नरेंद्र मोदी के गृहनगर वड़नगर में मौजूद क्रीर्ति तोरण (दरवाजा) से मोदी को खास लगाव है। कहते हैं की 2001 के गुजरात भूकम्प में मोदी ने अपने बड़े भाई सोमाभाई मोदी से सबसे पहले यही पूछा कि क्रीर्ति तोरण गिरा तो नहीं। उनके घरवालों को
नरेंद्र मोदी के गृहनगर वड़नगर में मौजूद क्रीर्ति तोरण (दरवाजा) से मोदी को खास लगाव है। कहते हैं की 2001 के गुजरात भूकम्प में मोदी ने अपने बड़े भाई सोमाभाई मोदी से सबसे पहले यही पूछा कि क्रीर्ति तोरण गिरा तो नहीं। उनके घरवालों को आज भी इस बात का मलाल है कि मोदी ने उनका हालचाल नहीं पूछा बल्कि क्रीर्ति तोरण के बारे में पूछा था। घरवालों से मोदी का ये अलगाव आज भी कायम है परिवार के किसी भी सदस्य को मुख्यमंत्री निवास में आने की मनाही है।
गुजरात के मेहसाणा जिले के वड़नगर रेलवे स्टेशन के सामने नरेंद्र मोदी के पिताजी दामोदर मोदी की चाय की दुकान हुआ करती थी। उस वक्त नरेंद्र मोदी सिर्फ छह साल के थे। पिताजी की चाय की दुकान पर बड़े भाई के साथ चाय बेचा करते थे। चाय की इस दुकान पर सुबह शाम कम से कम 35 लोग चाय पीने आते थे। जो भी स्टेशन पर ट्रेन से उतरता या ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन पर जाता पहले इस चाय की दुकान पर आ जाता। चाय की चुस्कियों के साथ सियासत की बातें होतीं। आरएसएस से जुड़े लोग जब सियासी बातें करते तो नरेंद्र मोदी उसे गौर से सुनते। मोदी ने सियासत का पहला पाठ इसी चाय की दुकान पर सीखा था। मोदी पर संघ का रंग यही चढ़ा था। नरेंद्र मोदी के जन्म से 6 साल पहले वड़नगर में आरएसएस की शाखा स्थापित हो चुकी थी। नरेंद्र भाई की चाय की दुकान पर चाय पीने वालों में से एक लक्ष्मणराव ईनामदार थे जिसे लोग वकील साहब कहते थे। वकील साहब ही शाखा चलाते थे। वकील साहब ने आठ साल के नरेंद्र भाई को बाल स्वयंसेवक के रुप में शाखा में भर्ती कर लिया। वकील साहब ने नरेंद्र भाई के जिम्मे बच्चों को ट्रेंड करने का काम सौंप दिया। हर साल दीवाली नरेंद्र भाई की शाखा में मनती। घर वाले बेहद दुखी हो जाते थे।
वड़नगर में नरेंद्र मोदी का पहला घर बहुत ही छोटा था। ईंट और मिट्टी से बना 40 फीट लंबा और 12 फीट चैड़े मकान में पांच भाई और एक छोटी बहन के साथ नरेंद्र मोदी का परिवार रहता था। घर में न टॉयलेट की सुविधा थी और न बाथरुम ही था। गांव के इसी तालाब में ही नरेंद्र मोदी के घर वाले नहाते। इसी तालाब में नरेंद्र मोदी ने तैरना सीखा। धीरे-धीरे गांव के सबसे बढ़िया तैराक बन गए। गांव में बेंच नहीं होती थी। जमीन पर बैठकर पढ़ते थे। स्लेट पर लिखते थे। घर से स्कूल और स्कूल से चाय की दुकान पर आते जाते नरेंद्र मोदी 12 साल के हो गए थे। 12 साल की उम्र तक मोदी का यही रूटीन था। सुबह घर से स्कूल, स्कूल से चाय की दुकान और दुकान से थककर घर जाते थे। गांव में किरोसीन तेल जलाकर पढ़ते थे और फिर अपने भाई-बहनों के साथ सो जाते थे। गांव की जिंदगी और घर की गरीबी ने मोदी को हिम्मतवाला बनाया।
12 साल के मोदी कितने निडर थे। इसका एक दिलचस्प किस्सा है। ये किस्सा वड़नगर के इस तालाब से जुड़ा है। तालाब में मगरमच्छ रहते थे लेकिन गांव वाले इसी तालाब में नहाने आते। तालाब के बीचोबीच एक मंदिर है जो उस वक्त भी था। मंदिर के ऊपर भगवा झंडा लहराता रहता था। कुछ दिन बाद मंदिर के ऊपर के झंडे को बदलना पड़ता था। एक बार बरसात के मौसम में तालाब लबालब भरा था। मगरमच्छ तालाब के किनारे तक आ गए थे। लेकिन मंदिर का भगवा झंडा भी बदलना था। लोग जब तक कुछ सोचते 12 साल के नरेंद्र