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देवभूमि में ही पवित्र है गंगा

केंद्रीयप्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 1980 से गंगा केजल की मॉनीटरिंग कर रहा है। वर्तमान समय में ये गंगा के  2,525 किलोमीटर लंबे दायरे में 80 जगहों पर गंगा जल का परीक्षण करता है। हिल-मेलब्यूरो, देहरादून गंगोत्री से गंगा सागर तक गंगा का पानी यदि कहीं बिल्कुल

  • केंद्रीयप्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 1980 से गंगा केजल की मॉनीटरिंग कर रहा है। वर्तमान समय में ये गंगा के  2,525 किलोमीटर लंबे दायरे में 80 जगहों पर गंगा जल का परीक्षण करता है।

हिल-मेलब्यूरो, देहरादून

गंगोत्री से गंगा सागर तक गंगा का पानी यदि कहीं बिल्कुल शुद्ध रूप में मौजूद है तो वो सिर्फ देवभूमि उत्तराखंड में है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने गंगा के तटों पर स्थापित गुणवत्ता निगरानी केंद्र से मिले आंकड़ों के आधार पर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग,  ऋषिकेश और मध्य गंगा ब्रिज बिजनौर में गंगाजल की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप पाई है।

गंगा में क्लास ‘ए’ मानक को पूरा करनेवाला जल ही पीने योग्य शुद्ध माना जाता है। इसके लिए डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन की मात्रा प्रति लीटर 6 मिलीग्राम से कम होनी चाहिए। जबकि बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड प्रति लीटर दो एमजी से कम होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त पीएच वैल्यू 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए, और गंगा जल में खतरनाक बैक्टीरिया कोलीफॉर्म की कुल मात्रा सौ मिली लीटर में 50 से कम होनी चाहिए।

बीओडी ऑक्सीजन की वो मात्रा है जो पानी में रहने वाले जीवों को गैर-जरूरी ऑर्गेनिक पदार्थों को नष्ट करने के लिए चाहिए। बीओडी जितनी ज्यादा होगी पानी का ऑक्सीजन उतनी तेजी से खत्म होगा और बाकी जीवों पर उतना ही बुरा असर पड़ेगा।

डीओ (डिज़ॉल्व्ड ऑक्सीजन) का मतलब है कि पानी में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा। पानी में मिलने वाले प्रदूषण को दूर करने के लिए छोटे जीव-जंतुओं को ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है। अगर डीओ की मात्रा ज़्यादा है तो इसका मतलब है कि पानी में प्रदूषण कम है. क्योंकि जब प्रदूषण बढ़ता है तो इसे ख़त्म करने के लिए पानी वाले ऑर्गनिज़्म को ज़्यादा ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है, इससे डीओ की मात्रा घट जाती है।

कहां-कहां शुद्ध है गंगा जल

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रुद्रप्रयाग

गंगा के पानी में डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन 9.2 पाई गई और बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांडएक पायी गई। यहां कोलीफॉर्म की मात्रा दो और पीएच वैल्यू 8.08 पाई गई।

देवप्रयाग –

गंगा के पानी में घुलनशील ऑक्सीजन 9.4 पाई गई और बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड 1.0 पाई गई। यहां कोलीफॉर्म की मात्रा 2 और पीएच वैल्यू 7.98 मिली।

ऋषिकेश –
गंगा के पानी में घुलनशील ऑक्सीजन 9.8 पायी गई और बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड 1.0 पाई गई। यहां कोलीफॉर्म की मात्रा 30 और पीएच वैल्यू 7.68 पाई गई।
मध्य गंगा बैराज, बिजनौर –
गंगा के पानी में डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन 9.3 और बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड 1.4 पाई गई। साथ ही पीएच वैल्यू 7.6 पाई गई।

ट्रीटमेंट के बाद पीने योग्य गंगा जल

ट्रीटमेंट के बाद गंगा के पानी का वर्गीकरण क्लास सी में किया गया है, यानी वो पानी जिसे ट्रीटमेंट के बादपीने योग्य बनाया जा सकता है। इस श्रेणी के तहत पानी में घुलनशील ऑक्सीजन चार सेकम और बायो केमिकल ऑक्सीजन डिमांड 3 से कम होता है। पीएच वैल्यू 6.0 to 9.0 , और कुल कोलीफॉर्म 5000 एमपीएन/100 मिली लीटर होना चाहिए।

