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मौत से सामना माउंट मनासलू

भारतीय फ़ौज के जाबांज जब सरहद पर अपने फर्ज को अंजाम नहीं दे रहे होते हैं तब भी वो कुछ ऐसा कर रहे होते हैं जिससे वो अपनी जीवटता को आजमा सकें। इसीलिए कुछ फौजी बढ़ चले हैं दुनिया की सबसे दुर्गम चोटी माउंट मनासलू

भारतीय फ़ौज के जाबांज जब सरहद पर अपने फर्ज को अंजाम नहीं दे रहे होते हैं तब भी वो कुछ ऐसा कर रहे होते हैं जिससे वो अपनी जीवटता को आजमा सकें। इसीलिए कुछ फौजी बढ़ चले हैं दुनिया की सबसे दुर्गम चोटी माउंट मनासलू की तरफए वो चोटी जो करीब करीब माउन्ट एवरेस्ट जितनी ही है लेकिन उस पर चढ़ना एवरेस्ट से ज्यादा कठिन है। पहली बार मई 1956 में एक जापानी पर्यटक के बाद से आज तक कोई भी भारतीय माउंट मनासलू को फतह नहीं कर पाया। लेकिन पहली बार भारतीय सेना की टीम ने माउंट मनासलू पर तिरंगा फहराने का साहस किया। 8163 किमी ऊँची माउंट मनासलू दुनिया की आठवीं ऊँची चोटी है।

माउंट मनासलू को फतह करने के लिए भारतीय सेना की टीम ने दिल्ली से अपना सफ़र शुरू किया। इस मुश्किल सफ़र में मैं भी इस ऐतिहासिक टीम का हिस्सा बना। दिल्ली से नेपाल की राजधानी काठमांडू का सफ़र हवाई जहाज से तय किया गया। काठमांडू से आगे का सफ़र तय करने से पहले सेना की टीम ने भगवान पशुपतिनाथ का आशीर्वाद लिया। काठमांडू से आगे 104 किमी का सफ़र बस से तय करना है। रास्ते में प्राचीन मनोकामना देवी का मंदिर मिलता है। माँ मनोकामना के बारे में मान्यता है की वो मांगने वाली की हर कामना पूरी करती हैं। सेना की टीम ने माँ मनोकामना के दर्शन किये और अपने आगे के सफ़र पर चल पड़े।

काठमांडू से अरुघाट तक पहुँचने के लिए दस दिन का सफ़र पैदल तय किया गया। पूरा रास्ता खतरनाक पहाड़ों से पटा पड़ा है। जरा सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है। बेस कैंप पहुँचने से पहले तिब्बत सीमा पर बसे समा गाँव में सेना की टीम का जोरदार स्वागत हुआ। समा गाँव तिब्बत सीमा पर बसा आखिरी गाँव है। स्थानीय धर्मगुरु लामा ने टीम के खास पूजा अर्चना की। स्थानीय लोगों ने सेना की टीम को शुभकामना के रूप में धनुष बाण भेंट किये। सेना के जवान अब असली मुश्किलों से जूझने की तैयारी कर रहे थे। खून जमा देने वाली ठण्ड और तेज बर्फीली हवा के बीच सेना की टीम ने दो टुकड़ी बनाकर आगे का सफ़र शुरू किया। बेस कैंप से कैंप- 1 तक पहुँचने की तैयारी शुरू हो गयी, लेकिन मौसम पलपल बदल रहा था। अचानक सेना की टीम को भरी बर्फवारी का सामना करना पड़ा। तापमान शून्य से 35 डिग्री नीचे पहुँच गया। किसी तरह मौसम ने साथ दिया तो टीम ने आगे बढ़ना शुरू किया।

बेस कैंप से माउंट मनासलू की चोटी तक पहुँचने के लिए तीन कैंप लगाये गए। अब सेना की टीम का सामना ऐसी हकीकत से होने वाला था जिससे किसी के भी होश फाख्ता हो जायं। सेना की इस टीम का एक जवान कुंचुक ग्याचो अपनी टीम से थोड़ा बिछड़ गया। कुंचुक ग्याचो जैसे थोड़ा आगे गया उसने देखा की कोई उसका इंतजार कर रहा है, लेकिन जैसे ही वो पास गया उसने देखा की ये तो सालों पहले मर चुके किसी विदेशी पर्यटक का शव है। इस घटना से सेना के उन जवानों के हौसले कमजोर हो गए जो पहली बार इस कठिन यात्रा पर आये थे। लेकिन मौत से सामना होने का ये पहला और आखिरी मौका नहीं था। टीम जैसे जैसे कैंप- 2 और कैंप-3 की तरफ आगे बढ़ी मुश्किलें बढ़ती गयी। आगे राउल नाम के एक फ़्रांसिसी पर्वतारोही से मुलाकात होने पर सेना की टीम का हौसला बढ़ गया। राउल की उम्र 60 साल से ज्यादा थी। कैंप-1पर सेना के जवानों ने इस विदेशी पर्यटक के साथ गर्म चाय का आनंद लिया। राउल सेना की मेहमानवाजी से बहुत खुश हुआ, लेकिन ये साथ ज्यादा देर तक नहीं चला। आगे जाने पर फ़्रांसिसी पर्वतारोही अपने एक और साथी के साथ बर्फीले तूफान की चपेट में आ गया। सेना की टीम के लिए ये दूसरा बड़ा झटका था। सेना की टीम की मुश्किलें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी लेकिन जवानों ने अपना हौसला बनाये रखा और आगे बढ़ते रहे।

जैसे जैसे टीम कैंप 2 से 3 की तरफ बढ़ी मौसम का रुख पूरी तरह बदल गया। बर्फीली हवा की रफ़्तार 90किमी से भी तेज थी। बर्फीली खाई और ऊपर से गिरते हिमखंड यानि कदम कदम पर मौत, रस्सी के सहारे ऊँचे बर्फीले पहाड़ों पर सेना के जवान एक एक कदम आगे बढ़ा रहे थे। जरा सी चूक और सीधे हजारों मीटर गहरी मौत की खाई में, ऐसे कठिन हालत में शारीरिक और मानसिक तौर पर फिट रहना भी जरुरी है। इसके लिए कुछ खास तरह का खाना भी जरुरी है। चारों तरफ बर्फ से घिरे टैंट में खाना बनाना भी एक बड़ी चुनौती है। खास तरह के स्टोव में खाना बनाया जाता है। जवानों के लिए खास तरह के टैंट हैं लेकिन कुदरत के मुश्किल हालत में चीजें ठहर नहीं पाती हैं। बर्फीले तूफान से निपटने के लिए सेना के ये जवान रातभर बर्फ हटाते रहे जिससे टैंट दब न जाये।

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