आखिरकार छः घंटे तक चली लम्बी मैराथन बैठक के बाद हरीश रावत के नाम पर मुहर लग गई। दिल्ली से आये पर्यवेक्षकों ने 1 फरवरी को देहरादून में विधायक दल की बैठक की जिसके बाद मुख्यमंत्री पद के लिए हरीश रावत के नाम का ऐलान
आखिरकार छः घंटे तक चली लम्बी मैराथन बैठक के बाद हरीश रावत के नाम पर मुहर लग गई। दिल्ली से आये पर्यवेक्षकों ने 1 फरवरी को देहरादून में विधायक दल की बैठक की जिसके बाद मुख्यमंत्री पद के लिए हरीश रावत के नाम का ऐलान किया। उसके बाद राज्यपाल अजीज कुरैशी ने हरीश रावत और उनके मंत्रीमंडल को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।
इससे पहले 31 जनवरी को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया था।
मुख्यमंत्री ने शपथ ग्रहण के बाद परेड़ ग्राउण्ड में आयोजित विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि हम सभी का प्रयास होना चाहिए कि हम उत्तराखंड को विकास की नई ऊंचाई तक पहुंचाये।
उन्होंने कहा कि राज्य के विकास के लिए शीघ्र ही मंत्रिमण्डल के सहयोगियों से विचार-विमर्श कर प्राथमिकताएं तय कर जनता के सामने रखेंगे। वे हर जिलें के गांव-गांव तक जाकर जनता से मिलेंगे और उनके दुःख दर्द को बांटेंगे।
पिछले साल उत्तराखंड को भयंकर त्रासदी का सामना करना पड़ा है, इसका पुनर्निर्माण कार्य तेजी हो, इसके सभी को मिलजुलकर काम करना होगा।
हरीश रावत का जन्म 27 अप्रैल 1948 को अल्मोड़ा जिले की भिकियासैंण तहसील में मोहनरी गांव में हुआ उनका बचपन से रूझान राजनीति की ओर रहा।
लखनऊ विविद्यालय से एलएलबी करने के बाद रावत ने वकालत को अपने जीवन यापन का साधन बनाया, लेकिन राजनीति का दामन भी थामे रखा।
विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने भारतीय युवक कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। 1973 में कांग्रेस की जिला युवा इकाई के प्रमुख चुने जाने वाले वे सबसे कम उम्र के युवा थे। 1973 और 1980 के बीच की अवधि में रावत जिला स्तर से लेकर प्रदेश स्तर तक युवक कांग्रेस के महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
1980 में वह पहली बार अल्मोड़ा पिथौरागढ़ लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए। उसके बाद वर्ष 1984 व 1989 में भी उन्होंने संसद में इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
1992 में उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का महत्वपूर्ण पद संभाला जिसकी जिम्मेदारी वह वर्ष 1997 तक संभालते रहे।
राज्य निर्माण के पश्चात रावत प्रदेश कांग्रेस के पहले अध्यक्ष बनाये गये और उनकी अगुआई में 2002 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बहुमत प्राप्त हुआ और उत्तराखंड में कांग्रेस की पहली निर्वाचित सरकार बनी।
उसी साल नवम्बर 2002 में रावत को उत्तराखंड से राज्य सभा के सदस्य के रूप में भेजा गया। पिछले लोकसभा चुनाव (वर्ष 2009) में उन्होंने हरिद्वार संसदीय सीट से चुनाव लड़ा और भारी मतों से विजयी रहे।
छात्र जीवन से ही संघर्षशील रहे हरीश रावत के सिर आखिरकार मुख्यमंत्री का ताज सज गया। हालांकि इसके लिए उन्हें बाहरी नहीं बल्कि ‘अपनों’ के बिछाये सियासी बिसात से होकर गुजरना पड़ा।
इस कुर्सी पर उनकी दावेदारी तो राज्य बनने के बाद पहली कांग्रेस सरकार बनने के समय से ही थी, लेकिन वे जब भी आगे बढ़े अपने लोग ही उनके रास्ते में ‘कांटे’ बिछाते रहे। उन्होंने हार नहीं मानी और राज्य के ‘सिंहासन’ के लिए करीब 12 साल तक वह अपने ही सैनिकों (कांग्रेसियों) से अघोषित ‘युद्ध’ लड़े और विजय हासिल की।
हरीश रावत के सियासी सफर पर गौर करें तो उनकी पहचान जमीनी नेता और कुशल संगठनकर्ता की रही है। राज्य से लेकर केंद्र स्तर पर उनकी पकड़ काफी मजबूत है।
हिलमेल ब्यूरो







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