24 अप्रैल को केदारनाथ के कपाट खुलने के बाद जब मैं वापस लौट था और रास्ते में श्रीनगर में माँ धारी देवी के दर्शन कर रहा था तभी ऑफिस से फोन आया कि नेपाल में भूकम्प आया है और तुम सीधे नेपाल चले जाओ। रास्ते
24 अप्रैल को केदारनाथ के कपाट खुलने के बाद जब मैं वापस लौट था और रास्ते में श्रीनगर में माँ धारी देवी के दर्शन कर रहा था तभी ऑफिस से फोन आया कि नेपाल में भूकम्प आया है और तुम सीधे नेपाल चले जाओ। रास्ते में गाड़ी में बैठकर मैं सोच रहा था कि ये भगवान शिव कैसी लीला है? मुझे केदारनाथ आपदा के समय गुप्तकाशी से केदारनाथ की 55 किलोमीटर लम्बी अपनी पैदल यात्रा का सारा दर्दनाक दृश्य याद आ गया। केदारनाथ में आपदा के बाद पिछले 2 साल में मैं सातवीं बार केदारनाथ पहुंचा था। सबको मालूम है कि केदारनाथ में स्वयंभू शिवलिंग भगवान शिव के भैंसे के रूप का पिछला हिस्सा है और नेपाल में पशुपतिनाथ अगला। दिल्ली पहुँचते ही मैं काठमांडू के लिए रवाना हो गया। लेकिन पूरे रास्ते में मेरे मन मस्तिष्क में केदारनाथ में आई प्रलय से लेकर पशुपतिनाथ में आये भूकम्प का सारा चक्र घूमने लगा। केदारनाथ से पशुपतिनाथ तक प्रलय और शिव के इस सन्देश को हम सबको समझना होगा इसी में सबका कल्याण है।
21 जून 2013 को आपदा के बाद जब मैं सबसे पहले केदारनाथ पहुंचा तो लगा कि शायद किसी शमशान में आ गए हैं। केदारनाथ में एक भी मकान, होटल या फिर दुकान नहीं बची थी। तबाही के निशान हर तरफ मौजूद थे। वहाँ खड़े होने में डर लग रहा था। जहां बाजार हुआ करता था वहाँ अब एक नदी बह रही थी। बड़े बड़े पत्थर हर तरफ बिखरे पड़े थे। हर पत्थर के किनारे एक दो लाशें लगी हुई थीं। केदारनाथ मंदिर के आसपास जब सब कुछ तबाह और बर्बाद हो गया तो फिर मंदिर कैसे बच गया। मंदिर के ठीक पीछे एक बड़ा पत्थर लगा था जिसने सारे मलबे को रोक लिया। पानी के तेज बहाव को भी उसने रोके रखा। पत्थर मंदिर के लिए ढाल बन गया। हर तरफ तबाही के बीच भी केदारनाथ मंदिर को बस खरोंचे ही आयी। मंदिर के बाहर सात फीट ऊँचा चबूतरा गायब था। मंदिर के दो दरवाजे टूट गए थे, अन्दर घुप्प अन्धेरा था। मंदिर के अन्दर रेत का ढेर लगा हुआ था।
जिस जगह पर केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव के दर्शन करने वालों की कतार लगती थी वहाँ अब मंदाकिनी नदी बह रही थी। जगह जगह लाशें पडी थीं। ऐसा लग रहा था हम किसी शमशान में खड़े हों। केदारनाथ पहाड़ियों की गोद में एक उजाड़ और वीरान बस्ती बन गयी थी जहां अब कोई जिंदा नहीं बचा था। लाशों के सड़ने की बदबू से सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। मंदिर के ठीक मेन गेट पर ही नंदी की मूर्ति के आगे कई लाशें पडी थीं। ये देखकर दिल दहल गया कि पुलिस ने आनन-फानन में जिन कुछ शवों का अंतिम संस्कार किया था उनको कुत्ते और कव्वे नोच रहे थे। दिमाग ने काम करना बंद कर दिया समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो गया, ये कैसी तबाही है, हजारों परिवार बिखर गए, अनगिनत सपनें ना जाने कहाँ खो गये? आखिर केदारनाथ में शिव ने ऐसा तांडव क्यों किया ?
