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अटल बिहारी वाजपेयी: प्रखर वक्ता से सर्वमान्य राजनेता तक

हिल-मेल ब्यूरो भारतीय राजनीति के युगपुरुष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे। उन्होंने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में 16 अगस्त को अंतिम सांस ली और 17 अगस्त को उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी की हालत

हिल-मेल ब्यूरो

भारतीय राजनीति के युगपुरुष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे। उन्होंने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में 16 अगस्त को अंतिम सांस ली और 17 अगस्त को उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। अटल बिहारी वाजपेयी की हालत काफी गंभीर थी उसके बाद उन्हें 11 जून को दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया गया। उन्हें किडनी में इंफेक्शन, छाती में जकड़न, यूरिन इंपेक्शन जैसी दिक्कतें हो रही थी।

भारत के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी का संपूर्ण व्यक्तित्व शिखर पुरुष के रूप में दर्ज है। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक, भाषाविद, कवि, पत्रकार और लेखक के रूप में जाने जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा में पले-बढ़े वाजपेयी राजनीति में उदारवाद और समता एवं समानता के समर्थक माने जाते हैं। उन्होंने कभी भी अपने आपको विचारधारा की कीलों में नहीं बांधा।

अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति को दलगत और स्वार्थ की वैचारिकता से अलग हट कर अपनाया। उन्होंने अपने जीवन में आने वाली हर विषम परिस्थितियों और चुनौतियों को स्वीकार किया। वाजपेयी ने नीतिगत सिद्धांत और वैचारिकता का कभी कत्ल नहीं होने दिया। राजनीतिक जीवन के उतार चढ़ाव में उन्होंने आलोचनाओं के बाद भी अपने को संयमित रखा। राजनीति में धुर विरोधी भी उनकी विचारधारा और कार्यशैली के कायल रहे।

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को हुआ था। उनके पिता कृष्ण बिहारी बाजपेयी शिक्षक थे। उनकी माता का नाम कृष्णा था। वैसे मूलतः उनका संबंध उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बटेश्वर गांव से है। लेकिन, पिता मध्य प्रदेश में शिक्षक थे। इसलिए उनका जन्म वहीं हुआ। लेकिन, उत्तर प्रदेश से उनका राजनीतिक लगाव सबसे अधिक रहा। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से वे सांसद भी रहे।

कविताओं को लेकर उन्होंने कहा था कि मेरी कविता जंग का एलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है। उनकी कविताओं का संकलन ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ खूब चर्चित रहा जिसमें.. ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा..’ खास चर्चा में रही।

वे एक कवि के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे। लेकिन, शुरुआत पत्रकारिता से हुई पत्रकारिता ही उनके राजनैतिक जीवन की आधारशिला बनी। उन्होंने संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’, ‘राष्ट्रधर्म’ और ‘वीर अर्जुन’ जैसे अखबारों का संपादन किया।

उन्होंने सबसे पहले 1955 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। बाद में 1957 में गोंडा की बलरामपुर सीट से जनसंघ उम्मीदवार के रूप में जीत कर लोकसभा पहुंचे। वाजपेयी ने बीस सालों तक जनसंघ के संसदीय दल के नेता के रूप में काम किया। 1957 में देश की संसद में जनसंघ के सिर्फ चार सदस्य थे, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी भी एक थे।

वाजपेयी का पूरा जीवन राष्ट्रगौरव का प्रतीक होने के साथ ही निर्धनों व वंचितों की सेवा के लिए समर्पित रहा। वे देश के पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण दिया।

बाद में 1980 में जनता पार्टी से नाराज होकर पार्टी का दामन छोड़ दिया। इसके बाद बनी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में वह एक थे। उसी साल उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कमान संभाली। इसके बाद वह 1986 तक बीजेपी के अध्यक्ष रहे। उन्होंने इंदिरा गांधी के कुछ कार्यों की तब सराहना की थी, जब संघ उनकी विचारधारा का विरोध कर रहा था।

अटल बिहारी वाजपेयी तीन बार देश के प्रधानमंत्री बने। राजनीति में संख्या बल का आंकड़ा ही सर्वोपरि होता है। सन् 1996 में उनकी सरकार एक मत से गिर गई थी और तब उन्हें प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा। उनकी यह सरकार केवल तेरह दिन तक चली। उसके बाद उन्होंने विपक्ष की भूमिका निभाई।

इसके बाद वह 1998 से लेकर 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता से बीजेपी को देश में शीर्ष राजनीतिक सम्मान दिलाया। दो दर्जन से अधिक राजनीतिक दलों को मिलाकर उन्होंने एनडीए बनाया जिसकी सरकार में 80 से अधिक मंत्री थे, जिसे जम्बो मंत्रिमंडल भी कहा गया।

वाजपेयी ने मई 1998 में पोखरण में सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण कराकर दुनिया को भारत की शक्ति से अवगत कराया। पाकिस्तान ने जब धोखे से कारगिल की चोटियों को कब्जाया तो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दृढ़ नेतृत्व में भारतीय सेना ने अद्वितीय पराक्रम का परिचय देते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों का पूरी तरह से सफाया कर दिया।

अटल बिहारी वाजपेयी ने लालबहादुर शास्त्री की तरफ से दिए गए नारे ‘जय जवान जय किसान’ में अलग से जय विज्ञान भी जोड़ा। देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता गवारा नहीं था। उन्होंने दक्षिण भारत के सालों पुराने कावेरी जल विवाद का हल निकालने का प्रयास किया। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना से देश को राजमार्ग से जोड़ने के लिए कॉरिडोर बनाया। मुख्य मार्ग से गांवों को जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना बेहतर विकास का विकल्प लेकर सामने आई। कोंकण रेल सेवा की आधारशिला उन्हीं के काल में रखी गई थी।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को 27 मार्च, 2015 को भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह सम्मान कार्यक्रम कृष्ण मेनन मार्ग स्थित उनके आवास पर ही हुआ, जिसमें राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे थे। वर्ष 2009 से ही स्वास्थ्य कारणों से वाजपेयी का घर से निकलना लगभग बंद हो गया था। अटल बिहारी वाजपेयी को इससे पहले भी कई सम्मान मिले। 1992 में उन्हें पद्म विभूषण, 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार, 1994 में श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार और 1994 में ही गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार से नवाजा गया।

अटल बिहारी वाजपेयी का उत्तराखंड से विशेष लगाव रहा है। वाजपेयी मसूरी, देहरादून व नैनीताल आते रहते थे। वाजपेयी की सरकार ने ही उत्तराखंड राज्य के गठन को मंजूरी दी थी। उन्होंने न केवल अलग उत्तराखंड का निर्माण करवाया बल्कि विशेष राज्य का दर्जा देते हुए विशेष औद्योगिक पैकेज भी स्वीकृत किया। उत्तरकाशी की सुरक्षा एवं गंगोत्री आने वाले तीर्थ यात्रियों व पर्यटकों की सुविधा हेतु वरूणावत पर्वत भूस्खलन के उपचार के लिये उन्होंने विशेष आर्थिक सहायता प्रदान की।

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