कूक सुनाई देती है। कोरोना वायरस के डर से इंसान घरों में कैद हुए तो पशु-पंछी जैसे रिहा हो गए। आमतौर पर 8-15 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले मोनाल पक्षी चोपता के आसमान में उड़ान भरने की खबरें उड़ने लगीं। घुरड़ और थार पंछियों का झुंड भी यहीं बुग्यालों में देखा गया। वन विभाग के लिए ये ख़ुशखबरी रही।
उधर, हरिद्वार में सड़क पर निकल आए बारासिंगा के झुंड को देखकर बच्चे बालकनी से चीखने लग गए। हरकी पैड़ी पर दो गजराज झूमते हुए चौराहों तक आ धमके तो वन विभाग और पुलिस प्रशासन को वहां पेट्रोलिंग बढ़ानी पड़ी ताकि जंगली जानवरों को सड़कों पर आऩे से रोका जा सके। देहरादून के शहर से बाहर ही गुलदार का डर सताने लगा।
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