16 और 17 जून को केदारनाथ में शिव के तांडव को एक महीने का वक्त हो चुका है। कुदरत के इस कहर के बीच मैं एक महीना केदार घाटी में रहकर आया। इंडिया टीवी की टीम 50 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करके केदारनाथ पहुंची
16 और 17 जून को केदारनाथ में शिव के तांडव को एक महीने का वक्त हो चुका है। कुदरत के इस कहर के बीच मैं एक महीना केदार घाटी में रहकर आया। इंडिया टीवी की टीम 50 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करके केदारनाथ पहुंची जबकि अभी तक राज्य प्रशासन के लोग वहां केवल हेलिकॉप्टर से ही पहुँच पा रहे हैं। अब जाकर स्थानीय प्रशासन की आंखें खुली। स्थानीय प्रशासन ने मुझसे बात की और केदारनाथ पहुंचने के वैकल्पिक रास्ते के बारे में जानकारी ली।
हम सबसे पहले 21 जून को हेलिकॉप्टर से केदारनाथ पहुंचे थे। केदारनाथ में आई भीषण तबाही के बाद मंदिर के आसपास वीरानगी का आलम था। प्रशासन की ओर से मंदिर की सफाई का काम शुरू नहीं किया गया। मंदिर के आसपास के शव भी नहीं हटाए गए थे तथा पूरे इलाके के हालात बिल्कुल खराब हो गए थे।
प्रशासन के दावों का पता करने के लिए मैं अपने कैमरामैन साथी विजय ममगाई के साथ शुक्रवार 28 जून की दोपहर गुप्तकाशी से केदारनाथ के लिए पैदल रवाना हुआ। पहली रात हमलोग कालीमठ में रूके। अगली सुबह सात बजे हम आगे को चले। काली नदी की धारा के साथ रास्ते में 11 गांव पड़े जो बर्बाद हो चुके हैं। इन गांवों के करीब 100 लोगों की केदारनाथ में मौत हो चुकी है। पहले हम कविल्ठा गांव पहुंचे। इस गांव के छह लोगों की मौत हो चुकी है। गांव के प्रधान ने बताया कि अभी तक सरकारी मदद नहीं पहुंची है। दोपहर एक बजे हमलोग कोटमा गांव पहुँचे। इस गांव के 19 लागों की आपदा में मौत हो चुकी है। इन सभी लोगों की सार्वजनिक तेहरवीं गांव में की गई। तीन बजे हमलोग जाल मल्ला गांव पहुंचे। इस गांव के लोग भी अपने साथियों को खोने का शोक मना रहे थे।
चार बजे हम जाल तल्ला गांव पहुँचे यहां भी शोक का माहौल था। यहां से खुन्नू गांव होते हुए हमलोग चैमासी गांव पहुंचे जो चीन की सीमा पर है। इस गांव में हमने प्रधान सुरेन्द्र सिंह तेंदुरी के बर्बाद हुए घर में रात गुजारी। प्रधान जी के परिवार ने हमें रात का खाना खिलाया। रविवार की सुबह पांच बजे हम स्थानीय गाइड भरत सिंह के साथ आगे को चले। लोगों ने सलाह दी थी रास्ता टूटा हुआ और खतरनाक है। जंगली जानवरों का भी भय है। शाम चार बजे हम खाम चोटी पर पहुंचे। यहां कुछ गड़ेरिये मिले। शाम छह बजे हम खाम चोटी में सबसे ऊंचाई पर पहुंचे। हमने एक गड़ेरिये की झोपड़ी में यही रात गुजारी। सोमवार एक जुलाई की सुबह हम निहायत खतरनाक रास्ते से नंगे पांव आगे को रवाना हुए। जूते पहनकर अगर पैर फिसला तो नीचे हजारों फीट नीचे गिलेशियर में गिराने का खतरा था।
हम केदारनाथ के ऊपर गांधी सरोवर के पास पहुँच चुके थे। गांधी सरोवर बिल्कुल खाली हो चुका है। इस रास्ते से आगे चलकर 11रू30 बजे सुबह हमलोग केदारनाथ मंदिर पहुँच चुके थे। हमने 21 जून और 1 जुलाई के दौरान मंदिर में कोई बदलाव नहीं पाया। 21 जून को हम हेलिकॉप्टर से केदारनाथ पहुंचे थे। मंदिर की अभी तक सफाई नहीं हुई है। नियमित पूजा नहीं शुरू हो सकी है। पुलिस प्रशासन की ओर से मंदिर परिसर में कोई तैनात नहीं था। हमें एक व्यक्ति मिला जिसने खुद को दिल्ली की संस्था का प्रतिनिधि बताया। वह लाशों को जलाने में लगा था। एक महिला स्वयंसेवक मिली जो खुद को पेटा की सदस्य बता रही थी। एनडीआरएफ की ओर गिराया गया कई टन राशन बर्बाद हो रहा था। इस राशन को जानवर खा रहे थे। हमनें राशन को बचाया और इससे ही भोजन तैयार किया। हमनें सोमवार और मंगलवार की रात यहीं गुजारी।
मंदिर में सफाई की मशीने लगी थीं लेकिन सफाई का काम नहीं हो रहा था। केदारनाथ में एक भी मकान, होटल या फिर दूकान नहीं बची थी। तबाही के निशान हर तरफ मौजूद थे। वहाँ खड़े होने में डर लग रहा था। जहां बाजार हुआ करता था वहाँ अब एक नदी बह रही थी। बड़े बड़े पत्थर हर तरफ बिखरे पड़े थे। हर पत्थर के किनारे एक दो लाशें लगी हुई थीं। केदारनाथ मंदिर के आसपास जब सब कुछ तबाह और बर्बाद हो गया तो फिर मंदिर कैसे बच गया। मंदिर के ठीक पीछे एक बड़ा पत्थर लगा था जिसने सारे मलबे को रोक लिया। पानी के तेज बहाव को भी उसने रोके रखा। पत्थर मंदिर के लिए ढाल बन गया। हर तरफ तबाही के बीच भी केदारनाथ मंदिर को बस खरोंचे ही आयी। मंदिर के बाहर सात फीट ऊँचा चबूतरा गायब था। मंदिर के दो दरवाजे टूट गए थे, अन्दर घुप्प अन्धेरा था। मंदिर के अन्दर रेत का ढेर लगा हुआ था। जिस जगह पर केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने वालों की कतार लगती थी वहाँ अब मंदाकिनी नदी बह रही थी। जगह जगह लाशें पडी थीं। ऐसा लग रहा था हम किसी शमशान में खड़े हों।
केदारनाथ पहाड़ियों की गोद में एक उजाड़ और वीरान बस्ती बन गयी थी जहां अब कोई जिंदा नहीं बचा था। लाशों के सड़ने की बदबू से सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। मंदिर के ठीक मेन गेट पर ही नंदी की मूर्ति के आगे कई लाशें पडी थीं। ये देखकर दिल दहल गया कि पुलिस ने आनन्- फानन में जिन कुछ शवों का अंतिम संस्कार किया था उनको कुत्ते और कव्वे नोच रहे थे। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो गया, ये कैसी तबाही है, हजारों परिवार बिखर गए, अनगिनत सपनें ना जाने कहाँ खो गये? आखिर केदारनाथ में शिव ने ऐसा तांडव क्यों किया ?
