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हादसे आखिर कब तक…?

हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून पौड़ी के धुमाकोट में हुए बस हादसे ने एक बार फिर उत्तराखंड की बुनियादी व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। क्यों आखिर उत्तराखंड से पलायन क्यों नहीं थम रहा है, इस बस हादसे की वजहें ऐसे सभी सवालों का जवाब हैं।

हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून
पौड़ी के धुमाकोट में हुए बस हादसे ने एक बार फिर उत्तराखंड की बुनियादी व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। क्यों आखिर उत्तराखंड से पलायन क्यों नहीं थम रहा है, इस बस हादसे की वजहें ऐसे सभी सवालों का जवाब हैं। खराब सड़कें, लचर परिवहन व्यवस्था, मृतप्रायः स्वास्थ्य सेवाएं और समय पर बचाव दल का न पहुंच पाना। इन सबने मिलकर उत्तराखंड को लाचार बना दिया है।
धुमाकोट बस हादसा इस बात की ओर इशारा करता है कि पहाड़ में छोटी लापरवाही की भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। सड़क पर बने एक गढ्ढे ने 48 लोगों की जान ले ली। यदि इस सड़क की समय पर मरम्मत होती तो, यदि ओवर लोडिंग न होती, यदि कमज़ोर पुश्ते को दुरुस्त कर लिया गया होता, तो ये हादसा न होता। कुछ ज़िंदगियां तब भी बचाई जा सकती थी, अगर राहत व बचाव कार्य समय पर शुरू हो गया होता, सबसे नजदीक के अस्पताल में ऑक्सीजन समेत दूसरी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध होतीं। ऐसा नहीं है कि सरकार एक्शन ले रही है, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जनहित के फैसले महज कागजी न होकर जमीन पर भी दिखाई दें।
कैसे हुआ हादसा
पहली जुलाई को सुबह करीब सवा आठ बजे पौड़ी गढ़वाल के धुमाकोट थाना क्षेत्र में बमणीसैण से रामनगर जा रही जीएमओयू की बस धुमाकोट से 10-12 किमी पहले ग्वीन गांव के पास समय अनियंत्रित होकर 100 मीटर गहरी खाई में गिर गई। 28 सीटर इस बस में 60 व्यक्ति सवार थे। इस दुर्घटना में 45 सवारियों की मौके पर ही मौत हो गई।15 घायलों को उपचार के लिए नजदीकी असपताल धुमाकोट भेजा गया। यहां इलाज के दौरान 3 घायलों की मृत्यु हो गई। मारे गए लोगों में22 पुरुष, 16 महिलायें एवं 10 बच्चे शामिल हैं।
वो बातें, जो न होतीं, तो न होता हादसा
ओवरलोडिंग- 28 सीट वाली बस में 60 यात्री बैठे हुए थे। यानी बस की क्षमता के दोगुने से भी अधिक। पहाड़ में आने-जाने वाली बसों में ओवर लोडिंग सामान्य बात है। बसों की संख्या भी कम है। इसलिए एक बस में क्षमता से अधिक यात्री बिठाये जाते हैं। ओवर लोडिंग धुमाकोट बस हादसे की एक बड़ी वजह बना। हेलमेट न पहनने पर बाज जैसी निगाहें रखने वाले पुलिस कर्मचारियों को बसों में ओवर लोडिंग नहीं दिखाई देती। ओवरलोडिंग की वजह से बस को कहीं पर भी रोका क्यों नहीं गया।
