चमोली के कर्णप्रयाग के डिम्मर से ताल्लुक रखने वाले प्रोफेसर अशोक प्रियदर्शन डिमरी को भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान का निदेशक नियुक्त किया गया है उन्होंने आज ही अपना पदभार ग्रहण किया और वह अगले 5 साल तक इस पद पर बने रहेंगे।
चमोली के कर्णप्रयाग के डिम्मर से ताल्लुक रखने वाले प्रोफेसर अशोक प्रियदर्शन डिमरी को भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान (Indian Institute Of Geomagnetism) का निदेशक नियुक्त किया गया है उन्होंने आज ही अपना पदभार ग्रहण किया और वह अगले 5 साल तक इस पद पर बने रहेंगे। भारतीय उपमहाद्वीप क्षेत्र में भूचुंबकत्व के ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने में यह संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह लंबी श्रृंखला के भूचुंबकीय डेटा का उपयोग करने हेतु एक डेटा संग्रहण संगठन से आगे बढ़ते हुए एक स्पष्ट और गूढ़ पद्धति से समाज को लाभ पहुंचाने वाले लागू पहलुओं से निपटने वाले संस्थान के रूप में विकसित हुआ है।
भारतीय भूचुंबकत्व संस्थान (आईआईजी) को 1971 में भूचुंबकीय और संबद्ध क्षेत्रों में अनुसंधान को आगे बढ़ाने में एक भूमिका निभा रहा है। यह अपनी स्थापना के बाद से ही एक स्वायत्त संस्थान रहा है और अब विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के अंतर्गत कार्यरत है। देश में भूचुंबकत्व के विकास को इस संस्थान के विकास के साथ अंतर-संबंधित रूप से जोड़ा गया है।इससे पहले प्रोफेसर डिमरी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ इनवाॅयरमेंटल साइंसेज में प्रोफेसर थे। प्रोफेसर डिमरी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से 1989 में बीएससी (फिजिक्स) से की। इसके बाद उन्होंने बीएचयू से ही 1992 में एमएससी जियोफिजिक्स (मौसमविज्ञान) की शिक्षा प्राप्त की। 1994 में उन्होंने जेएनयू से इनवाॅयरमेंटल साइंसेजस में एमफिल किया। डिमरी ने आईआईटी दिल्ली से अपनी पीएचडी एटमोस्फेरिक साइंसेज में की। वह अप्रैल 1994 से 2008 के बीच रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में स्नो एंड एक्लांच साइंटिस्ट रहे।
प्रोफेसर डिमरी ने 2009 से दून यूनिवर्सिटी, देहरादून में विजिटिंग फैकल्टी हैं। वह जापान के नगोया स्थित हाइड्रोसफेरिक एटमाॅसफेरिक रिसर्च सेंटर में सितंबर 2010 से अगस्त 2012 तक अनुसंधानकर्ता रहे हैं। इससे पहले वह ब्रिटेन के नोरविक में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंगलिया की क्लाइमेट रिसर्च यूनिट में एसोसियट फेलो रहे हैं। उनके शोध के विषयों में क्षेत्रीय जलवायु गतिशीलता, बदलाव एवं परिवर्तनशीलता, जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन का विज्ञान, भारत का शीतकालीन मानूसून एवं पिश्चिमी विक्षोभ है। उन्होंने पहाड़ों पर अलग-अलग जगहों के तापमान का अध्ययन करने के लिए एक नई विधि सामने रखी है।
प्रोफेसर डिमरी को जलवायु परिवर्तन, भारत के विंटर मानूसन, विंटर एवक्ट्रा-टाॅपिकल साइक्लोन और पश्चिमी विक्षोभ, हिमालयी स्थलाकृति जैसे गूढ़ विषयों में महारत हासिल है। दुनिया के प्रसिद्ध स्टैंनफोर्ड विश्वविद्यालय ने हाल ही में भारत के शीर्ष 2 प्रतिशत जलवायु वैज्ञानिकों की एक सूची प्रकाशित की है, जिसमें प्रोफेसर एपी डिमरी का भी नाम है। उन्हें इस सूची में तीसरा स्थान दिया गया है। इसके जरिये साल 2019 के लिए क्लाइमेट साइंसेस के टाॅप विशेषज्ञों के उल्लेखनीय योगदान को स्वीकार किया गया है।
प्रोफेसर की प्रारंभिक शिक्षा गोपेश्वर, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी से हुई। इसके बाद आगे की पढ़ाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, यूएनयू और आईआईटी दिल्ली से की। उन्हें नागोया यूनिवर्सिटी जापान से फेलोशिप भी मिल चुकी है। हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने की घटना का उन्होंने गहराई से विश्लेषण किया है। इसके माध्यम से उन्होंने दुनिया को क्लाउडबस्र्ट की सही परिभाषा भी उपलब्ध कराई है।
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J N Jugran
April 28, 2022, 6:32 pmIt’s really a moment of pride for all the Uttarakhandi to have Pro. A P Dimri like scientists with us, who is serving the country in a different way. Congratulations Prof. Dimri, all the best for your new responsibility and all the best wishes for your good health.
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