भाई मोदी तालाब में भगवा झंडा हाथ में लिए कूद गए। उनके पीछे-पीछे उनके दो दोस्त महेंद्र और बच्चू भी कूद गए। गांव वाले बेहद डरे हुए थे। तालाब के बाहर ड्रम पीटने लगे ताकि मगरमच्छ इनके पास न आए। नरेंद्र मोदी ने मंदिर का झंडा बदल दिया। इससे ज्यादा दिलचप्स किस्सा एक और है। एक दिन दोस्तों के साथ 12 साल के नरेंद्र भाई मोदी तालाब में तैर रहे थे। तभी मगरमच्छ का एक बच्चा दिखा। नरेंद्र ने उसे दबोच लिया। पकड़कर घर लाए। मां हीराबा ने देखा तो अवाक रह गईं।
यही हाल स्कूल में भी था। बचपन के दोस्त वड़नगर में डॉक्टरी कर रहे डॉ सुधीर जोशी कहते हैं – नरेंद्र भाई स्कूल में भी किसी से नहीं डरते। दोस्त उन्हें एनडी या फिर नरेंद्र भाई कहकर बुलाते। बचपन के दोस्त जसूद खान पठान हैं। जो पहली क्लास से लेकर ग्यारहवीं क्लास तक नरेंद्र मोदी के साथ पढ़े। एक साथ बैठते। एक साथ स्कूल जाते। वड़नगर के भागवताचार्य नारायाणाचार्य हाई स्कूल में जिसे बी एन हाईस्कूल कहा जाता है। इसी स्कूल में नरेंद्र मोदी दसवीं कक्षा तक पढ़े। बचपन के दोस्त हरीश पटेल कहते हैं कि नरेंद्र भाई अंग्रेजी और सामाजिक विज्ञान में बहुत अच्छे थे। स्कूल में होने वाले नाटकों में मोदी को मंत्री का रोल करना सबसे अच्छा लगता था।
साधु संतों के साथ रहना नरेंद्र मोदी को बचपन से अच्छा लगता था। ये देखकर मां को डर लगता था। नवरात्रि में एक साधु नरेंद्र मोदी के घर आए। भिक्षा देने के बाद मां हीराबा ने अपने दो बच्चों सोम भाई और नरेंद्र भाई की कुंडली साधु महाराज को दिखाईं। उस साधु ने कहा – सोम भाई का जीवन सामान्य रहेगा। लेकिन नरेंद्र भाई अगर राजनीति में गए तो सियासत का बादशाह बनेगें। अगर साधु बन गए तो फिर शंकराचार्य की कुर्सी ले लेंगे। नरेंद्र मोदी जब 17 साल के हुए तो कॉलेज में दाखिला लिया। एक दिन नरेंद्र भाई ने घर वालों के सामने एक चैंकाने वाला प्रस्ताव रखा। नरेंद्र भाई ने कहा कि वो आध्यात्मिक खोज के लिए वो हिमालय जाना चाहते हैं। नरेंद्र के मुह से ये बात सुनते ही मां को साधु की कही हुई बातें सच होती दिखीं। मां थोड़ी परेशान दिखीं तो 17 साल के नरेंद्र ने कहा – जब तक घर वाले खुशी खुशी उन्हें हिमालय यात्रा की इजाजत नहीं देंगे वो नहीं जाएंगे। लेकिन उनका मन यही कहता है कि वो हिमालय की तरफ जाकर कुछ दिन चिंतन करें। काफी सोच विचार के बाद घर वाले तैयार हो गए। मां ने रास्ते में सफर के लिए कंसार बना कर दिया। माथे पर तिलक लगाकर विदा किया।
पूरे दो साल तक नरेंद्र भाई मोदी हिमालय की कंदराओं और गुफाओं में घूमते रहे। न घर वालों को चिट्ठी भेजी न कोई खोज ख़बर ली। दो साल बाद 19 साल के नरेंद्र मोदी एक दिन अचानक घर लौटे। सबसे पहले छोटी बहन वसंतीबेन ने नरेद्र भाई को देखा। मां किचेन में खाना बना रही थीं। छोटी बहन ये कहते हुए घर के अंदर भागी….. नरेंद्र भाई आ गए…. नरेंद्र भाई आ गए। नरेंद्र का नाम सुनते ही मां खुद को रोक नहीं पाईं। बदहवाश घर से बाहर भागीं। कंधे पर एक झोला लटकाए 19 साल के नरेंद्र को जब देखा आंखों से आंसू टपकने लगे। मां ने सबसे पहला सवाल किया – इतने दिन कहां थे क्या खाते थे ? नरेंद्र ने कहा – हिमालय में था। बिल्कुल ठीक था। दो साल बाद बेटा घर लौटा था। मां ने रोटला और सब्जी बनाई। अलग से मिठाई बनाना चाहती थीं। लेकिन नरेद्र भाई ने मना कर दिया। खाना खाकर नरेंद्र गांव में घूमने निकले तो मां ने सबसे पहले नरेंद्र के झोले को खोला। हैरान रह गईं। सिर्फ एक जोड़ी कपड़ा था। एक हाफ पेहरान, एक भगवा शाल और मां की एक तस्वीर थी। हिमालय से लौटने के बाद नरेंद्र मोदी सिर्फ एक दिन और एक रात घर रहे और अहमदाबाद के लिए रवाना हो गए।