खराब सड़कें- सड़क पर बना एक गढ्ढा धुमाकोट हादसे की बड़ी वजह बना। बस चढ़ाई पर थी, इसलिए उसकी रफ़्तार ज्यादा नहीं थी। सड़क पर बने गढ्ढे से बचने के लिए ड्राइवर ने बस को पुश्ते की ओर काटा। बारिश से कमज़ोर हो चुका पुश्ता ढह गया और बस खाई में गिर गई। तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए हम ऑल वेदर रोड बना रहे हैं। उत्तराखंड के लोगों के लिए बेहतर सड़क तक नहीं तैयार कर पा रहे। रामनगर से बमड़ीसैंण के बीच की 180 किमी सड़क सालों से जर्जर हालत में है। कोई डेंजर जोन चिन्हित नहीं किए गए हैं।
खस्ता हाल बसें- गढ़वाल मोटर्स यूजर्स (जीएमओयू) की बसों की हालत बेहद खस्ताहाल है। ये बस 1958 से इन्हीं सड़कों पर दौड़ रही हैं और दुर्घटना की वजह बनती हैं।
न समय पर राहत मिली, न इलाज
हादसे के बाद उपजी स्थिति से निपटने के लिए हम कितनी तेज़ी से अपने संसाधनों को इस्तेमाल में ला पाते हैं, इससे हमारी कुशलता का पता चलता है। धुमाकोट हादसे के बाद राहत बचाव कार्य के लिए रेस्क्यू टीमें समय से पहुंच ही नहीं सकीं। इस हादसे ने राज्य के आपदा प्रबंधन की पोल खोल दी। घटना के बाद राहत बचाव कार्य के लिये रेस्क्यू टीम घंटों देरी से मौके पर पहुंची। टीम के पास कोई उपकरण तक नहीं थे। घायलों को समय रहते उपचार नहीं मिला, जिससे उन्हें बचाया नहीं जा सका। घटनास्थल पर रवाना होने के लिए डीआईजी गढ़वाल की टीम हेली कंपनियों के सामने गिड़गिड़ाती रही। पुराने बिलों का भुगतान न होने से हेली कंपनियों ने उड़ान भरने में आनाकानी की।
एसडीआरएफ आईजी संजय गुंज्याल ने भी कहा कि चाहे धुमाकोट की घटना हो या अन्य कोई हादसा, राहत बचाव कार्य में संसाधनों के अभाव की वजह से समस्या और बड़ी हो जाती है। जिससे जनहानि भी बढ़ जाती है। धुमाकोट घटनास्थल से पुलिस थाना करीब 8 किलोमीटर दूर था। पुलिस टीम अपने सीमित संसाधनों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गई। लेकिन देहरादून से चली रेस्क्यू टीम समय पर नहीं पहुंच सकी।
सवाल ये भी है कि एसडीआरएफ टीम को देहरादून से क्यों आना पड़ा। पौड़ी में इसकी कोई यूनिट क्यों नहीं थी। राज्य में एसडीआरएफ की चार कंपनियों को 31 सब यूनिट में बांटा गया है। दुर्घटना के लिहाज से संवेदनशील और अति संवेदनशील क्षेत्रों में इन सब यूनिट्स की तैनाती की गई है। दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में तैनात इस फोर्स के पास अब भी पूरे संसाधन नहीं है। इसलिये जब कोई आपात स्थिति आती है, तो रेस्क्यू में बाधा पड़ती है। हालांकि एसडीआरएफ टीमें राज्य में कई बार संकट मोचक बन चुकी हैं।