गुणवत्ता निगरानी केंद्रों की रिपोर्ट के मुताबिक हरिद्वार, रुड़की, उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर और बिहार के आरा-छपरा ब्रिज, जनता घाट तथा राजमहल जैसी कुछ ही जगहें ऐसी हैं जहां गंगा के पानी को सुधार के बाद पीने योग्य बनाया जा सकता है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 1980 से गंगा के जल की मॉनीटरिंग कर रहा है। वर्तमान समय में ये गंगा के  2,525 किलोमीटर लंबे दायरे में 80 जगहों पर गंगा जल का परीक्षण करता है। इसका रियलटाइम डाटा अब ऑनलाइन भी उपलब्ध रहता है। हालांकि इस वेब पन्ने को आप ऑनलाइन देखेंगे तो ज्यादातर जगह ये लाल रंग में ही नज़र आता है, जिसका मतलब इन जगहों पर गंगा जल में प्रदूषण मानकों से कहीं अधिक है। यहां गंगा जल स्नान योग्य भी नहीं है। जो भी मानक क्लास ए और सी के तहत नहीं पाये जाते हैं वो यहां लाल रंग से दर्शाये गए हैं।

गंगा नदी उत्तराखंड से आगे जैसे-जैसे बढ़ती है,  पानी में प्रदूषण की मात्रा बढ़ती ही जाती है। वाराणसी, इलाहाबाद, कन्नौज, कानपुर, पटना, राजमहल, दक्षिणेश्वर, हावड़ा और दरभंगा घाटों पर गंगा में प्रदूषण चरम पर है। वाराणसी में वर्ष 2013 में गंगा का बीओडी स्तर 5.1 मिलीग्राम प्रति लीटर था। जो कि वर्ष 2017 में 6.1 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया। इसी तरह इलाहाबाद में गंगा में बीओडी स्तर वर्ष 2013 में 4.4 मिली ग्राम प्रति लीटर था जो कि वर्ष 2017 में बढ़ कर 5.7 मिली ग्राम प्रति लीटर हो गया।

वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने नमामि गंगे प्रोजेक्ट शुरू किया ताकि गंगा को उसके शुद्ध रूप में लौटाया जा सके। इसके तहत सीवेज ट्रीटमेंट, औद्योगिक प्रदूषण को दूर करना, घाट बनाना, ग्रामीण स्वच्छता, वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रम शामिल किए गए।

कैग ने गंगा में बढ़ते प्रदूषण को लेकर उठाए सवाल

गंगा के साथ सबकुछ अच्छा ही हो रहा है, ऐसा नहीं है।20 अक्टूबर 2018 को राज्य विधानसभा को दी गई कैग की रिपोर्ट ने भी गंगा में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि तकरीबन26.292  मिलियन लीटर प्रति दीन बिना निस्तारित सीवेज सीधे गंगा और इसकी सहायक नदियों में छोड़ा जाता है। इस रिपोर्ट में 31 मार्च 2017 तक गंगा के लिए किए जा रहे कार्यों का परफॉर्मेंस ऑडिट किया गया है।

रिपोर्ट में नमामि गंगे प्रोजेक्ट के ज़रिये गंगा को पुनर्जीवित करने के प्रयास पर भी सवाल उठाए गए हैं। नमामि गंगे वर्ष 2015 में केंद्र सरकार द्वारा शुरू किया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तराखंड में ये कार्यक्रम न तो सही ढंग से लागू हो पाया, न ही इसकी सही निगरानी की जा सकी। स्वच्छ गंगा के राष्ट्रीय अभियान के तहत राज्य सरकार को वर्ष 2013-14 और वर्ष 2016-17 में जो बजट जारी किया गया, उसका एक बड़ा (25.46 प्रतिशत और 58.71 प्रतिशत) हिस्सा कार्यदायी संस्थाओं ने खर्च ही नहीं किया।

कैग ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में लिखा है कि 112 में से 65 नालों का गंगा पानी (26.292 मिलियन लीटर प्रति दिन) बिना निस्तारित किये सीधे गंगा और इसकी सहायक नदियों में छोड़ा जाता है। साथ ही हरिद्वार और ऋषिकेश में मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कचरे को ट्रीट करने में सक्षम नहीं हैं यहां और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जाने की जरूरत है।

गंगा में प्रदूषण की मुख्य वजह औद्योगिक प्रदूषण और घरेलू कचरा है। राज्य के पेयजल मंत्री प्रकाश पंत कह चुके हैं किकैग ने जो भी रिपोर्ट दी है वह सही है, लेकिन वो पुरानी रिपोर्ट है। उन्होंने कहा कि  उनकी सरकार में गंगा को स्वच्छ बनाने की दिशा में कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रकाश पंत के मुताबिक, 31 मार्च 2019 तक गंगा स्वच्छता के लिए सारे कार्य पूरे कर लिए जाएंगे।

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