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उत्तराखंड में सैन्य ढांचा बढ़ाने से सुरक्षा के साथ होगा सामाजिक, आर्थिक लाभ

उत्तराखंड के तीन जिले चीन सीमा से लगते हैं, उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़। चीन इन तीनों इलाकों को काफी असुरक्षित मानता है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि वहां आधारभूत ढांचा काफी खराब है, बल्कि ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वहां से बड़े पैमाने पर

उत्तराखंड के तीन जिले चीन सीमा से लगते हैं, उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़। चीन इन तीनों इलाकों को काफी असुरक्षित मानता है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि वहां आधारभूत ढांचा काफी खराब है, बल्कि ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वहां से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है

विंग कमांडर प्रफुल्ल बख्शी, रक्षा विशेषज्ञ

भारत के समक्ष सिर उठा रहे खतरों की पड़ताल करने से एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि सबसे बड़ी चुनौती चीन से पेश आ रही है। वह उत्तर में लद्दाख, पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश में खतरा बन रहा है। मध्य क्षेत्र को अभी तक बर्फ से लकदक रहने वाली हिमालय की ऊंची चोटियों के चलते सुरक्षित माना जाता था। इसी मध्य क्षेत्र को ही हम उत्तराखंड कहते हैं। इसके दो मुख्य हिस्से हैं, कुमाऊं और गढ़वाल। यह राज्य जहां उत्तर में तिब्बत से अपनी सीमा साझा करता है वहीं पूर्व में इसकी नेपाल से लगती 80 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। उत्तराखंड चीन के साथ 350 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है।

पिछले कुछ दशक से भारत, चीन की ओर से अतिक्रमण और राजनयिक टकराव का सामना कर रहा है। खासतौर पर भारत-नेपाल के परिप्रेक्ष्य में। पिथौरागढ़ के पास कालापानी में भारत-नेपाल के बीच 35 वर्ग किलोमीटर के इलाके को लेकर विवाद है। यह भारत तिब्बत सीमा पुलिस के नियंत्रण में है। कालापानी के बाद चीन सीमा तक कहीं भी सीमांकन नहीं किया गया है। इसे लेकर चीन अप्रत्यक्ष तौर पर जंगी जुबान बोलता रहता है। उसका तर्क है कि अगर भारत भूटानी इलाके में दोकलम में हस्तक्षेप कर सकता है तो चीन भी कालापानी या कहें कश्मीर में हस्तक्षेप कर सकता है।

चीन के विदेश मंत्रालय में उप निदेशक स्तर के अधिकारी वांग वेन ली ने 2017 के मध्य में यह बयान दिया था। चमोली जिले के गोचर और बाड़ाहोती में कई बार चीनी हेलीकॉप्टरों ने सीमा का अतिक्रमण किया है। यही नहीं कई बार चीन के गश्ती दल ने भी भारतीय चरवाहों को धमकाया है। इस सबके अलावा चीन ने इस इलाके में अपने जंगी विमानों की गतिविधियां बढ़ा दी हैं। ये विमान तिब्बत में बने हवाई ठिकाने से उड़ान भरते हैं।

चीन अपने आधुनिक लड़ाकू विमान जे-10 और जे-11 के बेड़े का इस्तेमाल कर रहा है। इसके अलावा, उसने स्टील्थ श्रेणी के जे-20 को भी बेड़े में शामिल किया है। ये लड़ाकू विमान चीन की हवाई बिग्रेड के हैं। यह पश्चिम थियेटर कमान के तहत सेना की हवाई जरूरतों को पूरा करती है। यह 3500 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हवाई सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाती है। इसमें तिब्बत का ऊंचा पठारी इलाका भी शामिल है।

