भारत का भाल, देवभूमि उत्तराखंड, देश का सताइसवाँ राज्य बनकर, 9 नवम्बर 2000 को, उत्तराखण्डियों के सपने को साकार करने के लिये, धरातल पर एक पृथक राज्य बन कर उतरा। इन बीते 12 वर्षों में, क्या यहाँ के निवासियों के सपने पूरे हुए? क्या इस
भारत का भाल, देवभूमि उत्तराखंड, देश का सताइसवाँ राज्य बनकर, 9 नवम्बर 2000 को, उत्तराखण्डियों के सपने को साकार करने के लिये, धरातल पर एक पृथक राज्य बन कर उतरा। इन बीते 12 वर्षों में, क्या यहाँ के निवासियों के सपने पूरे हुए? क्या इस दिशा में, कुछ कदम आगें बढ़ रहे हैं या आज भी यहाँ रहने वालों के मन में, प्रश्नचिन्ह ही पैदा हों रहें हैं ? कहाँ तक सपने पूरे हुये तथा इनको पूरा करने के प्रयासों में कहाँ कमियां रही, इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
उत्तराखंड के मानचित्र पर यदि दृष्टि डाली जाय तो राज्य के 53,484 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल में से 35,651 वर्ग कि.मी., वन क्षेत्र है तथा जनसंख्या 10,116,752 हैं। राज्य 13 जिलों में बंटा है व 4 नये जिले घोषित हैं। पहाड़ी क्षेत्र की ओर, अन्तराष्ट्रीय सीमा, चीन व नेपाल से लगी है। चीन की कुःदृष्टी, हमेशा भारत के पर्वतीय क्षेत्रों को हड़पने पर लगी रहती हैं। नेपाल माववाद के घेरे में जकड़ा है। माओवादी उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में अपना प्रभाव डालने तथा धीरे-धीरे गंावों में अपना जाल बिछाने व चुप-चाप अपने पैर जमाने की ओर अग्रसर हैं।
राष्ट्रीय सीमा पर जहाँ एक ओर डा. वाई.एस. परमार के दूरदर्शी का असर, हिमाचल प्रदेश की खुशहाली के तौर पर देखने को मिलता है वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की ओर से असमाजिक तत्वों का निरन्तर घुसपैठ, पुलिस का सरदर्द बना है। भ्रष्टाचार के घुण ने देश को जिस तरह अपनी ग्रस्त में ले लिया है उससे उत्तराखंड कैसे अछूता रह सकता है। यदि युवाओं की बात की जाय तो वह भी बे-रोजगारी की मार से इस तरह विचलित हो चुके हैं कि किस तरह से कम से कम मेहनत कर, अधिक से अधिक धन अर्जित कर, आराम व आलीशान जिन्दगी जी सकें।
आज, आवश्यकता है, देश व प्रदेश के बुद्धिजीवीयों को निःस्वार्थ होकर, आगे आने की। उत्तराखंड ही नहीं, सम्पूर्ण भारत वर्ष को दिशा-निर्देश देने की। गांधी, सुभाष व भगत सिंह तथा अन्य स्वतन्त्रता सेनानियों की कुर्बानीयों को याद करने की। देश के मान चित्र को बदलने के लिये, भूचाल लाने की, ताकि भारत वर्ष में पुनः राम राज्य स्थापित हो।
विचार करना होगा, शिक्षा पद्धति में बदलाव लाने पर। शिक्षा जहाँ राज्यों का विषय है वहीं केन्द्रीय सरकार को पूरे देश में, शिक्षा सत्र को बदलने पर विचार करना होगा। प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा व तकनीकी शिक्षा का सत्र एक साथ शुरू हो। पूरे देश में शिक्षा सत्र, फरवरी माह में प्रारम्भ हो। नवम्बर माह में परीक्षायें पूर्ण हों। दिसम्बर में परिणाम घोषित हों। अगले सत्र की प्रवेश-परीक्षायें, जनवरी में पूर्ण कर, परिणाम घोषित हों।
उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुये, पहाड़ों से पलायन को रोकने के लिये, उचित कदम, उठाने की आवश्यकता है। इसके लिये, पहाड़ों में रोजगार व स्वः रोजगार की व्यवस्था सरकार को करनी होगी। वहाँ पर बच्चों के लिये अच्छी शिक्षा, जिसमें पब्लिक स्कूल पद्धति शामिल हो, उच्च व तकनीकी शिक्षा तथा अच्छी स्वास्थ्य सेवा लानी होंगी। भूमि व अन्य सम्पति अर्जित करने पर बाहरी लोगों का, जिसमें कृषिभूमि का इस्तेमाल भी शामिल हो, पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना होगा। इससे माओवाद को दूर रखने में मदद मिलेगी। यदि इस ओर समय पर ध्यान न दिया गया तो ऐसा न हो कि भारत को 1962 की तरह चीन की कुःदृष्टि का शिकार बनने की नौबत फिर से झेलनी पड़े। चीन ने भारत की सीमाओं के नजदीक जिस तरह अपना जमघट शुरू कर रखा है तथा सड़को, रेल व हवाई अड्डों का जाल बिछाने का लगातार प्रयास कर रखा है, उसकी नजर भारत को कमजोर करने की तथा भारत में विकास को 50 वर्ष पीछे धकेलने की, इच्छा को नजर अन्दाज नहीं किया जाना चाहिये।
उत्तराखंड एक सैन्य बाहुल्य, प्रदेश होने के नाते, यहाँ पर अनुभवी पूर्व सैनिक व अर्धसैनिक, भारी तादाद में निवास कर रहे हैं। उनके अनुभवों को सही दिशा में इस्तेमाल करते हुये, उन्हे युवाओं को, ग्राम व विकास खंड स्तर पर, सैन्य शिक्षा देने के लिये उपयोग करने के लिये, योजनाएं बनाने की आवश्यकता है। हर वर्ष, उत्तराख्ंाड आपदावों की मार झेलता है। इन युवाओं व अनुभवी पूर्व सैनिकों तथा अर्द्ध सैनिकों का भरपूर इस्तेमाल करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। गहरी खाइयों तथा नदियों में, आपदा में शिकार हुये ग्रामीणों की मदद करने के लिये, इनकों विशेष टेªनिंग दी जा सकती हैं।
उत्तराखंड में सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, सरकार को प्रदेश के हित में विकास को ध्यान में रखते हुये, भ्रष्टाचार से दूर रहकर, कार्य करने की आवश्यकता है। पिछली सरकारों के प्रारम्भ किये कार्यो को आगे बढ़ाते हुये, नये-नये कार्य करने की आवश्यकता है ना कि गढ़े मुर्दे खोदने में अपना समय तथा राज्य के धन का बर्बाद करने में, समय बिताने की। इसी तरह विपक्ष को भी सरकार के हर निर्णय पर मंथन कर, सरकार से यदि आवश्यक हो तो उसी समय, वार्ता कर, विकास के कार्यों में अपना सहयोग देने की आवश्यकता है। सरकार द्वारा जो भी घोषणायें की जायंे, उन पर विपक्ष के साथ भी मंथन किया जाय और फिर उनको धरातल पर लाया जाय, ताकि घोषणाएं सिर्फ कागजों या फाइलों तक ही सीमित न रह जायंे।
यदि सरकार व विपक्ष एक जुट होकर, सिर्फ विकास को मुद्दा बना कर, एक दूसरे पर विश्वास करते हुए निः स्वार्थ भाव से कार्य करें तो उत्तराखंड को अगले 10 वर्षो में, फिर से भारत का भाल बनाते हुये, भारत वर्ष केे मानचित्र पर ‘‘श्रेष्ट विकसित राज्य’’ के रूप में देखा जा सकता है तथा उत्तराखण्डियों के सपनों को, सही माइनों में पूरा किया जा सकता है।
एस एस कोठियाल, पूर्व आईजी बीएसएफ थे और अब हिलमेल के संरक्षक हैं।







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