सरकारों को दून घाटी से उठकर पहाड़ों में झांकना होगा। पलायन केबढ़ते आंकड़ों पर काबू पाने के लिए नई नीति पर कार्य करना होगा। गांवों तकबुनियादी सुविधाएं पहुंचानी होंगी। हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून इस वर्ष उत्तराखंड ने अपनी स्थापना की अठारहवीं वर्षगांठ मनाई। ये उम्र बालिग
- सरकारों को दून घाटी से उठकर पहाड़ों में झांकना होगा। पलायन केबढ़ते आंकड़ों पर काबू पाने के लिए नई नीति पर कार्य करना होगा। गांवों तकबुनियादी सुविधाएं पहुंचानी होंगी।
हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून

इस वर्ष उत्तराखंड ने अपनी स्थापना की अठारहवीं वर्षगांठ मनाई। ये उम्र बालिग होने की है। अपने फैसले खुद लेने की है। आंदोलनकारियों और शहीदों के सपनों पर खड़ा उत्तराखंड भी बाल्यावस्था से यौवन की ओर बढ़ चला है। राज्य ने अठारह साल के अल्प समय में बहुत से नये मुकाम तय किये हैं जो शायद उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते हुए नहीं हो पाते। लेकिन राज्य के सामने चुनौतियां और लक्ष्य बहुत बड़े हैं। उत्तराखंड को अब भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के प्रयास लगातार करने हैं। पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाएं ले जाना राज्य की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। ठीक यही स्थिति शिक्षा को लेकर भी है।
राज्य स्थापना दिवस पर राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने कहा कि राज्य के मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों के बीच आर्थिक-सामाजिक विकास के अंतर को मिटाना होगा। पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं और युवाओं के हाथों में रोजगार देकर ही इस कार्य को किया जा सकता है। युवाओं को प्रदेश के विकास में योगदान करना होगा। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड किशोरावस्था से यौवन की ओर आगे बढ़ रहा है। राज्य निरंतर प्रगति करता रहेगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वयस्क हो चुके उत्तराखंड को तरक्की की राह पर ले जाना है तो हमारे पास विज़न, विल पॉवर और ईमानदारी होनी चाहिए। हम अभी तक विकास के लिए नींव तक नहीं बना सकते हैं, फिर इमारत कब बनेगी। पर्वतीय प्रदेश बनाने का मकसद था कि पर्वतीय क्षेत्र के लोगों की आशाएं-अकांक्षाएं और जरूरतें पूरी करना। इसलिए सरकारों को दून घाटी से उठकर पहाड़ों में झांकना होगा। पलायन के बढ़ते आंकड़ों पर काबू पाने के लिए नई नीति पर कार्य करना होगा। हमारे सैंकड़ों गांव वीरान हो चुके हैं। मकान खंडहर हो गए हैं। ज्यादातर गांवों की आधी से अधिक आबादी पलायन कर चुकी है। इसलिए अब हमें उन गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचानी होंगी। शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के बेहतर साधन उपलब्ध कराने होंगे। उत्तराखंड के सामने ये एक बड़ी चुनौती है।
पशुपालन को भी उद्योग की तर्ज़ पर विकसित किया जाना चाहिए। एक समय में पशुपालकों के पास दो-तीन-पांच हजार बकरियां होती थीं। छोटे पशुपालक के पास भी दो सौ से कम बकरी नहीं होती थी। हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया। पशुपालन से हमारी खाद्य, दूध और पौष्टिक तत्व की जरूरतें पूरी होती ही हैं। ऊन का बड़ा बाज़ार है। इस उद्योग में तरक्की की बेहद संभावनाएं हैं। इससे लोगों को उनके अपनी जगह आजीविका उपलब्ध कराई जा सकती है। फिर वे चंद हजार रुपयों की नौकरी के लिए महानगरों का रुख़ नहीं करेंगे। उत्तराखंड को सशक्त बनाने के लिए सही प्लानिंग की जरूरत है।