लेकिन अब लगभग दो साल बाद केदारनाथ में रूठे भगवान शिव को मनाने की कोशिशें जोरों पर हैं। जून 2013 में केदारनाथ में आई आपदा के बाद एक फिर केदार घाटी में रौनक लौट आई है। हर तरफ बर्फ से ढकी पूरी केदार घाटी में श्रद्धालुओं के स्वागत की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। आपदा के बाद ये पहला मौका है जब 6 महीने कपाट बंद रहने के बाद पारम्परिक पूजा से भगवान केदार के द्वार अपने भक्तों के लिए खुल गए हैं। राज्य सरकार केदारनाथ यात्रा को चर्चा में लाने का हर सम्भव प्रयास कर रही है। इसीलिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी केदारनाथ के कपाट खुलने के मौके पर 24 अप्रैल को केदारनाथ आये। खासबात ये है कि राहुल गांधी गौरीकुंड से 19 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय कर मंदिर पहुंचे।
केदार घाटी में चारों तरफ बर्फ का अम्बार लगा हुआ है। नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ मॉन्टेनेयरिंग के सैकड़ों जवान और मजदूर दिनरात बर्फ को साफ कर भक्तों के लिए पैदल रास्ता बनाने में जुटे हुए हैं। गौरीकुंड से केदारनाथ का नया रास्ता 19 किलोमीटर लंबा है जबकि पुराना रास्ता 14 किलोमीटर का था। केदारनाथ मंदिर से आधा किलोमीटर दूर एक बड़ा हैलीपैड बनाया गया है। इसी हैलीपैड पर यात्रियों
के रहने के लिए खास टैंट लगाये गए हैं। ऐसे 100 टैंट लगाए गए हैं जिसमें एक हजार से ज्यादा लोग रह सकते हैं। इसके आलावा खाने पीने के सभी इंतजाम किये गए हैं। लगातार हो रही बर्फवारी के बीच प्रशासन की मुश्किलें बढ़ गयी हैं। लेकिन कुदरत कितनी भी मुश्किलें खड़ी करे नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ मॉन्टेनेयरिंग के कर्नल अजय कोठियाल हार मानने को तैयार नहीं हैं। पैदल आने वाले भक्तों की सुविधा और सुरक्षा के लिए हर तरह के इंतजाम किये गए हैं। मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों लोगों का हौसला दिखा रहा है कि एक बार फिर केदारनाथ में शिव का जयकारा गूंज उठेगा।
अब बात पशुपतिनाथ की वायुसेना के एन 32 विमान पर सवार होकर दिल्ली से काठमांडू पहुंचे। खराब मौसम के बीच काठमांडू में विमान का उतारना मुश्किल था। काठमांडू से हम वायुसेना की पहली टीम के साथ एमआई 17 हैलीकॉप्टर पर सवार होकर पोखरा के लिए रवाना हुए। इस हैलीकॉप्टर पर खाने-पीने के सामान के साथ ही मेडिकल उपकरण भी मौजूद हैं। इसके साथ ही कई घायल लोगों को भी ले जाया जा रहा है। पोखरा के पहाड़ी इलाके और गोरखा जिला सबसे ज्यादा प्रभावित है और इन इलाकों में अब तक यहाँ लोगों तक मदद नहीं पहुंची है। ऐसे में हैलीकॉप्टर ही एक मात्र साधन है। वायुसेना ने 3 एमआई 17 हैलीकॉप्टर आज पहली बार पोखरा हवाई अड्डे पर उतारे। इसके अलावा भारतीय सेना ने भी अपने कई एडवान्स लाइट हैलीकॉप्टर पोखरा में राहत और बचाव के काम में लगा दिए हैं। भूकम्प के तीसरे दिन भारतीय सेना और वायुसेना के आने के बाद यहाँ पर राहत और बचाव का शुरू पाया है।
नेपाल परेशान है, यहां के लोग हताश और निराश है। उनकी परेशानी या बर्बादी की जड़ में है शनिवार को आया भूकम्प। लेकिन निराशा अगर दिनोंदिन बढ़ती जा रही है तो उसका कारण है नेपाल के वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व का पूरी समस्या या आपदा से निपटने में विफलता। राजनैतिक नेतृत्व के पंगु हो जाने के कारण नेपाल में सब कुछ चाहे वो रहत हो या बचाव, सारा काम काठमांडू घाटी में सिमट कर रह गया है। किसी को नेपाल की राजधानी से 20 किलोमीटर दूर जाने की हिम्मत नहीं। जो कुछ हो रहा है भाग्य भरोसे हो
रहा है। राहत सामग्री पूरे विश्व से आ रही है लेकिन उन्हें बांटने वाला कोई नहीं। सरकार और सेना में तालमेल का आभाव है। सब यही चाहते हैं कि उनका काम कोई दूसरा कर दे या जो संस्था आई है वो सरकार के काम भी कर दे। राहत सामग्री से त्रिभुवन एयरपोर्ट भरा पड़ा है। भूकम्प प्रभावित लोगों को जो भी चाहिए वो टेंट हों या पानी या दवा सब कुछ पर्याप्त मात्रा में हैं, लेकिन उनका वितरण कैसे हो इस पर माथापच्ची हो रही थी।
कई देशों के डॉक्टर ऐसे ही घूम रहे हैं, उन्हें कोई बताने वाला नहीं कि कहां जाना चाहिए। डॉक्टर बैठे हैं और खोजी कुत्ते खुद से सूंघ कर मलबों से लाश निकालने में मदद कर रहे हैं। हर कोई मदद करना चाहता है लेकिन किसी को मालूम नहीं कि सही माध्यम क्या है। पुराने मंदिर गिर गए, पुराने हेरिटेज भवन जमींदोज हो गए, कुछ बैंक या उद्योगपति उनका पुनर्निर्माण करना चाहते हैं लेकिन सरकार ने अभी तक वैट हटाने की घोषणा नहीं की है। अमूमन ऐसे कामों में सरकार वैट माफ कर देती है। कैंप में रहने वाले लोगों को अब महामारी का डर है लेकिन सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। सबसे मुश्किल है कि काम करने वाले लोग अब काठमांडू में नहीं बचे और जिसके कारण सैनिक अब झाड़ू लगाने से लेकर ईंट उठाने का काम तक कर रहे हैं।
भूकम्प के तीन दिन बाद जब हम भारतीय वायुसेना के एम-17 हेलीकॉप्टर से गोरखा जिले के पहाड़ी इलाकों में पहुंचे तो हमारी रूह कांप गयी। वहां कोई नहीं पहुंचा। लोग मलबा हटाने से लेकर फंसी लाशों तक को निकालने का काम खुद कर रहे हैं। गनीमत ये कि लोग खुद ही राहत बचाव के काम में लगे थे और जब भारतीय वायुसेना के एम-17 हेलीकॉप्टर राहत सामग्री लेकर पहुंचे तो लोगों में भगदड़ नहीं मची। गाँव के लोग खुद ही लाइनों में लगकर राहत सामग्री ले रहे थे और घायलों को हेलीकॉप्टर तक पहुंचा रहे थे। सबसे चैंकाने वाली बात ये कि नेपाली सेना और प्रशासन राहत और बचाव के काम में अनमने मन से सहयोग कर रही थी। भारतीय भारतीय वायुसेना के एम-17 हेलीकॉप्टर और सेना के ध्रुव हेलीकॉप्टर पायलट खराब मौसम के बीच अपनी जान जोखिम में डालकर गोरखा जिले के पहाड़ी इलाकों में राहत और बचाव के काम को अंजाम दे रहे थे। 
केदारनाथ से पशुपतिनाथ की इस यात्रा में जो बात मुझे समझ में आई कि उत्तराखंड और नेपाल दोनों ही हिमालयी राज्यों में पिछले कुछ सालों से कुदरत के खिलाफ जो भी अतिक्रमण हुआ उसी का नतीजा है कि तबाही उतनी ही ज्यादा हुई। केदारनाथ से पशुपतिनाथ तक भगवान शिव ने जब अपना तीसरा नेत्र खोला तो अपने मंदिर के अलावा आसपास के सारे अतिक्रमण को तबाह कर दिया। ऐसे में दीवार पर साफ साफ लिखे शिव के इस सन्देश को समझने में ही हम सब की भलाई है।
– मनजीत नेगी, प्रलय के बाद सबसे पहले 55 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर केदारनाथ पहुँचकर हालात का जायजा लेने वाले टीवी पत्रकार







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