Friday , 4 September 2026
Home उत्तराखंड न्यूज़ अल्मोड़ा कामकाजी आबादी का तेजी से पलायन, अल्मोड़ा से मोहभंग क्यों?
अल्मोड़ाएक्सक्लूसिव

कामकाजी आबादी का तेजी से पलायन, अल्मोड़ा से मोहभंग क्यों?

प्रकृति की अनुपम छटा से भरपूर अल्मोड़ा जैसे हिमालयी जिले क्यों अपने लोगों को खो रहे हैं। अपने पुरखों के घर छोड़कर क्यों लोग महानगरी भीड़ का हिस्सा बनने के लिए भाग रहे हैं। घर छोड़कर जा चुके लोगों को वापस बुलाने के लिए किस तरह के प्रयास की जरूरत है। कहां कमी रह गई, कहां सुधार करें, जिससे पहाड़ की पगडंडियों से उतरकर, अपनी नदियों की ओर मुंह फेरकर, अपने हिमालय की ओर पीठ कर भीड़ में खो रहे लोगों को उनकी वादियों में वापस लौटाया जा सके। जिन घरों के दरवाजों पर ताले लटक गए हैं, उन बंद दरवाजों को फिर खोला जा सके। बंद दरवाजों पर दस्तक देने के लिए क्या करना होगा, अल्मोड़ा पर तैयार की गई पलायन आयोग की रिपोर्ट इस बारे में कई खुलासे करती है। अब इसे पूरा करने के लिए राजनीतिक जिजीविषा की जरूरत है।

ग्राम्य विकास और पलायन आयोग ने पौड़ी के बाद अल्मोड़ा जिले में पलायन की समस्या को लेकर अपनी दूसरी रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में पलायन की वजह समझने और इसे कम करने के उपाय को लेकर सुझाव दिये गये हैं। गांवों की अर्थव्यवस्था सुधारना ही उत्तराखंड में पलायन की समस्या से निपटने का एक मात्र उपाय है। यदि हम गांव के लोगों को उनकी अपनी जगह पर रोजगार मुहैया कराने में सफल हो जाएंगे तो न सिर्फ पलायन की चिंता दूर होगी बल्कि राज्य आर्थिक आत्मनिर्भरता की ओर सशक्त कदम बढ़ाएगा। पलायन आयोग ने अल्मोड़ा से पलायन को लेकर जो रिपोर्ट जारी की है, उसमें यही बात सामने आती है।

 हैरान करती है अल्मोड़ा की पलायन रिपोर्ट

अल्मोड़ा में महिलाओं की आबादी (3,31,425) पुरूषों की आबादी (2,91,081) की तुलना में अधिक है। मतलब पुरुष कार्य के लिए बाहर चले गए हैं और जिले की अधिक ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधे पर टिकी है। इसी तरह यहां 90 फीसदी लोग गांवों में रहते हैं। यानी अल्मोड़ा में पलायन की स्थिति को सुधारने के लिए गांवों के हालात सुधारने होंगे। पलायन आयोग के मुताबिक जनपद की जनसंख्या वृद्धि दर माइनस 1.64 प्रतिशत है, लेकिन ग्रामीण आबादी में ये वृद्धि दर माइनस 4.20 प्रतिशत है। यानी गांवों से लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इसके साथ ही 20 से 49 वर्ष की आयु के 38 फीसदी लोग ही यहां रहते हैं, तो जो कामकाजी आबादी है, वो पलायन कर रही है। रोजगार यहां सबसे बड़ी चिंता है।

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में 1022 ग्राम पंचायतों के कुल 53,611 लोग घर छोड़ कर जा तो चुके हैं, लेकिन वे समय-समय पर अपने गांवों में आते रहते हैं। जबकि इसी अवधि में 646 ग्राम पंचायतों से 16,207 लोग स्थायी रूप से अपने घर-गांव छोड़कर जा चुके हैं।

पलायन आयोग का सुझाव है कि ग्रामीण आय को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक ग्राम पंचायतों या ग्राम पंचायतों के समूह की विशेषताओं को समझना चाहिए। उदाहरण के तौर पर जो गांव पर्यटन के लिहाज से बेहतर हैं, वहां पर्यटन के लिए कार्य किए जाएं। बहुत से ऐसे गांव हैं जहां धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है।

पारंपरिक खेती छोड़ रहे किसान

रिपोर्ट के मुताबिक अल्मोड़ा के किसान पारंपरिक खेती से दूर हो रहे हैं। इसलिए सिर्फ खेती और बागवानी पर ध्यान देने की जगह रोजगार के अन्य विकल्प तैयार करने होंगे। रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के चलते यहां फसल उत्पादन के तरीकों में बदलाव हो सकता है। इसलिए किसी भी नीति को तैयार करते समय जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखना होगा। साथ ही गांवों में बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कराने पर ध्यान देना होगा। पीने और सिंचाई  के पानी की समस्या के चलते भी कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। गांवों के आसपास स्वास्थ्य सेवाएं, सड़क, अच्छी शिक्षा न होने से भी लोग पलायन कर रहे हैं।

पलायन आयोग के मुताबिक किसान उत्पादक संगठनों और किसानों से जुड़े समूहों को विकास केंद्रों से जोड़ना चाहिए। साथ ही ऐसी फसलों का उत्पादन किया जाना चाहिए जिनके लिए बाजार में अधिक मांग है। किसान और बाजार के बीच की दूरी भी कम करनी होगी। पलायन आयोग के मुताबिक मौसमी सब्जियों, फलों और दूसरे कृषि उत्पादों को बेचने के लिए तीन घंटे की दूरी पर मंडी और रेलवे स्टेशन होने चाहिए।