एक महीने बाद 15 जुलाई को एक बार फिर हम केदारनाथ का हाल जानने के लिए तीसरी बार यहाँ पहुंचे। इस बार पारम्परिक रास्ते यानी रामबाड़ा से पैदल होते हुए। रामबाड़ा से केदारनाथ की दूरी 7 किमी है लेकिन पूरा रास्ता बह जाने के बाद अब ये दूरी 10 किमी हो गयी है। गुप्तकाशी से रामबाड़ा तक हम पुलिस की एक टीम के साथ आये। ये टीम शवों का अंतिम संस्कार करने आई थी। मेरी आँखों को भरोसा नहीं हो रहा था कि एक महीने बाद भी रामबाड़ा में शवों का अंबार लगा था। रामबाड़ा पूरी तरह से बह चुका है। गौरीकुंड से केदारनाथ के बीच 14 किमी के पैदल रास्ते में रामबाड़ा तीर्थयात्रियों का सबसे बड़ा पड़ाव था। यहाँ पर 150 से ज्यादा दुकानें, होटल और धर्मशालाएं थी लेकिन आज तबाही के बाद रामबाड़ा में सिर्फ एक छोटी दुकान के बराबर जगह बची है।
हमनें रामबाड़ा में 40 से ज्यादा शव पड़े देखे। केदारनाथ पहुँचने के लिए हमें उफनती मंदाकिनी नदी पर बने लकड़ी के एक पुल को पार करना था। अभी तक पुलिस प्रशासन की कोई टीम पैदल इस रास्ते से केदारनाथ नही गयी थी। उत्तराखंड पुलिस के डीआईजी जी एस मर्तोलिया ने हमें आगे न जाने की सलाह दी लेकिन हम केदारनाथ जाने की ठान चुके थे। करीब 5 घंटे का पैदल खतरनाक पहाड़ी रास्ता तय करके हम रात को 8 बजे केदारनाथ पहुंचे।
रात को 9 बजे हम सीधे केदारनाथ मंदिर की तरफ बढ़ रहे थे रास्ते में हमारी मुलाकात राज्य के कृषि मंत्री हरक सिंह रावत से हुई। मंत्रीजी एक महीना होने पर केदारनाथ का हाल जानने आये थे। मंदिर पहुँचकर हमनें मंत्रीजी से पूछा कि एक महीना हो गया मंदिर की सफाई कब होगी। मंत्रीजी हमें लेकर केदारनाथ के गर्भगृह लेकर गए और उन्होंने शिवलिंग पर हाथ रखकर भगवान् केदारनाथ से पहले माफी मांगी और फिर शपथ लेकर कहा कि अगले दो दिन में वो खुद मंदिर की सफाई करेंगे।
हम रात 11 बजे तक मंदिर में रहे और फिर भारी मन से वापस आकर पुलिस के टैंट में आकर सो गए। रातभर बारिश होती रही और सुबह 6 बजे जैसे ही नींद खुली तो मैंने टैंट से बाहर आकर देखा तो मंत्री जी का हेलिकॉप्टर उड़ने के लिए तैयार था। इससे पहले कि हम मंत्रीजी से मंदिर की सफाई की बारे में पूछते मंत्रीजी हेलिकॉप्टर में फुर्र हो गए और हम देखते रह गए। दिनभर फिर मौसम खराब हो गया लगातार बारिश होती रही और हम दूसरे दिन भी केदारनाथ में टैंट के अन्दर कैद होकर रह गए।
पिछली रात की तरह ही ठीक 9 बजे एक बार फिर हम केदारनाथ मंदिर गए। मन में एक ही सवाल उठ रहा था कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी राज्य प्रशासन और नेता भगवान् केदारनाथ के सामने भी झूठ बोलने से बाज क्यों नहीं आ रहे हैं। क्या एक महीने में मंदिर की सफाई नहीं हो सकती है। अगर इसी रफ्तार से काम होगा तो केदारनाथ को दोबारा बसाने में कई साल लग जायेंगे।
(लेखक इंडिया टीवी में विशेष संवाददाता है)







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