अहमदाबाद में चाचा बाबूभाई स्टेट ट्रांसपोर्ट दफ्तर में कैंटीन चलाते थे। नरेंद्र मोदी कैंटीन में काम करने लगे। खाली वक्त में आध्यात्मिक और राजनीति पर चर्चा करते। आरएसएस के पक्के स्वयंसेवक बन चुके थे। अहमदाबाद में भी शाखा में नरेंद्र रोज जाते। नरेंद्र मोदी 21 साल के हो चुके थे। 1971 का साल था। पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में जंग छिड़ी थी। भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश को मदद कर रही थी। सैनिक जब अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से होकर जाते नरेंद्र भाई उनकी मदद करने में जुट जाते। इसी दौरान वकील साहब से दोबारा मिले। संघ से जुड़कर काम करने की इच्छा जताई। नरेंद्र भाई ने उसी दिन चाचा का घर छोड़ दिया। तय कर लिया शादी नहीं करेंगे। सारी जिंदगी संघ के नाम कर दी।
मोदी अहमदाबाद के हेडगेवार भवन में रहने लगे। सुबह सुबह तीन बजे बिस्तर छोड़ देते। सबको जगाते, सबके लिए चाय बनाते, खाना बनाते और बर्तन धोते। वकील साहब को गुरु मान चुके थे। मना करने के बावजूद उनके कपड़े साफ करते। एक साल तक नरेंद्र भाई का यही रुटिन रहा। वकील साहब ने उन्हें इतिहास और संस्कृत पढ़ने की सलाह दी। नरेंद्र मोदी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्राचार में दाखिला ले लिया। और तय समय पर ग्रेजुएशन कर लिया। आरएसएस में नरेंद्र मोदी की जिम्मेदारी बढ़ा दी गई। आने वाले सभी चिट्ठियों का जवाब देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। नरेंद्र एक साल तक ये जिम्मेदारी निभाते रहे। जिसके बाद स्वयंसेवकों के परिवार की मदद करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
संघ के बड़े नेताओं को रेल और बसों में सीट बुक कराने की जिम्मेदारी दी गई। नरेंद्र मोदी ने इस काम को बखूबी निभाया और इसी दौरान रेल और बस ट्रांसपोर्ट से जुड़े अधिकारियों से थोड़ी बहुत जान पहचान हुई। विश्व हिन्दू परिषद ने सिद्धपुर में गुजरात सम्मेलन का आयोजन किया। पूरी जिम्मेदारी मोदी को दी गई। नरेंद्र मोदी विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं के संपर्क में आए। 1973 तक कांग्रेस के खिलाफ देश में माहौल बना। गुजरात में कांग्रेस के खिलाफ नवनिर्माण आंदोलन शुरु हुआ। लोकनायक जयप्रकाश नारायण अहमदाबाद आए। मोदी पहली बार जेपी से मिले। 25-26 जून 1975 की आधी रात को देश में इमरजेंसी का ऐलान कर दिया गया। जनसंघ से जुड़े सभी नेता गिरफ्तार कर लिए गए। नरेंद्र मोदी अंडरग्राउंड हो गए। 1980 तक नरेंद्र मोदी का जीवन संघर्ष से भरा रहा। साल 1980 में बीजेपी का जन्म हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी पहले अध्यक्ष बने। 1981 में 31 साल के नरेंद्र मोदी को संघ ने गुजरात का प्रभार दिया।
मोदी मशहूर हुए तो गुजरात बीजेपी के दो बड़े नेता केशुभाई पटेल और शंकर सिंह वाघेला जल-भुन गए। अब बीजेपी में ना वाघेला हैं ना केशुभाई। इन दोनों ने मोदी को रोकने की बहुत कोशिश की। लेकिन मोदी को रोकना इनके बस की बात नहीं थी। यही आज की सबसे बड़ी हकीकत भी है कि लोग मोदी की आलोचना करें, मोदी को नापसंद करें लेकिन मोदी को नजरंदाज नहीं कर सकते हैं।
मनजीत नेगी – (लेखक इंडिया टीवी में विशेष संवाददाता हैं और हाल ही में गुजरात चुनाव कवर करके लौटे हैं।)







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