जिस दिन पूरा उत्तर भारत भीषण गर्मी से झुलस रहा था (यहां तक कि खुशनुमा श्रीनगर भी सामान्य से अधिक गर्म था), बादल फटने के साथ ही प्रकृति ने हिमालयी पारिस्थितिकी की घड़ी की सुइयों को उल्टा घुमाने का फैसला कर डाला। नतीजे में हुई
जिस दिन पूरा उत्तर भारत भीषण गर्मी से झुलस रहा था (यहां तक कि खुशनुमा श्रीनगर भी सामान्य से अधिक गर्म था), बादल फटने के साथ ही प्रकृति ने हिमालयी पारिस्थितिकी की घड़ी की सुइयों को उल्टा घुमाने का फैसला कर डाला। नतीजे में हुई भयंकर जल-प्रलय, अपने साथ ज़मीन और उस पर मौजूद आदमियों को अपने साथ बहा ले गई। उत्तरकाशी और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय स्थलों और तीर्थ स्थलों पर उमड़ी तीर्थयात्रियों और मैदानी इलाकों की गर्मी की मार से बचने के लिए पर्यटकों की भीड़ और उनके मेहमाननवाज़ तथा पर्यटन व्यापार के लाभार्थियों को कीचड़ और चटटानों की नदियां अपने साथ बहा कर ले गईं और अपने पीछे मंदिरों और उनके आस-पास बने घने मकानों को मलबे के ढेर में तबदील कर गईं। इस मलबे को साफ करने में सालों लग जाएंगे।
एक बाद फिर, भारत के सैन्य प्रशासन को तबाही-ग्रस्त इलाके में और यहां तक कि मानसून के बादलों के घाटियों में और ढलानों पर मंडराने के माहौल में राहत और बचाव चलाने का निर्देश दिया गया। इस मौसम ने भारतीय वायु सेना के काम को और कठिन कर दिया। सेना और निजी क्षेत्र के हेलीकाप्टरों ने लगातार बिगड़ते मौसम के बीच, बचे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहंुचाने के मौके तलाशने शुरू कर दिए।
राहत कार्यों में लगे लोगों की ओर से सेनाध्यक्षों की समिति के अध्यक्ष एयर चीफ मार्शल एनएके ब्राउन ने कहा, ‘‘जब तक आपमें से हर किसी को हम बचा नहीं लेते हमारे हेलीकाप्टरों के रोटर थमेंगे नहीं, धीरज धरें, उम्मीद न छोड़ें।’’ इससे जिंदा बचे लोगों का मनोबल मनोवैज्ञानिक तौर से ऊंचा उठा, जिससे उन्हें अपने प्रियजनों को अपनी आंखों के सामने प्रलयंकर पानी में बहे जाते देखने वालों के सदमे से उबरने में मदद मिली।
उत्तराखंड में दो-तीन दिन लगातार बारिश होती रही। 17 जून की सुबह को केदारनाथ तीर्थ परिसर पर बादल फटा और मिनटों में पहाड़ियों से ज़मीनें खिसकने से होने वाला चट्टानों का प्रवाह भयंकर हो गया और अपने साथ हिमालयी पहाड़ियों पर बन रहे ढांचों को अपने साथ बहा कर मैदानी इलाकों की ओर ले गया। चारों तरफ पानी ही पानी और तबाही ही तबाही का मंजर था। इसका असर दूर, दिल्ली तक भी महसूस हुआ, जहां यमुना खतरे के निशान से ऊपर बहने लगी और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को वहां से निकालना पड़ा।
जब अगली सुबह, उत्तराखंड में राज्य की राजधानी में प्रशासन को इस त्रासदी का आभास हुआ, तब केंद्र ने सशस्त्र बलों को आपदा-ग्रस्त लोगों को बचाने में अपनी विशेषज्ञता और उपकरणों के इस्तेमाल का आदेश दिया। आपदा के अनुमान लगाने के लिए शुरूआती टोह के बाद भारतीय वायु सेना और सेना ने तथा स्थानीय अर्द्धसैनिक संगठनों ने अपने हवाई उपकरणों और ज़मीनी टीमों की तैनाती शुरू कर दी, ताकि पर्वतों, जंगलों और नदियों के किनारों पर बचे इलाकों में फंसे लोगों को निकालने का मार्ग तैयार करना शुरू कर दिया।
जब मीडिया ने उफनती नदियों में बहु-मंजली इमारतों को ताश के पत्तों की तरह ढहते दिखाया, तो देश स्तब्ध रह गया।
आधुनिक इतिहास में, हेलीकाप्टरों से लोगों को निकालने के एक सबसे बड़े अभियान में भारतीय वायु सेना, सेना, राज्य सरकार के हेलीकाप्टरों और यहां तक कि निजी हेलीकाप्टरों ने 17 और 23 जून के बीच करीब 10,731 लोगों को सुरक्षित निकाला, जिसके लिए उन्होंने 1,163 उड़ानें भरीं तथा करीब 1,84,262 किलोग्राम राहत सामग्री और उपकरण गिराए। केदारनाथ, बद्रीनाथ और उत्तरकाशी इलाके में बचाव कार्यों में लगी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस ने करीब 17,270 लोगों को निकाला।
