वे उत्तराखंड व उत्तराखंडवासी दोनों के लिए चिंतित रहते थे। बात 1986 की है, धरासू (उत्तरकाशी) में मनेरी भाली फेज 2 में सुरंग आ काम चल रहा था….. सुरंग का निर्माण कार्य किसी राज कुमार कंस्ट्रक्सन कंपनी का था… मजदूरों ने अपनी मांगों के समर्थन
वे उत्तराखंड व उत्तराखंडवासी दोनों के लिए चिंतित रहते थे। बात 1986 की है, धरासू (उत्तरकाशी) में मनेरी भाली फेज 2 में सुरंग आ काम चल रहा था….. सुरंग का निर्माण कार्य किसी राज कुमार कंस्ट्रक्सन कंपनी का था… मजदूरों ने अपनी मांगों के समर्थन में हड़ताल की और कंपनी के कारिंदों ने मजदूरों पर गोलियां चला दी इसमे करीब डेढ़ दर्जन मजदूर घायल हुए जिस रात को मजदूरों पर गोलिया चली थी। उसी रात को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राजस्व मंत्री व क्षेत्रीय विधायक स्व. बलदेव सिंह आर्य सामने ही चिन्याली सौड़ गेस्ट हाउस में ठहरे हुए थे और उसी रात कंपनी के मालिकों की आर्य से मुलाकात हुयी थी….. तब मै यहाँ से नवभारत टाइम्स का जिला संवाददाता था….. मैंने यहाँ से एक बड़ी करीब आधा पेज की खबर छापी…… शीर्षक था… मंत्री सो रहे थे और सामने मजदूर गोलियां खा रहे थे…….. इस घटना के खिलाफ बड़ा आन्दोलन कामरेट कमला राम नौटियाल के नेतृत्त्व में चल रहा था। पर कंपनी वाले टस से मस नहीं हो रहे थे।
इसी दौरान बहुगुणा जी, उत्तरकाशी आये, यहाँ सभा के बाद मैंने उनसे कहा, यहाँ एक बड़ा हादसा हो गया है मैंने उनको खबर दिखाई। तो वे तुरंत घटनास्थल पर चलने के लिए तैयार हो गए….. साथ में टेहरी के सांसद त्रेपन सिंह नेगी भी थे। बहुगुणा जी ने घटनास्थल पर जाकर मालिकों को चेताया और मजदूरों से शीघ्र समझौता करने को कहा। उनका इतना असर हुआ की मालिकों ने मजदूरों की लगभग सारी मांगे मान ली।
उसके बाद मै भी बहुगुणा जी, के साथ उनकी गाड़ी में बैठकर हम यमुना घाटी की ओर चल पड़े…. रास्ते में राड़ी पर्वत पर सड़क के किनारे दो-चार कच्चे झोपड़ों में ढाबे चलते हैं… बहुगुणा जी, ने कहा, यहाँ चाय पी लेते हैं…. गाड़ी थोड़ी आगे रूकी और वे आपस में बतियाते हुए यहाँ के घने जंगल को निहारने लगे …. मै होटल वालों के पास आया और चार-पांच चाय बनाने को कहा… होटल वाले उस समय तास के पत्ते खेलने में व्यस्त थे…. मेरे दो-तीन बार कहने पर भी वे टस से मस नहीं हुए…. मेरी स्थिति बेहद खराब हो रही थी कि एक पत्रकार, बहुगुणा जी जैसे राष्ट्रीय नेता के लिए चाय नहीं बनवा पा रहा था, मैंने अपना पता फेंकते हुए कहा… अरे भैया… ये कुरते वाले हेमवती बहुगुणा हैं पता है…..? यह सुनते ही उनमे एक करंट सा आया और उनमे से एक बहुगुणा जी के पास जाकर कहने लगा… साहब दही पिओ एकदम ताजी है….. साब मै फौज से रिटायर होकर आया हूँ आपका बहुत नाम सुना आज दर्शन भी हो गए…. हम सब ने दही पी पर फौजी ने पैसे नहीं लिए… बहुगुणा जी के जबरदस्ती करने पर वे बोले बस साहब अब थोड़ी इज्जत हमारी भी रख लो……
हम आगे चले तो तो बहुगुणा जी… बोले मै देख रहा था वे तास के चक्कर में चाय बनाने को तैयार नहीं थे शायद आप हमारा नाम नहीं लेते तो वे टस से मस नहीं होते…. फिर थोड़ी देर की छुपी के बाद बोले हमारे लोग व्यापार में कमजोर है, हम अलग राज्य की बात करते हैं…. यदि ऐसा हुआ भी तो हमारे लोग पत्ते खेलते रह जायेंगे और सारा कारोबार दूसरों के हाथ में चला जाएगा… मुझे इस बात की बड़ी चिंता है…..
