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पलायन आयोग की रिपोर्ट से सामने आई वीरान हो रहे गांवों की हकीकत

चेतना नेगी, देहरादून उत्तराखंड में पलायन की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। जल्द इस संबंध में उठाए गए कदम अगर जमीन पर नहीं दिखाई दिए तो उत्तराखंड भुतहा गांवों वाला प्रदेश बनकर रह जाएगा। उत्तराखंड में वीरान होते गांवों की हकीकत पलायन आयोग

चेतना नेगी, देहरादून

उत्तराखंड में पलायन की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। जल्द इस संबंध में उठाए गए कदम अगर जमीन पर नहीं दिखाई दिए तो उत्तराखंड भुतहा गांवों वाला प्रदेश बनकर रह जाएगा। उत्तराखंड में वीरान होते गांवों की हकीकत पलायन आयोग की रिपोर्ट में सामने आई है। जनवरी से शुरू हुए अध्ययन की रिपोर्ट मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को सौंप दी गई है। इसें पलायन की दो वजहें बताई गई हैं, जो सीधे राज्य के विकास से जुड़ती हैं। यानी रोजगार, सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा। ये कमोबेश वही कारण हैं, जिनकी चर्चा अक्सर होती है। लेकिन रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू खाली होते गांव हैं। राज्य में पलायन की बढ़ती दर और इसे रोकने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास किए जाने की जरूरत है। जिस राज्य से नदियों का उद्गम होता है, वो प्यासा है, वहां बिजली नहीं है, सड़कें नहीं हैं, अब ऐसा न हो कि इंसान भी न रह जाएं।

पौड़ी, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा और रुद्रप्रयाग से ज्यादा पलायन

पलायन के चलते राज्य में घोस्ट विलेज यानी भुतहा गांवों की संख्या बढ़कर 1668 पहुंच गई है। पिछले सात साल में 700 गांव वीरान हो गए। इससे पहले वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में भुतहा गांवों की संख्या 968 थी। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के पांच पहाड़ी जिलों रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा में सबसे अधिक पलायन हुआ है। यहां के गांवों में पलायन राज्य औसत से अधिक है। हालांकि पहाड़ के गांवों से 70 फीसद लोगों का पलायन राज्य में ही हुआ है। 29 फीसद ने राज्य से बाहर और एक फीसद ने विदेश में पलायन किया है।

एक दशक में जो छोड़ गए अपने घर, अपना गांव

– ग्राम पंचायत स्तर पर मुख्य व्यवसाय कृषि 43 प्रतिशत एवं मजदूरी 33 प्रतिशत है।
– पिछले 10 वर्षों में 6,338 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 व्यक्ति अस्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं। यह लोग घर में आते-जाते रहते हैं, लेकिन अस्थायी रूप से रोजगार के लिए बाहर रहते हैं।
– 10 साल में 3,946 ग्राम पंचायतों से 1,18,981 लोग स्थायी रूप से पलायन कर चुके हैं।
– ग्राम पंचायतों से 50 प्रतिशत लोगों ने आजीविका एवं रोजगार की समस्या के कारण, 15 प्रतिशत ने शिक्षा की सुविधा एवं 8 प्रतिशत ने चिकित्सा सुविधा के अभाव के कारण पलायन किया है।
– ग्राम पंचायतों से पलायन करने वालों की आयु 26 से 35 वर्ष वर्ग में 42 प्रतिशत, 35 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में 29 प्रतिशत तथा 25 वर्ष से कम आयु वर्ग में 28 प्रतिशत है।
– ग्राम पंचायतों से 70 प्रतिशत लोग प्रवासित होकर राज्य के अन्य स्थानों पर गए तथा 29 प्रतिशत राज्य से बाहर एवं लगभग 01 प्रतिशत देश से बाहर गए।

