उन्मुक्त चंद की आस्ट्रेलिया के विरुद्ध खेली गई विजयदायी नाबाद 111 रन की पारी को अनेक वर्षों तक याद रखा जाएगा, जिसके बल पर भारत ट्राफी को चूम सका। दिल्ली के स्कूल टीचर भरतचंद के पुत्र उन्मुक्त चंद ने दिल्ली पब्लिक स्कूल और मॉडर्न स्कूल
उन्मुक्त चंद की आस्ट्रेलिया के विरुद्ध खेली गई विजयदायी नाबाद 111 रन की पारी को अनेक वर्षों तक याद रखा जाएगा, जिसके बल पर भारत ट्राफी को चूम सका। दिल्ली के स्कूल टीचर भरतचंद के पुत्र उन्मुक्त चंद ने दिल्ली पब्लिक स्कूल और मॉडर्न स्कूल से अपनी स्कूलिंग की और इसी दौरान उनका लगाव क्रिकेट से हो गया। चाचा सुन्दरचंद ने इनकी प्रतिभा को पहचाना और प्रोत्साहन दिया तो उन्मुक्त शीघ्र ही निखरने लगा। उन्मुक्त ने अपने आकर्षक खेल से दिल्ली की अंडर-15, अंडर-16 टीमों में स्थान बना लिया। इस समय वह सेंट स्टीफन कालेज में पढ़ते हुए एल.बी. शास्त्री क्लब की ओर से खेलते हैं और प्रख्यात कोच संजय भारद्वाज, जो गौतम गंभीर के भी कोच हैं, से कोचिंग ले रहे हैं। उन्मुक्त चंद उत्तराखंड की भूमि से उपजा एक नया सितारा है, जिसकी तरफ सबकी निगाहें लगी हुई हैं। वह भविष्य का महेंद्र सिंह धौनी है, सचिन तेंडुलकर हैं।
उन्मुक्त चंद मूल रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के रहने वाले हैं। उसके पिता भरत चंद ठाकुर राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय सूरजमल विहार में शिक्षक हैं। 26 जून 1993 को जन्मे उन्मुक्त भरत चंद ठाकुर का नामकरण की कहानी भी दिलचस्प है। भरत चंद ठाकुर ने बताया कि उसके जन्म के बाद अस्पताल की डॉक्टर डॉ. खंडूरी ने कहा कि वह अपने बच्चे का नाम उन्मुक्त रखना चाहती थीं। पर ऐसा नहीं हो सका। यदि एतराज नहीं हो तो इस बच्चे का नाम उन्मुक्त रख सकते हैं।
भरत चंद ठाकुर ने बताया कि उन्मुक्त ने बचपन में कास्को की गेंद से घर के छत पर क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। उसे पहली गेंद उसकी दादी ने दी थी। गेंद नीचे न गिरे इसके लिए छत पर चारों तरफ से चादर लगा देते थे। बाद में बेसमेंट में अभ्यास शुरू किया। इसी दौरान नोएडा स्थित डीपीएस में नामाकंन मिल गया। छह साल में उसे लेदर की गेंद पर अभ्यास शुरू करा दिया। एक बार मैने गेंद किया और गेंद हेल्मेट के अंदर चली गई। इस वजह से उसकी नाक चोटिल हो गई। इंद्र विष्ट नामक स्थानीय कोच ने सलाह दी कि यदि उसे क्रिकेटर बनाना है तो किसी अच्छे क्लब व कोच से संपर्क करो। राज्यस्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना होगा। इसके बाद मॉर्डन स्कूल में उसने क्रिकेट सीखना शुरू किया। एमपी सिंह उसके बचपन के कोच हैं। इसके अलावा उन्मुक्त ने तीन-चार साल तक नेशनल स्टेडियम में अभ्यास किया। पहली बार में दिल्ली एंड डिस्ट्रिक क्रिकेट एसोसिएशन के अंडर-15 के लिए ट्रायल देने पर सलेक्शन नहीं हुआ। बाद के सत्र में लीग मैचों में सर्वाधिक 300 स्कोर किया।
उन्मुक्त पढ़ने में खासा रूचि लेते हैं। उनकी लाइब्रेरी में राहुल द्रविड़ की जीवनी से लेकर कई महान क्रिकेटरों व लेखकों द्वारा लिखित पुस्तकें हैं। उन्मुक्त बॉब बूल्मर द्वारा लिखित पुस्तक ‘आर्ट एंड सांइस ऑफ क्रिकेट’, गोपी नाथ द्वारा लिखित ‘सिमप्ली फ्लाई कैप्टन’, माइक ब्रेएरले द्वारा लिखित ‘आर्ट ऑफ कैप्टेनसी’ सहित दर्जनों किताबें पढ़ चुके हैं। उन्मुक्त खेलने के साथ-साथ पढ़ने में भी अव्वल रहे हैं। 10वीं में 85 प्रतिशत अंक लाने वाले उन्मुक्त सेंट स्टीफन कॉलेज में स्नातक द्वितीय वर्ष के छात्र हैं। सेमेस्टर दो की परीक्षा में डीयू ने यह कहकर परीक्षा में बैठने से मना कर दिया कि स्पोर्ट्स कोटे के लिए जरूरी 35 प्रतिशत उपस्थित नहीं है।
उनमुक्त को नजदीक से जानने वाले और हिलमेल के मानद प्रधान सम्पादक एस के नेगी के मुताबिक समुचित खेल सुविधाओं से वंचित पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के लिए यह सुखद संयोग है कि इस राज्य ने एक साल के अंदर भारत को दो विश्वकप दिलाने वाले कप्तान दिए हैं। भारत की वनडे विश्वकप विजेता टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी और अंडर-19 विश्वकप जीतने वाली टीम के कप्तान उन्मुक्त चंद मूलतः इसी राज्य के हैं। 26 अगस्त को गत विश्व चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को उसी की धरती पर करारी शिकस्त देकर विश्व विजेता बनी भारत की अंडर-19 क्रिकेट टीम के कप्तान उन्मुक्त का पैतृक गांव पिथौरागढ़ जिले का खड़कू भल्या है जबकि गत वर्ष दो अप्रैल को भारत को विश्व खिताब दिलाने वाले टीम इंडिया के कप्तान धौनी का परिवार पड़ोसी अल्मोडा जिले के ल्वाली गांव का मूल निवासी है। यह बात और है कि धौनी के पिता पान सिंह धौनी कुछ वर्ष पूर्व रोजगार के सिलसिले में सुदूर झारखंड जाकर बस गए। जाहिर है कि धौनी शुरु से ही झारखंड के खिलाड़ी के रूप में क्रिकेट खेल रहे हैं। धौनी की कप्तानी में भारत ने गत वर्ष 28 साल बाद विश्वकप जीता था।
उधर उन्मुक्त चंद के पिता भरत चंद ठाकुर दिल्ली में स्कूल शिक्षक हैं और उन्मुक्त ने भी उत्तराखंड के बजाए दिल्ली के खिलाड़ी के रूप में क्रिकेट करियर शुरु किया था। खेल विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों खिलाड़ियों की सफलता इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड के नवयुवक अवसर मिलने पर किसी भी क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं।
मनजीत नेगी







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