- तीन बाइट लगानी हैं –
पर्वतीय क्षेत्र
की समस्याओं पर दें ध्यान
जिस तरह के प्राकृतिक स्रोत उत्तराखंड में मौजूद हैं, हम देश के सबसे अमीर राज्य बन सकते हैं। मेडिको टूरिज़्म हमारी आर्थिकी की रीढ़ साबित हो सकता है। हमारे पास स्वच्छ हवा, स्वच्छ पानी, बढ़िया वातावरण, शांति है। देहरादून में राजपुर से आगे बढ़ें, ऋषिकेश से पहाड़ों की ओर आगे बढ़ें या हल्द्वानी से उपर की ओर, ये जगहें आज भी कुदरत के सौंदर्य को समेटे हुए हैं। इसके लिए हमें यहां इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलप करना होगा। मेडिको टूरिज़्म के लिए स्थानीय लोगों को तैयार करना होगा, इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के साथ-साथ लोगों को प्रमोट करना होगा, उनकी मार्केटिंग करनी होगी। जब मैदानी क्षेत्रों में तीन महीने फॉग और स्मॉग होता है तो पहाड़ों में चटक धूप खिली होती है। इसलिए पहाड़ के लोगों को दिल्ली जाने की जरूरत नहीं बल्कि दिल्ली के लोगों को पहाड़ का रास्ता दिखाना होगा।
- रविंद्र जुगरान, भाजपा नेता
ऊर्जा, हॉर्टीकल्चर, पर्यटन पर हो फोकस
इन अठारह वर्षों में उत्तराखंड ने जो कुछ भी हासिल किया है, यदि ज्यादा मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और सही योजना के साथ कार्य किया गया होता तो शायद हम ज्यादा बेहतर हालात में होते। हम अपनी क्षमताओं को ज्यादा बेहतर बना कर सफलता हासिल कर सकते हैं, न कि अपनी कमज़ोरियों को दूर कर, ये बात उत्तराखंड के लिए बिलकुल सटीक है। राज्य के पास उसकी क्षमताओं को बेहतर बनाने के लिए व्यापक संभावनाएं हैं। हालांकि लगातार प्राथमिकताओं में बदलाव की वजह से राज्य ने उन क्षेत्रों पर कार्य नहीं किया जिसके दीर्घकालिक बेहतर परिणाम हासिल हो सकते थे। हमने उन क्षेत्रों को सही तरीके से पहले चिन्हित ही नहीं किया। जलविद्युत क्षमता, हॉर्टीकल्चर और पर्यटन ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें उत्तराखंड दूसरे राज्यों के मुकाबले काफी बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। लेकिन इन क्षेत्रों पर अब तक पूरी तरह से कार्य नहीं किया गया।
- अनूप नौटियाल, संस्थापक गति फाउंडेशन
पर्वतीय कृषि बने उत्पादक
उत्तराखंड में पर्वतीय कृषि को बेहतर बनाने की जरूरत है। पर्वतीय कृषि को उत्पादक बनाने और रोजगार से जोड़ने के उपाय किए जाने चाहिए। इसके लिए कृषि विश्वविद्यालयों को खेती से जोड़ना चाहिए। हमारे पास पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय जैसी अग्रणी संस्था है। अगर वे किसानों के साथ जुड़कर कार्य करें तो पर्वतीय किसानों की आजीविका बढ़ सकती है। फिर पर्वतीय गांव खाली नहीं होंगे। इंद्रेश मैखुरी कहते हैं कि गांवों में रहने वाले लोग उतनी ही आजीविका जुटा सकेंगे, उन्हें वहीं शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी जो महानगरों में मिलती हैं, तो कोई गांव क्यों छोड़ेगा।पहाड़ का पानी और जवानी उसकी शक्ति है। पर्वतीय क्षेत्रों का पर्यावरण हमारी विरासत है। हमारी नदियां, जैव-विविधता, जड़ी-बूटियां, पर्यटन स्थल, नदियां, स्वच्छ हवा और प्राकृतिक सुंदरता हमारे राज्य की ताकत है। इसे हम मॉडल के रूप में विकसित कर सकते हैं।
– इंद्रेश मैखुरी, सीपीआई
नेता







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