बात करीब ढाई दशक पहले की है, स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा तब लोकदल में थे..हरियाणा के दिग्गज नेता देवी लाल उन्हें दगा दे चुके थे और उन्हें दिल की बीमारी ने घेर लिया था। मैंने तब हिंदुस्तान अखबार, में उप सम्पादक के रूप में ज्वाइन किया था। बहुगुणा जी का आवास लोदी कालोनी नई दिल्ली में था। जहां मेरा काफी आना-जाना था। बहुगुणा जी कभी-कभी घंटों लोगों से बातें करते थे….. डाक्टरों ने उन्हें शायद दूसरी बार दिल के आपरेशन की सलाह दे दी थी….
एक दिन उत्तराखंड की समस्याओं पर चर्चा के दौरान बेहद गंभीर होकर बोले.. मै ऐसे समय पहाड़ आया जब मेरे पास ज्यादा समय नहीं है। यदि मेरे पास 20 साल का समय होता तो मै उत्तराखंड को विकास की ऐसी दिशा दे जाता कि आने वाली पीड़ियाँ याद करती…
कुछ देर मौन रहे फिर बोले… आज भी मेरे सपनों में मुझे गाँव में रहने वाली मेरी बड़ी दीदी दिखाई देती है…. कहीं पहाडी से सर पर लकड़ी व घास का बोझ लेते हुए… अचानक मुझ से सवाल करती है… हेमू… (शायद काडू).. तू इतना बड़ा नेता बनता है पर तू हमारे सर से ये बोझ नहीं उतार पाया, क्या तू ये बोझ कभी हमारे सर से उतार पायेगा ? और यह कह कर वह पहाडी पगदंडी पर आगे बढ़ जाती है! बहुगुणा जी भावुक होकर कहने लगे… कि यह सपना मै कई बार देख चुका हूँ…..
मुझे आज भी याद है… हर पल उत्साह से लाबलेज बहुगुणा जी का गला तब भर आया था और वहां बैठे लोग भी भावुक हो गये थे…. इस पर मैंने कहा… बहुगुणा जी अभी तो आपने देश का प्रधानमंत्री बनना है….? इस पर वे बोले…. बेटे, मेरे पास अगर समय होता तो मै इंडियन पोलिटिक्स को नई दिशा दे जाता….. पर शरीर साथ नहीं दे रहा है…
एक दिन बोले….. ब्रह्मदत्त क्या कर रहे हैं…? (तब प. ब्रह्मदत्त टेहरी से सांसद और केंद्रीय पेट्रोलिंयम मंत्री थे.)…. उन्हें कहना कि पहाड़ के लोग गरीब होते हैं जो मांगे, उसे गैस कनेक्शन जरूर दे देना…. बेचारे आज भी दिल्ली में अधिकाँश लोग अंगीठी में खाना पकाने को मजबूर हैं.!.. मैंने दूसरे दिन यह सन्देश हू ब हू ब्रह्मदत्त जी को दे दिया….. उसके बाद ब्रह्मदत्त जी ने लोगों को खूब कनेक्शन बांटे। खुद मैंने ऐसे-ऐसे पत्रकारों को गैस कनेक्शन दिलवाए… जो आज देश के नामी गिरामी लोगों की सूची में है…
कुल मिलाकर बहुगुणा जी हिमालय के विकास के बड़े इंजीनियर थे…. बड़े से बड़े पहाड़ के विशेषज्ञ भी उनकी बात विद्यार्थियों की तरह सुनते थे..
आज नये मुख्यमंत्री के रूप में उनके पुत्र विजय बहुगुणा के हाथ में उत्तराखंड की कमान आ गई है….. वे बड़े बाप के बेटे हैं… दूसरी बार टेहरी गढ़वाल से सांसद हैं पर लोकसभा के अन्दर आज तक उत्तराखंड की किसी भी समस्या को उन्हें प्रभावी ढंग से उठाते हुए नहीं देखा… पर अब उन पर उत्तराखंड के भविष्य की जिम्मेदारी आ गई है…. हर पहाडवासी को उम्मीद करनी चाहिए कि वे बहुगुणा के सच्चे राजनीतिक वारिश सिद्ध होंगे और वे हमारी तमाम शंकाओं को झुठला देंगे….
उन्हें अपने राजनीतिक तरकश से अपने पिता द्वारा दिए गए राजनीतिक तीरों का सही व सटीक इस्तेमाल करना होगा तथा उत्तराखंड के विकास के लिए दिल और दिमाग दोनों से काम लेना होगा।
विजेंद्र रावत (वरिष्ट पत्रकार)







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