जिले के लमगड़ा जैसे विकासखंड में किसान बड़े पैमाने पर सब्जियां उगा रहे हैं लेकिन बाजार उपलब्ध नहीं होने की वजह से कई बार उनका माल वापस आ जाता है और उन्हें उनके उत्पाद की अच्छी कीमत नहीं मिल पाती। फिलहाल अल्मोड़ा से सब्जी को हल्द्वानी की मंडियों में ले जाया जा रहा है।

पारंपरिक खेती की जगह बेमौसमी फसलें, फूड प्रॉसेसिंग, डेयरी और दुग्ध उत्पादों के प्रॉसेसिंग से किसानों का जीवन बेहतर बनाया जा सकता है। जिले में फिलहाल फूड प्रॉसेसिंग के क्षेत्र में बेहद कमियां हैं। दालों के लिए कोई प्रसंस्करण सुविधा नहीं है। इसी तरह यहां आलू को प्रॉसेस करने की इकाइयां स्थापित की जा सकती है। पॉली हाउस की संख्या बढ़ाई जा सकती है। साथ ही फल प्रसंस्करण की इकाइयों की स्थापना की जा सकती है।

ग्रामीण क्षेत्रों को मज़बूती देने के लिए दुग्ध उत्पादन और पशुपालन पर भी ध्यान देने को कहा गया है। इसके अलावा चाय बागान भी अल्मोड़ा के लोगों को अच्छी आमदनी दे सकते हैं। फिलहाल अल्मोड़ा में धौला देवी, ताकुला और चौखुटिया में कुल 306 हेक्टेअर में चाय के बागान हैं। लेकिन भैसियाछाना, भिकियासैंण, हवालबाग, लमगड़ा और स्याल्दे में भी चाय बागानों के लिए अच्छी संभावना है। यहां धौलादेवी विकास खंड में एक चाय फैक्ट्री लगाने का भी प्रस्ताव है। पलायन आयोग के मुताबिक मुताबिक चाय बागान टी टूरिज्म को भी बढ़ावा दे सकते हैं।

महिलाओं के विकास से होगा क्षेत्र का विकास

पलायन आयोग इस पहाड़ी जनपद में महिला केंद्रित योजनाओं को लागू करने का सुझाव देता है। दरअसल राज्य के सभी पहाड़ी जनपदों के ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आबादी अधिक है। पहाड़ों में खेती का जिम्मा भी महिलाओं के कंधे पर है। जबकि ज़मीन पर मालिकाना हक पुरुष का है। ऐसे में महिलाओं की स्थिति खेत के मज़दूर जैसी हो जाती है। इसलिए आयोग के मुताबिक महिला किसानों को भी ज़मीन का हक़ देने वाली नीति होनी चाहिए। इससे महिलाएं कृषि ऋण हासिल कर सकती हैं और उनके सामाजिक-आर्थिक विकास से क्षेत्र का विकास संभव होगा।

राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में अभी जलागम, मनरेगा, ग्रामीण आजीविका, प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी योजनाओं के ज़रिये कार्य किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी के लिए मनरेगा पर लोगों की निर्भरता बढ़ी है। उसमें भी 55 फीसदी महिलाएं मनरेगा से रोजगार हासिल कर रही हैं।

पलायन आयोग के मुताबिक अल्मोड़ा के सल्ट, स्याल्दे, भिकियासैंण और भैंसियाछाना विकासखंड ग्रामीण विकास के मामले में सबसे पीछे हैं। इन क्षेत्रों में सबसे अधिक कार्य किये जाने की जरूरत है। अल्मोड़ा में ही लमगड़ा विकास खंड में कुछ स्वयं सहायता समूहों ने टेक होम राशन योजना पर कार्य किया। पलायन आयोग के मुताबिक इससे इन स्वयं सहायता समूहों को अच्छा लाभ मिला है। इस प्रयोग को पिछड़े विकास खंडों के साथ पूरे राज्य में अपनाया जा सकता है।

आयोग के मुताबिक ग्रामीण विकास विभाग में फील्ड स्टाफ की कमी है इसलिए कुछ जगहों पर एक ग्राम विकास अधिकारी पर 25 से अधिक ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी है। इसलिए यहां फील्ड स्टाफ को बढ़ाया जाना चाहिए।

पर्यटन से खिलेगा अल्मोड़ा

पर्यटन जैसे क्षेत्रों से गांवों को जोड़कर उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है। इसके लिए कौशल विकास जैसे कार्यक्रमों की मदद ली जा सकती है। अल्मोड़ा स्थित जीबी पंत इस्टीट्यूट के डॉ जेसी कुनियाल भी कहते हैं कि हमें विलेज ट्यूरिज्म पर ध्यान देना चाहिए। जिससे ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है। पर्यटन राज्य में आमदनी का एक महत्वपूर्ण ज़रिया है, इससे गांवों को जोड़ने की जरूरत है। इस दिशा में कार्य किया जाना चाहिए।

पलायन आयोग के मुताबिक जनपद में प्राकृतिक तौर पर खूबसूरत जगहों के साथ ही धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की भी अपार संभावनाएं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अल्मोड़ा आने वाले पर्यटकों की संख्या नैनीताल की मात्र 20 फीसदी है। इसलिए नए पर्यटन स्थल विकसित किये जा सकते हैं। इको टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा सकता है। प्रकृति- पर्यटन के बीच स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ायी जा सकती है। होम स्टे जैसी योजनाएं यहां कारगर हो सकती हैं। क्योंकि विदेशी पर्यटक भी होम स्टे लिए आकर्षित हो रहे हैं। और घरेलू पर्यटकों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। आयोग कहता है कि हमें गांवों की सड़कों को बेहतर बनाना होगा ताकि पर्यटक आसानी से यहां पहुंच सकें।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles