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उत्तराखंड का 14 वर्ष का रिपोर्ट कार्ड

9 नवम्बर 2014 को उत्तराखंड राज्य के बने 14 साल पूरे हो गए। इन 14 सालों में उत्तराखंड राज्य से जो अपेक्षा की जा रही थी वह शायद उसमें खरी नहीं उतरी है। इस दिन जब उत्तराखंड में नई सुबह ने जन्म लिया था तो

Vidhan_Sabha9 नवम्बर 2014 को उत्तराखंड राज्य के बने 14 साल पूरे हो गए। इन 14 सालों में उत्तराखंड राज्य से जो अपेक्षा की जा रही थी वह शायद उसमें खरी नहीं उतरी है। इस दिन जब उत्तराखंड में नई सुबह ने जन्म लिया था तो हर उत्तराखंडी की आंखों में एक सपना था। सपना कि पर्वत अपने बेटों के सुख से वंचित न हो। इसी सपने को साकार करने के लिए एक और सपना देखा गया था कि पहाड़ों का सीना चीरकर निकल जाने वाली नदियों का पानी ही जवानी को रोकने की बुनियाद बने। मगर बीते 14 वर्षो में पहाड़ के काम न आने वाले पानी और जवानी के इस मुद्दे पर सियासी जमात महज जबानी खर्च करती रही। पहाड़ की नदियों से इतनी ऊर्जा पैदा ही नहीं हो सकी कि वह अपनी जन्मभूमि छोड़ने को मजबूर जवानी के कदम रोक ले, इसके उलट बिजली बनाने और विकास के नाम पर पहाड़ों को खोखला कर दिया गया।

अब हर साल बरसात में खोखले पहाड़ हमें डराते हैं। जिस पानी को प्रदेKedarnathश की ताकत बनना था वही खौफ जगाता है। पिछले साल की केदारनाथ आपदा इसकी गवाह है इस आपदा ने जहां राज्य के पर्यटन उद्योग को भारी नुकसान पहंुचाया वहीं राज्य की मशीनरी पर भी कई सवाल उठने लगे। दरअसल इन बीते 14 सालों में राज्य से जुड़े तमाम सपनों पर एक-एक कर पानी फिरता चला गया और इन उम्मीदों को तोड़ने का ठीकरा उन तमाम लोगों के सिर फूटता है जिनके सिर जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ जीत का सेहरा बांधा।

केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा उत्तराखंड ही नहीं देश की भीषणतम आपदाओं में से एक है। पिछले साल 16 और 17 जून को केदार घाटी में आई तबाही के कारण हजारों लोगों का जनजीवन प्रभावित हो गया था। इस आपदा में हजारों लोग मारे गये और भारी जन-धन का नुकसान हुआ। यह घटना यूं तो प्रकृति के कहर का एक नमूना थी मगर इतनी बड़ी हानि के लिए कहीं न कहीं राज्य का लचर आपदा प्रबंधन तंत्र भी जिम्मेदार है। उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य है, जहां अलग से आपदा प्रबंधन मंत्रालय की स्थापना की गई थी। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पहली अंतरिम सरकार ने ही अलग आपदा प्रबंधन मंत्रालय बना लिया गया था लेकिन विडंबना यह कि धरातल पर इसके लिए अब तक कोई ढांचा तक तैयार नहीं किया गया। यह ठीक है कि आपदा पर किसी का वश नहीं चलता, लेकिन इसके प्रभाव को कम करने की दिशा में तो कारगर कदम सरकार को ही उठाने थे।

समझ में नहींutc16b-B आता कि हम उत्तराखंडी क्यों लकीर के फकीर बने रहते हैं, क्यों हम लोग कुछ राजनैतिक तत्वों के बहकावे में आकर ऐसे मुद्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर देते हैं जो कि हमें उत्तराखंड के आधारभूत आवश्यक मुद्दों से दूर ले जाते हैं। आइये पहले एक नजर डालते हैं अपने पड़ोसी राज्य हिमाचल पर। हिमाचल प्रदेश का शाब्दिक अर्थ बर्फीले पहाड़ों का प्रांत है। बारहमासी नदियों की बहुतायत के कारण, हिमाचल अन्य राज्यों को पनबिजली बेचता है जिनमें प्रमुख हैं दिल्ली, पंजाब और राजस्थान। राज्य की अर्थव्यवस्था पनबिजली, पर्यटन और कृषि तीन प्रमुख कारकों पर निर्भर करती है।

उत्तराखंड से तुलना करने पर देखें तो दोनों राज्यों में काफी हद तक भौगोलिक समानतायें हैं दोनों राज्यों की आमदनी का मुख्य जरिया पनबिजली और पर्यटन है उसके बावजूद भी हिमाचल प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय उत्तराखंड ही क्या बल्कि भारत के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे अधिक है। कहीं ऐसा तो नहीं हम सभी उत्तराखंडी लोग कुछ राजनैतिक दलों के अपने स्वार्थ के लिये खेले जाने वाले खेल के मोहरे बनते जा रहे हों ? पहले ‘उत्तरांचल’ से ‘उत्तराखंड’ राज्य के नाम में परिवर्तन जहां एक तरफ कुछेक राजनैतिक दलों के लिये अपनी पहचान बनाने का साधन रहा। जिसमें कितनी ही स्टेशनरी बर्बाद गई होगी और कितना ही खर्च सिर्फ नाम बदलने में लगा होगा।

पृथक उत्तराखंड राज्य बनने से लेकर अब तक उत्तराखंड के ज्वलंUttarakhand assembly camps in Gairsainत मुद्दों में एक है गैरसैण राजधानी का मुद्दा। राज्य स्थापना के समय से ही यह मांग और प्रयास किये जा रहे हैं कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून को हटाकर गैरसैंण बनायी जानी चाहिये। राज्य सरकार ने इस वर्ष गैरसैंण में तम्बुओं के नीचे विधानसभा का विशेष सत्र शुरू किया। कुछ एक मित्रगणों का मानना है कि उत्तराखंड की गैरसैण राजधानी उन मृतक क्रान्तिकारियों का सपना था जिन्होंने इस राज्य की स्थापना के आन्दोलन में अपने प्राणों की आहुति दे दी अतः उनका यह सपना अवश्य पूर्ण किया जाना चाहिये…। आज गैरसैंण में एक विधानसभा का पत्थर रखवाकर सबकी नजर वहां राजधानी बनवाने पर लगी है। क्या वो पैसा उत्तराखंड के विकास में काम नहीं आ सकता था? गैरसैंण में ‘अस्थायी टैंट’ में एक विधानसभा सत्र चलवाने के लिये बीस करोड़ रुपये खर्च करवा दिये गये.. लेकिन अगर यह विधानसभा सत्र हमेशा की तरह देहरादून में ही चलता और यह बीस करोड़ रूपये पिछले साल आपदा में आये परिवारों को राहत राशि के रूप में बाटें जाते तो कितने परिवारों का भला होता?

हिमाचल प्रदेश में सन् 1952 से अब तक 62 सालों में 13 बार में पांच मुख्यमंत्री हुये हैं (श्री यशवंत सिंह परमार, श्री ठाकुर राम लाल, श्री शांता कुमार, श्री प्रेम कुमार धूमल, श्री वीरभद्र सिंह) जबकि हमारे उत्तराखंड में मात्र 14 सालों में सात मुख्यमंत्री बदले गये हैं…. छोटे से राज्य में अलग अलग राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों की आपसी प्रतिस्पर्धा और गुटबाजी से यह अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के विकास के लिये कौन कितना समर्पित है। ध्यान रहे कि हम विकास के नाम पर पिछड़ते और सिर्फ पिछड़ते ही जा रहे हैं। गौरतलब हो 9 नवम्बर 2000 को उत्तर-प्रदेश से अलग हुये उत्तराखंड को राज्य गठन के बाद से ही पर्यटन प्रदेश का तमगा मिला हुआ था, और इन पिछले सालों में उत्तराखंड ने भारत के शीर्ष के दस पर्यटन राज्यों में अपनी गिनती बनाये रखी लेकिन आज हम उस गिनती से भी बाहर हो गये हैं।

UK-mapसन् 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ था। इन राज्यों में छत्तीसगढ़ आजकल सबसे विकसित राज्यों में से एक है। अगर हम छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड राज्य की तुलना करें तो इस राज्य से हम कई मामलों में पीछे चल रहे है। जैसे छत्तीसगढ़ राज्य में लोगों को राशन, शिक्षा और स्वास्थय इन तीन मूलभूत जरूरतों को राज्य सरकार पूरा करती है। राज्य के गठन के बाद से छत्तीसगढ़ में केवल दो मुख्यमंत्री ही बने हैं वहीं उत्तराखंड में अब तक सात मुख्यमंत्री बन चुके हैं। इसके अलावा उत्तराखंड में सभी पार्टियों के नेता अपने ही अंतरकलह में फंसे हुए है। सबको अपनी ही परवाह रहती है जब तक कि वह राज्य के लिए कुछ करने की सोचते हैं तब तक वह उस पद से हट जाते हैं जहां से कि वह राज्य के लिए कुछ करें। नेताओं के आपसी अंतरकलह ने ही राज्य का बेड़ा गर्क कर रखा है।

वरिष्ठ समाचार सम्पादक सुशील बहुगुणा का मानना है कि इन सब नाकामियों के लिए कोई एक दल जिम्मेदार हो ऐसा भी नहीं है। राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी इसमें बराबर की हिस्सेदार हैं। बीते 14 सालों में कमोवेश दोनों ने ही राज्य पर आधा-utc20b-C1आधा राज किया और पूरा-पूरा बंटाधार। राज्य जब बना तो जनता को लगा कि चलो देर से ही सही अब तो उसके दिन फिरंेगे। लेकिन नेताओं के भाग्य से छींका उनके सिर फूटा और सत्ता की बंदरबांट पहले ही दिन से शुरू हो गई।

पहले दौर की सरकार कामचलाऊ और बेहद थकाऊ साबित हुई और दूसरी सरकार ने देश के सबसे वरिष्ठ नेता के उदासीन शासन में भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। तीसरे दौर में जब अड़तीस साल फौज के सख्त अनुशासन में कसे एक अपेक्षाकृत नवोदित नेता ने सियासत की पुरानी रवायतें तोड़कर राज्य को पटरी पर लाने की कुछ कोशिशें कीं तो अवसरवादी नेताओं, भ्रष्ट अफसरों, शराब कारोबारियों और भू माफियाओं की चैकड़ी ने मिलकर उसे ही गिरा दिया और फिर जिसके मुंह जो टुकड़ा लगा वो उसे लेकर चलता बना।

अब एक और सरकारA house caves in at Prem Nagar area due to heavy rains है। सरकार क्या है कांग्रेस की अंदरूनी सियासी खींचतान के बीच बना एक संतुलन है जो जब टूटेगा तो दोनों ओर दांत राज्य की जनता के ही टूटेंगे। राज्य को लेकर छाए इस निराशावाद के बीच सत्ता सुख भोगने वाले नेताओं से बात करो तो वो कुछ आंकड़ों से रोशनी दिखाने की कोशिश करते हैं। लेकिन वो या तो समझते नहीं या समझकर भी अनजान बने रहते हैं कि अंकगणित की इस चाशनी में राज्य की जनता को अपनी परछाई धुंधली ही दिखती है।

इन नेताओं की बात अगर कुछ हद तक मान भी ली जाए कि राज्य के कुछ कोनों में विकास के दिए टिमटिमा रहे हैं तो वो दिए उस पहाड़ पर नहीं हैं जिसके विकास की अवधारणा को लेकर अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई और जीती गई। ये बरकत उन इलाकों में आई है जहां का एक बड़ा वर्ग पहले तो बड़े बेमन से इस राज्य का हिस्सा बना और फिर राज्य गठन के कई साल बाद तक भी वापस उत्तर प्रदेश में लौटने को तड़पता रहा। आज तथाकथित विकास का मख्खन उसके ही हिस्से आया है। और पहाड़ के हिस्से छांछ भी नहीं। भ्रष्ट नेताओं, अफसरों और भू माफियाओं की ही करनी है कि बीते चैदह साल में उत्तराखंड को ऐशगाह के एक प्लाॅट से ज्यादा नहीं समझा गया जिसके टुकड़े सबने आपस में बांट लिए। जमीन की अंधाधुंध ख़रीद फरोख्त ने कई भोले भाले लोगों को उनकी ही जमीन पर बेगाना बना दिया।

इस दौर में उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों की लूट घटने के बजाय कहीं ज्यादा बढ़ गई। विकास का नया माॅडल बताकर बड़े-बड़े बांध बनाने आई कंपनियों ने स्थाHeavy rain in Garhwalनीय लोगों को भी लूटा, जल, जंगल और जमीन को भी। आज हालत ये है कि ऊर्जा प्रदेश के तौर पर पेश किए गए राज्य में खुद के लिए ही ऊर्जा पूरी नहीं पड़ रही है। उलटा कई अधूरी परियोजनाओं ने पर्यावरण का और सत्यानाश कर दिया है। हजारों लोग अपने ही घरों के आसपास बेघर हैं।

राज्य की व्यवस्था में भ्रष्टाचार का दीमक इस कदर गहरा बैठ गया है कि कई बार लगता है कि इस मर्ज का कोई इलाज नहीं। पहाड़ से पलायन जारी है। गांव के गांव खाली हो रहे हैं। पहाड़ी घरों में ताले पड़े हैं। कभी लहलहाते सीढ़ीदार खेतों में भी चीड़ के जंगल उग आए हैं। जंगलों में बांज, बुरांस और देवदार के पेड़ बस इतने ही बचे हैं जितने सरकारी व्यवस्था में ईमानदार अफसर और कर्मचारी। पानी के प्राकृतिक स्रोत सूखते जा रहे हैं। घाटियों का गला सूख रहा है। पहाड़ों की सांस उखड़ रही है। 14 साल में इतना कुछ खोने के बाद रोने को ऐसा बहुत कुछ है। लेकिन उम्मीद फिर भी बाकी है। क्यों ना इस मुट्ठी भर उम्मीद को हकीकत के आसमान में बदल दिया जाए।

वाई एस बिष्ट
संपादक

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