विनोद कापड़ी के पास पत्रकारिता में 25 बरसों से ज्यादा का अनुभव है और वे खबरों में छुपी कहानी को ढूंढ कर फिल्म में लाए हैं। जो आपको एक साथ हंसाती और चकित करती है। हिंदी सिनेमा की नई यथार्थवादी धारा में कॉमेडी का मिश्रण
विनोद कापड़ी के पास पत्रकारिता में 25 बरसों से ज्यादा का अनुभव है और वे खबरों में छुपी कहानी को ढूंढ कर फिल्म में लाए हैं। जो आपको एक साथ हंसाती और चकित करती है। हिंदी सिनेमा की नई यथार्थवादी धारा में कॉमेडी का मिश्रण इसे ऐसी अन्य फिल्मों से अलग बनाता है। इस कॉमेडी में हंसाने की सामर्थ्य है और तीखे तंजध्व्यंग्य भी।
फिल्म मूल रूप से उत्तर भारतीय ग्रामीण समाज का चित्रण करती है, जिसमें आज भी एक वर्ग दबंग और दूसरा दबा हुआ है। दबंगों की इतनी चलती है कि वही अदालत लगाते हैं, वही मुकदमा करते हैं और फैसला भी वही देते हैं। पीड़ित की आवाज कहीं सुनाई नहीं देती। जिस नायक पर भैंस से बलात्कार का आरोप लगता है…
उसका पक्ष कभी सामने नहीं आता। पुलिस के साथ मिल कर दबंग मनमानी करते हैं। नतीजा यह कि खाप पंचायत पीड़ित को उस भैंस के साथ शादी करने का फरमान सुना देती है! कहानी के केंद्र में गांव टनकपुर का प्रधान सुआलाल गंडास (अन्नू कपूर) है। वह बूढ़ा है और उसकी पत्नी माया (ऋषिता भट्ट) कहीं कम उम्र की है। माया अर्जुन (राजीव बग्गा) से प्रेम करती है।
लेकिन छोटे-से गांव में चोरी-छुपे प्रेम कब तक उजागर नहीं होगा? माया-अर्जुन को साथ पकड़ते ही सुआलाल आग बबूला होता है। अर्जुन को कारिंदो से खूब पिटवाता है। हाथ-पैर तुड़वा बैलगाड़ी में बांध कर हवा में लटका देता है।
माया-अर्जुन का संबंध सार्वजनिक होने पर सुआलाल की प्रतिष्ठा पर दाग लगेगा, अतः वह प्रचार करता है कि अर्जुन ने मेले में मिस टनकपुर का खिताब जीतने वाली उसकी भैंस के साथ बलात्कार किया!
इसके बाद निर्देशक ने जिस तरह से कहानी को आगे बढ़ाया, वह समाज में स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव, दबंगों की मानसिकता, पुलिस की कार्यप्रणाली और समाज की दब्बू सोच को सामने लाता है। कुछ कॉमिक दृश्य जहां आपको जमकर हंसाते हैं, वहीं अर्जुन के पिता की आत्महत्या का दृश्य दहला देता है। यह दृश्य लेखक-निर्देशक की सिनेमा पर पकड़ की गवाही देते हैं। सभी कलाकारों का काम बढ़िया है।
खास तौर पर अन्नू कपूर और ओम पुरी। राजीव बग्गा के हिस्से में ज्यादातर सीधा-सादा व्यवहार और खामोशी आई है, मगर वह इसे प्रभावी ढंग से निभाने में कामयाब रहे हैं। एक तरफ जहां उनका प्रेम खामोश है, वहीं दूसरी तरफ दबंगों के सामने उनकी दयनीय चुप्पी सच्ची मालूम पड़ती है।
कापड़ी ने अंत में कहानी को देश में दर्ज होने वाले झूठे आरोपों और मुकदमों से जोड़ा है। अगर अदालतों में लाखों केस फाइलों में दबे हैं तो उसमें झूठ के इन पुलिंदों का बड़ा योगदान है। फिल्म एक युवा निर्देशक का सच्चा प्रयास है, जिसे देखने के बाद ही आप इस पर विश्वास कर सकते हैं।
विनोद कापड़ी हिन्दी टीवी न्यूज की दुनिया में जाना पहचाना नाम है। विनोद कापड़ी को टीआरपी का खिलाडी माना जाता है। जनता की नब्ज पहचानने और टीवी न्यूज को नयी पहचान देने में उनका बडा हाथ है। ये विनोद कापड़ी की काबलियत ही है जिसके चलते उन्होने 3 बडे चैनलों को नंबर तक पहुचाया है। पहले जी न्यूज फिर स्टार न्यूज और इंडिया टीवी।
उत्तराखंड में पिथौरागढ़ के रहने वाले कापड़ी जी बरेली में पले बढ़े। उन्होंने पत्रकारिता की शुरूआत अमर उजाला से की और उसके बाद दिल्ली आकर जी न्यूज के साथ अपना सफर शुरू किया। संवाददाता के पद से शुरू हुआ उनका सफर जी न्यूज के आउट पुट हैड तक पहुंचा। बाद में वो स्टार न्यूज गये और वहां भी लम्बी पारी खेलने के बाद उन्होंने इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर के तौर पर अपनी पारी शुरू की।
विनोद कापड़ी द्वारा निर्देशक फिल्म ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ रिलीज हो गई। इसके अलावा वह अभी तक 100 से ज्यादा डॉक्यूमेंटरी फिल्म बना चुके हैं, जिसमें संसद और मुंबई में आतंकी हमला प्रुमख है।
हिलमेल की तरफ से उत्तराखंड के इस सपूत को उनके उज्जवल भविष्य के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
वाई एस बिष्ट, सम्पादक, हिलमेल







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