समझ में नहीं आता कि हम उत्तराखण्डी क्यों लकीर के फकीर बने रहते हैं, क्यों हम लोग कुछ राजनैतिक तत्वों के बहकावे में आकर ऐसे मुद्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर देते हैं जो कि हमें उत्तराखण्ड के आधारभूत आवश्यक मुद्दों से दूर ले जाते
समझ में नहीं आता कि हम उत्तराखण्डी क्यों लकीर के फकीर बने रहते हैं, क्यों हम लोग कुछ राजनैतिक तत्वों के बहकावे में आकर ऐसे मुद्दों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर देते हैं जो कि हमें उत्तराखण्ड के आधारभूत आवश्यक मुद्दों से दूर ले जाते हैं।
आइये पहले एक नजर डालते हैं अपने पड़ोसी राज्य हिमाचल पर। हिमाचल प्रदेश का शाब्दिक अर्थ बर्फीले पहाड़ों का प्रांत है। हिमाचल प्रदेश को देव भूमि भी कहा जाता है। इस क्षेत्र में आर्यों का प्रभाव ऋग्वेद से भी पुराना है। आंग्ल-गोरखा युद्ध के बाद, यह ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के हाथ में आ गया।
सन 1857 तक यह महाराजा रणजीत सिंह के शासन के अधीन पंजाब राज्य (पंजाब हिल्स के सीबा राज्य को छोड़कर) का हिस्सा था। सन 1950 मे इसे केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया, लेकिन 1971 मे इसे, हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम-1971 के अन्तर्गत इसे 25 जून 1971 को भारत का अठारहवाँ राज्य बनाया गया।
बारहमासी नदियों की बहुतायत के कारण, हिमाचल अन्य राज्यों को पनबिजली बेचता है जिनमें प्रमुख हैं दिल्ली, पंजाब और राजस्थान। राज्य की अर्थव्यवस्था तीन प्रमुख कारकों पर निर्भर करती है जो हैं, पनबिजली, पर्यटन और कृषि। ट्रान्सपरेन्सी इंटरनैशनल के 2005 के सर्वेक्षण के अनुसार, हिमाचल प्रदेश देश में केरल के बाद दूसरी सबसे कम भ्रष्ट राज्य है।
उत्तराखण्ड से तुलना करने पर देखें तो दोनों राज्यों में काफी हद तक भौगोलिक समानतायें हैं दोनों राज्यों की आमदनी का मुख्य जरिया पनबिजली और पर्यटन है उसके बावजूद भी हिमाचल प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय उत्तराखण्ड ही क्या बल्कि भारत के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में सबसे अधिक है। कहीं ऐसा तो नहीं हम सभी उत्तराखण्डी लोग कुछ राजनैतिक दलों के अपने स्वार्थ के लिये खेले जाने वाले खेल के मोहरे बनते जा रहे हों ?
पहले ‘उत्तरांचल’ से ‘उत्तराखण्ड’ राज्य के नाम में परिवर्तन जहां एक तरफ कुछेक राजनैतिक दलों के लिये अपनी पहचान बनाने का साधन रहा वहीं कुछ ‘कुमाऊ’ लोगों के लिये कमीशन के द्वारा आय का नया स्रोत। कितनी ही स्टेशनरी बर्बाद गई होगी और कितना ही खर्च सिर्फ नाम बदलने में लगा होगा।
पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने से लेकर अब तक उत्तराखण्ड के ज्वलंत मुद्दों में एक है गैरसैण राजधानी का मुद्दा। राज्य स्थापना के समय से ही यह मांग और प्रयास किये जा रहे हैं कि उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून को हटाकर गैरसैंण बनायी जानी चाहिये।
कुछ एक मित्रगणों का मानना है कि उत्तराखण्ड की गैरसैण राजधानी उन मृतक क्रान्तिकारियों का सपना था जिन्होंने इस राज्य की स्थापना के आन्दोलन में अपने प्राणों की आहुति दे दी अतः उनका यह सपना अवश्य पूर्ण किया जाना चाहिये…।
कुछ मित्रों का मानना था कि देहरादून की उत्तराखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्रों से दूरी बहुत अधिक है अतः राजधानी किसी कार्यविशेष से आने वाले व्यक्ति को सुबह घर से चलकर दिन में काम निपटाकर शाम को वापस घर आना असंभव हो जाता है फलस्वरूप वह व्यक्ति कोटद्वार, हरिद्वार, हल्द्वानी, देहरादून के होटल मालिको और स्टेशन के पास बनी दुकान वालो के शोषण का शिकार होता है।
कुछ मित्रों का मानना था कि गैरसैण का विकास तभी हो सकता है जब वहां राजधानी बनायी जाये अन्यथा नहीं.. जहां तक गैरसैण राजधानी का मृतक क्रान्तिकारियों के सपने वाली बात है यह बिल्कुल सही है की उनकी अन्तिम इच्छा अवश्य पूर्ण की जानी चाहिये लेकिन आधुनिक परिस्थितियों को देखते हुये यह भी सत्य है कि उन क्रान्तिकारियों ने पलायन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़कें जैसी आधारभूत समस्याओं से त्रस्त उत्तराखण्ड का सपना कदापि नहीं देखा होगा..।
आज गैरसैंण में एक विधानसभा का पत्थर रखवाकर सबकी नजर वहां राजधानी बनवाने पर लगी है लेकिन अरबों रूपये बर्बाद करके देहरादून के सहस्रधारा रोड़ पर उजाड़ पड़े आईटी पार्क को आबाद करने की तरफ कोई आवाज नहीं उठाता, अगर उसके लिये कोई सकारात्मक कदम उठाये जाते तो शायद पलायन की बढ़ती हुई रफ्तार कुछ कम होती।
क्या वो पैसा उत्तराखण्ड के विकास में काम नहीं आ सकता था? गैरसैंण में ‘अस्थायी टैण्ट’ में एक विधानसभा सत्र चलवाने के लिये बीस करोड़ रुपये खर्च करवा दिये गये.. लेकिन अगर यह विधानसभा सत्र हमेशा की तरह देहरादून में ही चलता और यह बीस करोड़ रूपये पिछले साल आपदा में आये परिवारों को राहत राशि के रूप में बाटें जाते तो कितने परिवारों का भला होता?
