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उत्तराखंड न्यूज़ताज़ा ख़बरपौड़ी गढ़वालसरोकार

गांव की जख्मी महिला इलाज के लिए भटकती रही, 24 घंटे तक नहीं मिला समुचित इलाज

पौड़ी गढ़वाल जिले के रिखणीखाल ब्लॉक की एक 60 वर्षीय विकलांग महिला गांव के पास जंगल में घायल हो गईं थी। महिला पहले से ही शारीरिक रूप से अक्षम थीं, न बोल सकती थीं, न चल सकती थीं। इस गंभीर स्थिति में उन्हें पहले रिखणीखाल के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी।

इसके बाद उन्हें 90 किलोमीटर दूर कोटद्वार अस्पताल रेफर किया गया। परिवार ने किसी तरह निजी वाहन की व्यवस्था की और महिला को रात 10 बजे अस्पताल पहुंचाया। लेकिन कोटद्वार में भी जरूरी इलाज की सुविधा नहीं मिली, जिससे उन्हें 135 किलोमीटर दूर जौलीग्रांट, देहरादून भेज दिया गया।

देहरादून पहुंचने के बाद भी महिला को दो अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े, जिनमें से एक ने इलाज करने से मना कर दिया। आखिरकार महिला को जौहरी नर्सिंग होम में भर्ती किया गया। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में 24 घंटे से अधिक समय बीत गया, और घायल महिला को समुचित इलाज नहीं मिल पाया। महिला पूरी तरह अपने भाई और भाभी पर निर्भर हैं, जो स्वयं आर्थिक रूप से बहुत कमजोर हैं।

शुभांशु जोशी की चली गई थी जान

इस घटना से पहले एक और दर्दनाक मामला सामने आया था, जिसमें चमोली जिले के चिडंगा गांव के निवासी सैनिक दिनेश चंद्र के डेढ़ साल के बेटे शुभांशु जोशी की इलाज के अभाव में मौत हो गई।

10 जुलाई को शुभांशु की तबीयत अचानक बिगड़ी तो परिजन उसे ग्वालदम अस्पताल ले गए, लेकिन वहां इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी। फिर वे उसे बैजनाथ (बागेश्वर) ले गए, और वहां से बागेश्वर जिला अस्पताल। वहां डॉक्टरों ने बच्चे की हालत गंभीर बताकर उसे हल्द्वानी रेफर कर दिया।

परिजनों ने 108 एंबुलेंस के लिए कॉल किया, लेकिन समय पर वाहन नहीं मिला। जब तक वे हल्द्वानी के लिए रवाना हुए, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रास्ते में ही शुभांशु ने एंबुलेंस में दम तोड़ दिया।

क्या कहता है यह सिस्टम

इन दोनों घटनाओं ने एक बार फिर से यह उजागर कर दिया है कि उत्तराखंड के पर्वतीय और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं जर्जर हालात में हैं। जब एक विकलांग महिला को प्राथमिक उपचार के लिए 300 किलोमीटर तक भटकना पड़ता है, और एक मासूम बच्चा अस्पतालों की लापरवाही की भेंट चढ़ जाता है, तो यह सरकार के स्वास्थ्य सुधार के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सिर्फ वादों से नहीं चलेगा काम

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में स्वास्थ्य सेवा केवल कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर मजबूत और पहुंच योग्य होनी चाहिए। अब वक्त आ गया है कि राज्य सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में वास्तविक और ठोस निवेश करे, खासकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में। जिससे कि यहां के लोगों का उपचार यहीं पर ही हो सके।

जब तक इन बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता, तब तक उत्तराखंड की जनता को इसी तरह भटकते रहना पड़ेगा, और ये घटनाएं केवल ‘खबर’ बनकर रह जाएंगी।

Written by
Hill Mail

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