चीन की ओर से इस खतरे को ध्यान में रखते हुए ही भारत सरकार ने वायुसेना से देहरादून के जौलीग्रांट हवाईअड्डे से अपने सुखोई-30 विमानों के संचालन का परीक्षण करने को कहा था। यह अभ्यास इसलिए किया गया ताकि मौजूदा आधारभूत ढांचे से ही इस मारक लड़ाकू विमान की ऑपरेशनल संभावनाओं को परखा जा सके। निसंदेह भारत की ओर से संकेत स्पष्ट है कि वह अपने जंगी साजोसामान और हवाई बेड़े को उत्तराखंड के किसी भी इलाके से संचालित करने को लेकर गंभीर है। ताकि निकट भविष्य में किसी भी खतरे का सामना किया जा सके। सेना और वायुसेना के जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार ने हाल के दिनों में सबसे बड़े सैन्य तैनाती की योजनाओं पर अमल शुरू किया है। इसमें रनवे के लिए नई जमीन, हेलीपैड और अग्रिम लैंडिंग ग्राउंड का निर्माण शामिल है। यहां तैयार किया जा रहा ढांचा सेना और वायुसेना को मिसाइलों की तैनाती, टेक्टीकल रडार और सर्विलांस यूनिटों की तैनाती, मेडिकल सेवाएं जैसी जंगी जरूरतों को पूरा करने में मददगार होगा।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि मौजूदा सरकार इस मामले को पूरी गंभीरता से ले रही है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने 2017 में ऐसे पांच राज्यों की बैठक बुलाई थी, जिनकी सीमा चीन से लगती है। उत्तराखंड इनमें से एक था। इसमें राजनाथ ने चीन से लगते इलाकों में आधारभूत ढांचे की खस्ता हालत को लेकर चिंता जाहिर की। उत्तराखंड के तीन जिले चीन की सीमा से लगते हैं, उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़। चीन इन तीनों इलाकों को काफी असुरक्षित मानता है। ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि वहां भारत का आधारभूत ढांचा काफी खराब है, बल्कि ऐसा इसलिए भी है क्योंकि वहां से बड़े पैमाने पर आबादी पलायन कर रही है। कमजोर सैन्य ढांचे और आबादी का प्रबंधन ठीक से न होने का सीधा अर्थ है, सेकेंड लाइन डिफेंस का न होना। यह तीन दशक में काफी कमजोर हुआ है। सीमा से सटे इन गांवों को सामान्य दिनों में भी जरूरी चीजों के लिए हफ्तों इंतजार करना होता है।

अब अगर भारत में 200 साल में विकसित हुए सैन्य ढांचे पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि सुदूरवर्ती क्षेत्रों में सैन्य छावनी होना महज सैन्य जरूरतों के लिए नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाने के लिए भी जरूरी है। निश्चित तौर पर एक छावनी को राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों के लिए तैयार किया जाता है। लेकिन इससे आर्थिक तरक्की भी होती है। इससे सामाजिक विकास होता है। स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। इस सबके विकास से सड़कों का नेटवर्क तैयार होता है। रेलवे स्टेशन, पुल आदि बनते हैं। छोटे उद्योग, स्कूल-कालेज और अस्पताल खुलते हैं। अगर चीन भारत के कमजोर सैन्य ढांचे के चलते उत्तराखंड को असुरक्षित मानता है तो सामरिक रूप से अहम जगहों पर सैन्य छावनी विकसित करने नीति पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। इस दौरान चीन से खतरे को देखते हुए सेना की मूलभूत जरूरतों को पूरा करना होगा।

उत्तराखंड में इस समय देहरादून, पिथौरागढ़, चकराता, लैंसडाउन, रानीखेत समेत कुछ और छावनी क्षेत्र हैं। लेकिन इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि ये सभी अंग्रेजों के समय में विकसित हुए थे। तब चीन की तरफ से ब्रिटिश हुकूमत को आज की तरह कोई खतरा नहीं था। लेकिन अब सीमाई इलाकों में सैन्य ढांचा मजबूत करने की जरूरत है। इससे पूरे हिमालयी सूबे की सामाजिक आर्थिक प्रगति होगी। इससे अच्छे जीवन की तलाश में तराई की ओर हो रहा पलायन रुकेगा।

युवाओं को अगर यह दिखने लगेगा कि उनके गृह जिलों में बनने वाली इन आधुनिक सैन्य छावनियों में सुविधाओं एवं आजीविका के पर्याप्त साधन हैं तो वे पलायन की जगह अपने इलाकों को ही वरीयता देंगे। यह भी एक तथ्य है कि उत्तराखंड में साक्षरता की दर काफी अच्छी है और यहां के युवा सेना को करियर के रूप में प्राथमिकता देते हैं। कुल मिलाकर आज का सुरक्षा खतरा कल के लिए वरदान साबित हो सकता है। बशर्ते हम सीमाई इलाकों के विकास पर ध्यान दें।

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