कैसे बनते हैं स्पेशल फोर्स के पैरा कमांडो। दुश्मन के इलाके में घुसकर घात लगाकर हमला करना हो या आतंकवादियों के खिलाफ स्पेशल ऑपरेशन आसमान से छलांग लगाने वाले ये पैरा कमांडो हर मोर्चे पर सबसे आगे हैं। आज देश की सेनाओं के पास आसमान
कैसे बनते हैं स्पेशल फोर्स के पैरा कमांडो। दुश्मन के इलाके में घुसकर घात लगाकर हमला करना हो या आतंकवादियों के खिलाफ स्पेशल ऑपरेशन आसमान से छलांग लगाने वाले ये पैरा कमांडो हर मोर्चे पर सबसे आगे हैं। आज देश की सेनाओं के पास आसमान से धावा बोलने वाले दो हजार घातक पैरा कमांडो हर वक्त तैयार हैं। पैरा ट्रेनिंग स्कूल आगरा में तैयार हो रहे ये पैरा कमांडो देश की तीनों सेनाओं के लिए कितने अहम् हैं इसका अंदाजा इस बात से लगया जा सकता है कि 1971 की भारत-पाक जंग में 700 पैरा कमांडो ने लड़ाई का रुख बदल दिया था। हाल के दिनों में 26ध्11 के मुंबई हमले की बात हो या जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई पैरा कमांडो का कोई सानी नहीं है। पीटीएस के मुख्य प्रशिक्षक विंग कमांडर सलीम बेग के मुताबिक आसमान में 5 हजार से लेकर 30 हजार फीट तक की ऊंचाई से छलांग लगाकर दुश्मन का खात्मा करने वाले पैरा कमांडो की ट्रेनिंग काफी कड़ी होती है। आसमान से छलांग लगाने से पहले जमीन पर कड़ी ट्रेनिंग होती है। ये ट्रेनिंग 15 दिन की होती है। इंडिया टीवी संवाददाता मनजीत नेगी भी इस ट्रेनिंग का हिस्सा बने। अलग अलग चरणों में ये ट्रेनिंग काफी खतरनाक होती है जो एक पैरा कमांडो को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाती है।
आसमान में हजारों फीट की ऊंचाई पर एक पैरा कमांडो की जिंदगी पैराशूट के सहारे होती है। पैराशूट को लेकर छोटी सी गलती का मतलब मौत है। पैरा कमांडो का सबसे अहम् हथियार उसका पैराशूट होता है। पैराशूट को आसमान में सही समय पर खोलने की ट्रेनिंग सबसे अहम् होती है। एक पैरा कमांडो के पास दो पैराशूट होते हैं। पहला पैराशूट जिसका वजन 15 किलोग्राम होता है जबकि दूसरा रिजर्व पैराशूट जिसका वजन 5 किलोग्राम होता है। पैराशूट की कीमत 1 लाख से लेकर 2 लाख तक होती है। पैरा कमांडो को कई तरह की कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना होता है। इस ट्रेनिंग में अगर किसी ऊँची बिल्डिंग के अन्दर आतंकी छुपे हों तो कैसे उन्हें खत्म करना है। खासतौर से मुंबई पर आतंकी हमले के बाद जिस तरह से महानगरों में आतंकी हमले का खतरा बढ़ा है। पैरा कमांडो को हर हालात से निपटने में महारत हासिल करनी होती है। एक और अहम् ट्रेनिंग है दुश्मन पर नजदीक से घात लगाकर हमला करना। ये सबसे ज्यादा खतरनाक ट्रेनिंग है। घने जंगल के बीच में दुश्मन पर घात लगाकर हमला किया जाता है। इसके लिए नजदीक से दुश्मन पर गोली मारने की ट्रेनिंग काफी अहम् होती है। जितनी ज्यादा ऊंचाई से छलांग लगाई जाएगी उतनी ही दूर तक दुश्मन के इलाके को कवर किया जा सकता है। पैराशूट और हथियार का वजन मिलाकर एक कमांडो अपने साथ 40 से 50 पचास किलोग्राम वजन ले जाता है। जब पैरा कमांडो को किसी स्पेशल ऑपरेशन को अंजाम देने का हुक्म मिलता है तो उसके लिए काफी तैयारी की जाती है। सबसे पहले खुफिया सूचना के आधार पर ऑपरेशन प्लान तैयार किया जाता है। कहाँ पैरा कमांडो को गिरना है और किस इलाके में दुश्मन पर धावा बोलना है।
