बड़े पेयजल संकट का सामना कर रहा भारतीय उपमहाद्वीप का जलाशय
हिल-मेल ब्यूरो
भारतीय उपमहाद्वीप का जलाशय कहे जाने वाले उत्तराखंड के 13 में से 10 जिले 2007-09 के बीच जबरदस्त सूखे से गुजरे। पिछले साल भी जाड़ों के समय कम बारिश होने से राज्य को जबरदस्त जल संकट और वनों की आग जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने अपने असुरक्षा जोखिम आकलन (वीआरएस) से मिले संवेदनशील नतीजों के आधार पर यह आशंका जाहिर की है। इसके लिए राज्य में जल संकट को लेकर दिसंबर 2017 तक पड़ताल की गई।
यूएनडीपी की राज्य परियोजना प्रबंधक रश्मि बजाज के अनुसार, एक अनुमान के मुताबिक, उत्तराखंड में 90 प्रतिशत पेयजल 2.6 लाख प्राकृतिक स्रोतों से मिलता है। सड़क निर्माण और दूसरी विकास परियोजनाओं के लिए जंगलों के निरंतर कटान अथवा स्थानीय लोगों के लिए ईंधन और भोजन की बढ़ती मांग के चलते ऐसा हो रहा है। यूएनडीपी की रिपोर्ट कहती है कि विभिन्न स्रोतों और स्थानीय लोगों से जुटाई गई जानकारी के अनुसार, 500 से ज्यादा प्राकृतिक स्रोतों, नदियों, गदेरों, तालाबों जैसे पानी की आपूर्ति के स्रोत घटकर आधे हो गए हैं। जलवायु परिवर्तन के चलते स्थानीय स्तर पर पानी के सोते घटते जा रहे हैं।
रिपोर्ट कहती है, संसाधन की अंतर्निहित प्रकृति,भूमि उपयोग में परिवर्तन, वैज्ञानिक समझ की कमीऔर जलवायु परिवर्तन ने सभी स्रोतों को विलुप्त होने के लिए अधिक संवेदनशील बना दिया है। यूएनडीपी के साथ काम करने वाले विशेषज्ञ सुब्रत पॉल के मुताबिक, पूर्व के वीआरएस शोधों में 2016 तक ब्लॉक स्तर को कवर किया गया। लेकिन इस बार का शोध व्यापक और निचले स्तर पर किया गया है। देहरादून, हरिद्वार, चंपावत, पौड़ी और टिहरी गढ़वाल में सामुदायिक स्तर पर भी जानकारियां जुटाई गई हैं। चंपावत जिले में सबसे ज्यादा गांव आते हैं, यहां 85 प्रतिशत गांव ढलान पर बसे हैं। यह स्थिति इस जिले को पानी और वर्षा की कमी को लेकर ज्यादा संवेदनशील बनाती है। यहां भूस्खलन और भूकंप का खतरा भी ज्यादा है। घटते भूजल स्तर और जमीन में पानी की कम उपलब्धता के चलते देहरादून और गढ़वाल के जिलों में साल भर पानी की किल्लत से सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं।
जल संकट भी पौड़ी से पलायन की वजह
पॉल के अनुसार, पौड़ी गढ़वाल जिले से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन की एक वजह जल संकट भी है। जयहरीखाल, द्वारीखाल और दुगड्डा ब्लॉक के गांवों में इस तरह का संकट सबसे ज्यादा देखने को मिला है। टिहरी गढ़वाल के जौनसार इलाके के नागथात, दुईना, बिसोई, गडोल, जंदोह, चितार, चिचरद और गंगोआ में पीने का पानी प्राकृतिक तौर पर अम्लीय है। जल संकट चितार और गंगोआ गांवों बहुत ज्यादा है। यहां लोगों को 8-10 किलोमीटर दूर से पीने का पानी ढोना पड़ता है।
पानी की कमी से आई नमी वनाग्नि का कारण
यूएनडीपी के सलाहकार वसीम यूसुफ के अनुसार, पिछले 16 साल में जंगलों की आग को लेकर रिमोट सेंसिंग डाटा के अनुसार, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी और देहरादून वनाग्नि के लिए ज्यादा संवेदनशील हैं। पानी और जंगलों में जमीन में नमी की कमी होना जंगलों में आग लगने और बढ़ने का एक बहुत बड़ा कारण है। मुख्य संरक्षक पर्यावरण एवं वन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव डीजीके शर्मा के अनुसार, उत्तराखंड में गर्मियों के मौसम में पीने के पानी का संकट काफी ज्यादा बढ़ जाता है। जलवायु परिवर्तन के लिए राज्य की कार्ययोजना के हवाले से वह बताते हैं कि 15,165 गांवों में से 20 प्रतिशत में पीने के पानी को लेकर अलग-अलग तरह की दिक्कतें हैं। 180 से ज्यादा गांवों में तो पानी को उल्लेख करने योग्य स्रोत नहीं है।


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