इस लेख के लिखते समय, हर प्रकार की राष्ट्रीय सम्पत्ति को राहत और बचाव कार्यों में लगा दिया गया था। इनमें हाल ही में प्राप्त सी-130जे यातायात विमान और एमआई-17वी और ध्रुव हेलीकाप्टर भी शामिल हैं। इनकी मदद से हर्वाई इंघन, पेयजल, भोजन और तम्बू आदि ले जाने के लिए एयरब्रिज बनाए गए, ताकि पर्वतीय इलाकों और जंगलों में बने हेलीपैडों को साफ किया जा सके और मानसून से पहले राहत और बचाव कार्यों को तेजी से पूरा किया जा सके। आपरेशन राहत के लिए भारतीय वायु सेना द्वारा करीब 45 विमान दिए गए। 24 जून को सी 130जे विमान ने उत्तराखंड के बाढ़ग्रस्त इलाकों पर सुबह-सुबह उड़ान भरी, ताकि मौसम के बारे में जानकारी हासिल की जा सके और इस इलाके मंे हेलीकाप्टरों के परिचालन के बारे में विश्लेषण किया जा सके। तब तक भारतीय वायु सेना ने 12,000 उड़ाने भर ली थीं।
इस आपदा के साथ ही हमारे मन में विचार आया कि कहीं हमने ही इस आपदा को बुलावा तो नहीं दिया है। ज़मीन और जलवायु की अनदेखी की बात तो जाने दें, हमने नदियों के कमजोर तटों पर अनियोजित विकास और बहु-मंजली इमारतें बना कर इस आपदा के लिए ज़मीन तो तैयार नहीं की है।
कंेद्रीय कमान के अधीन उत्तराखंड में सेना के बचाव और राहत कार्यों में बड़ी सफलताएं प्राप्त हुईं। गंगोत्री में और उसके आस-पास फंसे लोगों को निकाला गया। पर्वतीय बचाव आपरेशनों में दक्ष सेना के जवानों ने केदारनाथ के पास गौरी कुंड और राम बाड़ा के बाची जंगल चट्टी में पहाड़ियांे में फंसे एक हजार से अधिक लोगों को निकाला। भोजन और दवाएं गिराई गईं। रोगियों के इलाज के लिए गौरी कुंड में चिकित्सा दलों की व्यवस्था की गई। इसके अलावा, लोगों को भोजन, पानी और दवाएं उपलब्ध कराने के लिए गौरी कुंड में एक सम्पूर्ण राहत क्षेत्र खोला गया। सेना के समर्पित दलों ने जंगल चट्टी में हेलीपैड बनाने के लिए अथक परिश्रम किया, जिससे केदार घाटी के एक सबसे खतरनाक और दुर्गम इलाके से लोगों को निकालने में मदद मिली। अब इस हेलीपैड को धु्रव हेलीकाप्टरों को उतारने के लिए उन्न्ात बनाया जा रहा है। सेना ने भी गौरी कुड पर दो हेलीपैड बनाए हैं।
बद्रीनाथ घाटी में सेना ने इतिहास रचा है। सेना ने अलकनंदा नदी के उस पास से तीर्थ-यात्रियों को लाने के लिए गोविंद घाट पर एक हेली-पुल बनाया। पहले बनाए पुल के गिर जाने के कारण इस किनारे से उस किनारे पर जाने के लिए हेलीकाप्टरों ने शटल सेवा शुरू की।
सेना ने बद्रीनाथ मार्ग पर गोविंद घाट और लम्बागर के बीच एक पगडंडी को चालू किया। बद्रीनाथ से लम्बागर तक सड़क साफ करने वाले एक दस्ते ने अलगनंदा पर एक पैदल पुल बनाया, जिससे बद्रीनाथ से पैदल गोविंद घाट जाने में आसानी हो गई। गोविंद घाट से जोशीमठ मार्ग को वाहनों के लिए खोला गया।
अब सेना, ‘स्टेजिंग एरिया’ अवधारणा के आधार पर लोगों को ला-लेजा रही है। लोगों को गिरी चट्टानों से पैदल लाया जा रहा है और दो भूस्खलनों के बीच वाहनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सुखी और गंगनामी में दो स्टेजिंग एरिया बनाए गए हैं, जहां बचाए गए लोगों को भोजन और दवाएं दी जा रही हैं। सेना का एक दस्ता यमुनोत्री में बड़कोट पहंुच गया है। यमुनोत्री में करीब 700 लोग मौजूद हैं।
पिथौरागढ़ जिले में तवाघाट-धारचूला में सेना, सोबला घाटी में मौजूद करीब 1,000 लोगों से सम्पर्क बनाने में लगी है। वहां चिकित्सा दल और भोजन पहले ही रवाना किया जा चुका है। सेना के दस्ते ने बागेश्वर जिले में पिंडारी ग्लेशियर में फंसे सभी 45 बच्चों को निकाल लिया है। सुंदरढुंगा ग्लेशियर में फंसे 10-12 लोगों से सम्पर्क कायम किया जा रहा है।
सेना ने उत्तराखंड में अब तक, डाॅक्टरों के नेतृत्व में 19 चिकित्सा दल भेजे हैं। राज्य के विभिन्न्ा स्थानों में लोगों को अपने परिवार से सम्पर्क करने में मदद के लिए 45 सैटेलाइट फोन लगाए हैं। दो हजार तीन सौ से अधिक लोगों ने अपने घरों पर अपने प्रियजनों से बात करने के लिए सेना की संचार सुविधाओं का फायदा उठाया है।
सेना ने अब तक, 18,500 लोगों को निकाला है और राहत और बचाव कार्यों के लिए 10,000 सैनिकोें को तैनात किया है। कंेद्रीय कमान के आर्मी कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चैत उत्तराखंड पहुंचे और वहां की स्थिति का जायजा लिया। यहां पहुंचकर उन्होंने सेना के प्रयासों को निर्देशित किया। उन्होंने कहा ‘‘अंतिम आदमी को वापस लाने तक सेना का अभियान जारी रहेगा’’।
सेसिल विक्टर







Leave a Comment
Your email address will not be published. Required fields are marked with *