रही बात वर्तमान राजधानी देहरादून की उत्तराखण्ड के सीमावर्ती क्षेत्रों अधिक दूरी होने के कारण लोगों के कोटद्वार, हरिद्वार, हल्द्वानी, देहरादून के होटल मालिकों और स्टेशन के पास बानी दुकानदारों द्वारा शोषण की तो कोई मुझे बताये कि उत्तरकाशी या त्यूणी से गैरसैण जाकर काम निपटाकर किस बस या टैक्सी सर्विस से एक दिन मैं लौट-फेर की जा सकती है?
दूसरी बात मैदानी भागों में दुकानदारों द्वारा किये जाने वाले शोषण की तो आपको शायद यात्रारूट पर मिलने वाली 20 रूपये में एक कप चाय और 30 रूपये में एक भुट्टे की याद तो होगी ही, ये ऐसे तथ्य हैं जो यात्रा रूट पर गये लोगों से छुपे नहीं हैं।
उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियां ही ऐसी है कि किसी भी दशा में बाहर से आये लोगों को रात्रि-विश्राम लेना ही पड़ता है अतः इस तरह के मुद्दों को लेकर गैरसैंण राजधानी की मांग पर एक बार फिर से विचार किया जाना चाहिये।
तीसरी बात कि लोगों का यह कहना कि गैरसैण का विकास तभी हो सकता है जब वहां राजधानी बनायी जाये अन्यथा नहीं…. तो मेरे बन्धुओं पौड़ी-कांसखेत-सतपुली मार्ग पर स्थित ढाढूखाल का विकास कैसे होगा? क्या वहां भी… ????
खैर.. एक और खास बात की तरफ आपका ध्यान ले जाना चाहूंगा… हिमाचल प्रदेश में सन 1952 से अब तक 62 सालों में 13 बार में पांच मुख्यमंत्री हुये हैं (श्री यशवंत सिंह परमार, श्री ठाकुर राम लाल, श्री शांता कुमार, श्री प्रेम कुमार धूमल, श्री वीरभद्र सिंह) जबकि हमारे उत्तराखण्ड में मात्र 13 सालों में सात मुख्यमंत्री बदले गये हैं …. छोटे से प्रान्त में अलग अलग राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों की आपसी प्रतिस्पर्धा और गुटबाजी से यह अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि उत्तराखण्ड के विकास के लिये कौन कितना समर्पित है।
हो सकता है कि आप में से कई लोग मेरे इस लेख से इत्तफाक ना रखते हों उसके लिये मैं क्षमाप्रार्थी हूं.. मैं इस बात के पक्षधर नहीं हूं कि गैरसैण राजधानी ना बनायी जाये बल्कि सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि अभी उससे पहले जो कुछ भी हमारे हाथ में है उसको सही तरह से सहेजकर और प्रयोग करके अपने प्रदेश और प्रदेशवासियों को और सक्षम बनाया जाये।
ध्यान रहे कि हम विकास के नाम पर पिछड़ते और सिर्फ पिछड़ते ही जा रहे हैं। गौरतलब हो 9 नवम्बर 2000 को उत्तर-प्रदेश से अलग हुये उत्तराखण्ड को राज्य गठन के बाद से ही पर्यटन प्रदेश का तमगा मिला हुआ था, और इन पिछले सालों में उत्तराखण्ड ने भारत के शीर्ष के दस पर्यटन राज्यों में अपनी गिनती बनाये रखी लेकिन आज हम उस गिनती से भी बाहर हो गये हैं।
साभार – विनय के डी







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