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जिम कार्बेट और बाघ की कहानी

देश के सबसे लोकप्रिय टाइगर रिजर्वो में से एक उत्तराखंड का जिम कॉर्बेट रिजर्व अपनी 75वीं सालगिरह मना रहा है। इस मौके पर देशभर में उत्तराखंड स्थित मशहूर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के  बाघों की खूब चर्चा है। जिम कार्बेट बाघों के लिए सबसे सुरक्षित अभ्यारण्य

देश के सबसे लोकप्रिय टाइगर रिजर्वो में से एक उत्तराखंड का जिम कॉर्बेट रिजर्व अपनी 75वीं सालगिरह मना रहा है। इस मौके पर देशभर में उत्तराखंड स्थित मशहूर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के  बाघों की खूब चर्चा है। जिम कार्बेट बाघों के लिए सबसे सुरक्षित अभ्यारण्य माना जाता रहा है। हाल के सालों में देशभर में  बाघों की संख्या में गिरावट आ रही है और देश के बाघ प्राधिकरण ने भी कॉर्बेट की हालत पर चिंता जताई है। बताया जा रहा है कि देश में 1411 के क़रीब बाघ बचे हैं। कॉर्बेट में भी 164 बाघ हैं। देश में बाघ को बचाने को लेकर राज्य और केंद्र  सरकार के बीच जंग छिड़ी हुई है। ऐसे में बाघ का भला कैसे  होगा इस सवाल का जवाब हम सब को तलाशना होगा।  कवि केदारनाथ सिंह की बाघ सीरीज़ की एक मशहूर कविता है…कथाओं से भरे इस देश में एक कथा है बाघ भी…इसलिए कई बार जब उसे छिपने को नहीं मिलती कोई ठीक-ठाक जगह तो वह धीरे से उठता है और जाकर बैठ जाता है किसी कथा की ओट में। आज बाघ को अखबारों में छपने के लिए जगह तो खूब मिल रही है लेकिन छिपने के लिए ओट नहीं मिल रही है।

जिम कार्बेट के आसपास बाघों की संदिग्ध मौत को इस इलाके में नरभक्षी बाघों के आतंक से जोड़कर देखा जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से कॉर्बेट नेशनल पार्क के रामनगर और कालागढ़ इलाके में आदमखोर का आतंक है कई लोग आदमखोर बाघ का  निवाला बन चुके हैं। आदमखोर बाघ भी मारा गया। लेकिन और बाघों की मौत से चिंता बढ़ गयी है। उत्तराखंड में बाघ को लोगों अलग करके नहीं देखा जा सकता है। 8 अगस्त 1936 में स्थापित हुआ कॉर्बेट नेशनल पार्क देश का सबसे पुराना वन अभयारण्य है।  यह पार्क हिमालय की तराई में पांच सौ एकड इलाके में फैला है। शुरू में इसका नाम हैली नेशनल पार्क था। बाद में 1954-1955 में इसे रामगंगा नेशनल पार्क और 1955-1956 में इसे अंग्रेज शिकारी जिम कॉर्बेट का नाम दे दिया गया जिन्हें 1920 के दशक में कुमाऊं के इस इलाके में नरभक्षी बाघों व तेंदुओं के शिकार के लिए जाना जाता है। अपने शुरुआती दिनों से ही उन्हें शिकार का शौक था। वह अपने समकालीन शिकारियो की भांति खूब शिकार किया करते थे.बाद  में उन्हें खून- खराबे से ऐसी नफरत हुई कि बन्दूक की जगह कैमरा हाथ में ले लिया। यही पार्क 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत आना वाला पहला पार्क था। रामगंगा नदी के किनारे पसरा यह पार्क अपने वन्यप्राणियों के अलावा प्राकृतिक खूबसूरती के लिए भी जाना जाता है।  आज ऐसा क्या हुआ की इस इलाके के लोग बाघ के दुश्मन बन बैठे। क्या बाघ ने अपनी सीमा रेखा लाँघ दी है। कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हम सब को तलाशना होगा। मैंने बचपन से लेकर आज तक किसी स्थानीय निवासी के मुंह से नहीं सुना कि वो  बाघ को मारना चाहता है। हाँ सालों से नेपाल सीमापर से लेकर देश के दूसरे इलाकों से तस्कर जरुर बाघों का शिकार करते  आ रहे हैं।  जिसे रोकने के लिए कोई ठोस उपाय नजर नहीं आते। बाघ और  इंसानों के बीच बढ़ते टकराव रोकना वन विभाग व सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रही है। इसे रोके बिना बाघ संरक्षण की बात सोचना तक बेमानी है। करोड़ों रूपये खर्च होने के बावजूद बाघों का सरंक्षण अहम चुनौती बना हुआ है। बाघों का घर माने जाने वाले कार्बेट टाइगर रिजर्व में वर्ष 2010 में 4 बाघों की मौत हुई। वहीं 2009 में रिजर्व में यह आंकड़ा 6 तक पहुंच गया था।

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