सीमांत गांव हुए खाली, कुछ जगह रिवर्स माइग्रेशन भी

पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, सीमा से सटे गांवों में आबादी तेज़ी से घट रही है। कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां स्वरोजगार के जरिये लोगों ने रिवर्स माइग्रेशन किया है। पलायन आयोग के उपाध्यक्ष ने कहा कि राज्य में लगभग 734 राजस्व ग्राम/तोक/मजरा 2011की जनगणना के बाद गैर आबाद हो गए हैं। इनमें से 14 अंतरराष्ट्रीय सीमा से हवाई दूरी के 5 किमी के भीतर हैं। राज्य में 850 ऐसे गांव हैं, जहां पिछले 10 वर्षों में अन्य गांव/शहर/कस्बों से पलायन कर उस गांव में आकर लोग बसे हैं। राज्य में 565 ऐसे राजस्व ग्राम/तोक/मजरा हैं, जिनकी आबादी 2011 के बाद 50 प्रतिशत घटी है।रिपोर्ट के आधार पर 9 पर्वतीय जिलों के 35 विकास खंड चिन्हित किए गए हैं, जिनमें आयोग की टीम जाकर लघु/मध्यम एवं दीर्घ अवधि की कार्ययोजना बनाएगी, जिससे बहुक्षेत्रीय विकास तेजी से बढ़ सके।

कैसे तैयार की गई रिपोर्ट —
7,950 ग्राम पंचायतों का सर्वेक्षण

ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष एसएसनेगी के अनुसार, जनवरी एवं फरवरी, 2018 में ग्राम्य विकास विभाग के माध्यम से उत्तराखंड की 7,950 ग्राम पंचायतों का सर्वेक्षण कराया गया। आयोग की टीम ने सभी जिलों का दौरा करके लोगों से ग्राम्य विकास एवं पलायन के विभिन्न पहलुओं पर परामर्श लिया। विभिन्न विभागों के जिलाध्यक्ष और राज्य स्तरीय अधिकारियों, गैर सरकारी संगठनों, शिक्षाविदों, अर्थशास्त्रियों, छात्रों आदि से पलायन और संबंधित मामलों से जुड़ी जमीनी हकीकत एवं स्थिति का पता लगाने का प्रयास किया गया। सभी गांव के लिए बीडीओ के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम बनाई गई थी। इस टीम ने व्यक्तिगत रूप से फोन पर पूछताछ करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। इससे लिए विशेषज्ञों की भी मदद ली गई। 2011 की जनगणना के बाद पलायन पर राज्यव्यापी तथ्यों एवं आकंड़ों की कमी थी इसलिए आयोग ने राज्य के सभी जिलों की ग्राम पंचायतों का व्यापक सर्वेक्षण कराया। ग्राम पंचायतों से पलायन के विभिन्न पहलुओं पर हासिल तथ्यों एवं आकड़ों का आंकलन किया। पलायन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट राज्य में सामाजिक-आर्थिक स्थिति और मौजूदा पलायन से संबंधित आंकड़ों को दर्शाती है।

हिल-मेल – क्या करेगी सरकार

प्रदेश के गांवों में रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना, अच्छी शिक्षा और उत्तम स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करना सरकार का मुख्य लक्ष्य है। इनके सबके द्वारा ही पलायन पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है।

– त्रिवेंद्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री उत्तराखंड

शिक्षा-चिकित्सा पर जोर

– शिक्षा का स्तर उठाने के विद्यालयों में एनसीईआरटी की पुस्तकें लागू की
– एक वर्ष में चिकित्सा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार करने का प्रयास किया, कई डॉक्टरों की नियुक्तियां हुईं
– टेली रेडियोलॉजी और टेलीमेडिसिन द्वारा दुर्गम और दूरस्थ स्थानों को उन्नत चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने की दिशा में आगे बढ़े, प्रदेश के 37 अस्पताल टेली रेडियोलॉजी/टेलीमेडिसिन से जुड़ चुके हैं

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