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उत्तराखंड के प्राचीन ज्ञान को मिलेगा डिजिटल स्वरूप, पांडुलिपियों के संरक्षण का बड़ा अभियान शुरू

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पांडुलिपियों का स्वामित्व उनके मूल संरक्षकों के पास ही रहेगा। सरकार केवल इनके संरक्षण और डिजिटलीकरण में सहयोग प्रदान करेगी, जिससे निजी संग्रहकर्ताओं और संस्थाओं का विश्वास भी बना रहे।

उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। राज्य में प्राचीन पांडुलिपियों, भोजपत्र, ताम्रपत्र और दुर्लभ ग्रंथों के संरक्षण और डिजिटलीकरण के लिए एक व्यापक अभियान की शुरुआत की गई है। यह पहल न केवल ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने का प्रयास है, बल्कि उन्हें आधुनिक तकनीक के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण प्रयास मानी जा रही है।

यह अभियान केंद्र सरकार के ज्ञान भारतम मिशन के तहत संचालित किया जा रहा है। राष्ट्रीय अभिलेखागार के महानिदेशक के निर्देशन में इसके लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, जिनके आधार पर राज्यभर में चरणबद्ध तरीके से कार्य किया जाएगा।

अभियान के अंतर्गत 75 वर्ष से अधिक पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियों की पहचान की जाएगी। इन अमूल्य दस्तावेजों को संरक्षित करने के लिए आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, ताकि समय के प्रभाव से उन्हें होने वाले नुकसान को रोका जा सके। इसके साथ ही, इन पांडुलिपियों का बड़े पैमाने पर डिजिटलीकरण किया जाएगा, जिससे इन्हें डिजिटल फॉर्मेट में लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके।

इस पहल के तहत राज्य के विभिन्न हिस्सों में व्यापक सर्वेक्षण अभियान चलाया जाएगा। मठ-मंदिरों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहकर्ताओं के पास मौजूद प्राचीन पांडुलिपियों और दस्तावेजों का डेटा एकत्र किया जाएगा। प्रशासन ने एक सप्ताह के भीतर प्रारंभिक सर्वे पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके बाद चयनित पांडुलिपियों का वैज्ञानिक परीक्षण, संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जाएगा।

डिजिटलीकरण के बाद इन सभी दस्तावेजों को एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया जाएगा, जिससे शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और आम लोगों को इन तक आसानी से पहुंच मिल सके। यह कदम न केवल अध्ययन और शोध कार्य को आसान बनाएगा, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभाएगा।

इस मिशन में इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और विषय विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई है। साथ ही, शिक्षा, संस्कृति और पर्यटन विभाग भी इस अभियान में मिलकर काम कर रहे हैं। राज्य और जिला स्तर पर समितियों का गठन किया गया है, जो पूरे अभियान की निगरानी और क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगी।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पांडुलिपियों का स्वामित्व उनके मूल संरक्षकों के पास ही रहेगा। सरकार केवल इनके संरक्षण और डिजिटलीकरण में सहयोग प्रदान करेगी, जिससे निजी संग्रहकर्ताओं और संस्थाओं का विश्वास भी बना रहे।

यह पहल उत्तराखंड की प्राचीन धरोहर को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध होगी। डिजिटलीकरण के माध्यम से इन पांडुलिपियों तक ऑनलाइन पहुंच संभव होने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी शोध और अध्ययन को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, इससे राज्य में सांस्कृतिक पर्यटन को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह अभियान राज्य की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को संरक्षित करने में मील का पत्थर साबित होगा। सरकार इस परियोजना को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की योजना बना रही है, जिसमें स्थानीय समुदायों, संस्थाओं और संग्रहकर्ताओं की भागीदारी को भी विशेष महत्व दिया जा रहा है।

कुल मिलाकर, यह पहल उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हुए उसे आधुनिक युग से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभर रही है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान का अमूल्य खजाना साबित होगी।

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