पांच एएन-32 जहाज पैरा कमांडो को एक खास ऑपरेशन पर ले जाने के लिए तैयार हैं। छतरी माता की जय, छतरी (पैराशूट) माता की जय के नारों के साथ भारतीय छाताधारी सैनिक परिवहन विमानों में सवार होते हैं। एएन-32 जहाज में 42 पैरा कमांडो जा सकते हैं। जहाज के अन्दर मौजूद पैरा कमांडो दुश्मन पर घात लगाकर हमला करने के लिए तैयार हैं। दुश्मन के इलाके में पहुँचने पर सही मौका मिलते ही हजारों फीट आसमान से ये जांबाज धावा बोल देंगे। इसके बाद आसमान में दर्जनों छतरियां छा जाती हैं। इसके साथ ही हवाई जहाज से पैरा कमांडो की मदद के लिए बीएमपी टैंक और एंटी टैंक मिसाइल से लैस जीप को भी आसमान से पैराशूट के सहारे दुश्मन के इलाके में गिराया जाता है। पैराशूट से जमीन पर गिरते ही पैरा कमांडो दुश्मन पर धावा बोल देते हैं।
छाताधारी प्रशिक्षक स्कूल की स्थापना तो ब्रिटिश भारतीय सेना के दौर में अक्टूबर 1941 में हुई थी और तब इसका दायित्व भारतीय सैनिकों को छाताधारी सैनिक के रूप में प्रशिक्षित करने का था। तब से आज तक पैराशूट तकनीक में क्रांतिकारी बदलाव आया है और अब पैराशूट की मदद से ट्रक के आकार के लड़ाकू वाहन बीएमपी भी गिराए जा सकते हैं और इनके लिए विशेष प्रकार के मंच पी-16 बनाए गए हैं, जिन पर वाहनों को रखकर कई प्रकार के एक साथ बंधे हुए आसमान में लहराते हुए पैराशूट जमीन पर उतारते हैं। दुश्मन के इलाके में सैनिकों को उतारने के साथ-साथ लड़ाकू वाहनों को भी उतारना काफी महत्वपूर्ण होता है और भारतीय वायुसेना की यह क्षमता दुनिया की किसी भी उन्नत वायुसेना के बराबर मानी जाने लगी है और छाताधारी प्रशिक्षक स्कूल आज एशिया के सबसे बड़े प्रशिक्षण केन्द्रों में माना जाने लगा है। स्कूल के प्रमुख ग्रुप कैप्टन सचिन कपूर बताते हैं कि यह स्कूल साल में 12 हजार से अधिक छाताधारी सैनिकों को तैयार करता है, जिसमें केवल वायुसेना और थलसेना के छाताधारी सैनिक ही नहीं, बल्कि नौसेना, मित्र देशों के सैनिक, अर्धसैनिक बलों और सैन्य अकादमियों के कैडेट भी शामिल हैं। इनमें से कई छाताधारी सैनिक रात के समय 30 हजार फुट की ऊंचाई से मुक्त होकर गिरने की क्षमता रखते हैं, जिनका सदुपयोग 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के लिए प्रसिद्ध टंगैल अभियान में किया गया। 1987 में श्रीलंका में ऑपरेशन पवन के तहत जाफना प्रायद्वीप पर सैनिक साज-सामान गिराना और 1988 में मालदीव की सत्ता पलटने वालों के षड्यंत्र को विफल करने के लिए ऑपरेशन कैक्टस के दौरान सबसे पहले भारतीय छाताधारी सैनिकों को ही उतारा गया था।
– मनजीत नेगी, विशेष संवाददाता, इंडिया टीवी, आगरा







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