यही नहीं अस्पताल पहुंचे घायलों को भी सही इलाज नहीं मिल सका। हादसे में तीन लोगों को खोने वाले परिवार के एक परिजन ने कहा कि अस्पतालों में मरीजों को ऑक्सीजन तक नहीं मिल सका। हम बदहवाश भटकते रहे। मरीज दूसरे अस्पताल रेफर किये जाते रहे।

हादसों का राज्य

सड़क हादसे उत्तराखंड के लिए किसी आपदा की तरह ही हैं। राज्य बनने के बाद से अब तक सड़क हादसों में करीब 15 हजार लोगों की मौत हो चुकी है। बीते 17 वर्षों में कुल 843 सड़क हादसे दर्ज किए गए हैं। इनमें से ज्यादातर की वजह ओवरलोडिंग या बसों की फिटनेस न होना है। इससे पहले अप्रैल 2016 में देहरादून के त्यूणी बस हादसे में 44 लोगों की मौत हुई थी। त्यूणी हादसे के बाद उत्तराखंड पुलिस ने 2001 से लेकर दिसंबर 2017 तक की फाइलें खोलीं तो पता चला कि 15 हजार लोग सड़क हादसों में मारे गए हैं। राज्य में एक महीने में औसतन चार बसें किसी न किसी रूप में हादसे की शिकार होती हैं।
एसडीआरएफ की हक़ीकत
राज्य आपदा राहत बल यानी एसडीआरएफ की राज्य में अहम भूमिका है। चारधाम यात्रा हो, जंगल में आग लगी हो, कोई सड़क हादसा हुआ हो, नदी में कोई डूब गया हो, हर तरह के मुश्किल हालात में सबसे पहले एसडीआरएफ के जवान राहत-बचाव कार्य में जुटते हैं। पौड़ी में हादसा हुआ तो देहरादून से एसडीआरएफ की टीम रवाना की गई। उन्हें घटनास्थल तक पहुंचने के कई घंटे लग गए। आखिर बड़े ब्लॉकों में एसडीआरएफ के जवान क्यों तैनात नहीं हैं।
हकीकत ये है कि एसडीआरएफ में पर्याप्त संख्या कर्मचारी मौजूद नहीं है। इस दल को अब भी तीन नई कंपनियों का इंतज़ार है। जिसके लिए सरकार से स्वीकृति भी मिल चुकी है। लेकिन शासन स्तर पर कार्रवाई नहीं हो रही। यहां तक कि एसडीआरएफ में एक नियमित कमांडेंट के पद को भी मंजूरी नहीं मिल पायी है।
वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के बाद राज्य में एसडीआरएफ के गठन का निर्णय लिया गया था। उस समय दो बटालियन बनाए जाने की बात थी। लेकिन वित्तीय अड़चनों के चलते मात्र एक बटालियन पर सहमति बनी। इस बटालियन में भी सात कंपनियां बनाने का फैसला लिया गया था। लेकिन दो कंपनियों से एसडीआरएफ की शुरुआत हुई। जो अब बढ़कर चार हो गई है। इन चार कंपनियों में 447 अधिकारी-कर्मचारी हैं जो राज्य के 30 संवेदनशील स्थानों पर तैनात किये गये हैं। तीन कंपनियों के गठन को शासन से स्वीकृति नहीं मिल पा रही। किसी भी आपदा जैसे हालात से निपटने में अहम भूमिका निभानेवाली एसडीआरएफ की ये स्थिति है। इसीलिए पौड़ी जैसे बस हादसे और बड़े हो जाते हैं।
हादसे के बाद हरकत में हर कोई….
हाईकोर्ट सख्त, कई आदेश दिए
धुमाकोट हादसे के बाद नैनीताल हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को एक महीने के अंदर प्रदेश की सभी सड़कों का रोड सेफ्टी ऑडिट कराने और इसके आधार पर सुधार कराने का आदेश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने परिवहन सचिव को सभी वाहनों में तीन माह में स्पीड गवर्नर लगाने तथा सरकारी बसों में छह माह में जीपीएस लगाने को कहा गया है। तीन माह में प्रदेश के चिह्नित खतरनाक स्थानों पर क्रश बैरियर, पैरापिट आदि लगाने, 73 प्रवर्तन दल गठित करने और शराब, परमिट, ओवरलोड आदि की धाराओं के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई करने के भी आदेश दिए गए हैं।
राज्य सरकार ने भी लिया एक्शन
धुमाकोट बस हादसे के बाद सरकार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए गढ़वाल मंडल के कमिश्नर और डीआईजी दोनों को हटा दिया। जबकि एआरटीओ (रामनगर) विमल पांडे और धुमाकोट के थानेदार लक्ष्मण सिंह कठैत को सस्पेंड कर दिया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने लोक निर्माण विभाग के अफसरों को राज्य की सड़कों की मरम्मत के भी निर्देश भी दिए हैं। उन्होंने भारी बारिश व मानसून के मद्देनजर प्रदेश में विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में प्रत्येक तीन किलोमीटर पर एक जेसीबी की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा है।
पुलिस का ओवरलोडिंग के खिलाफ अभियान
पौड़ी हादसे के बाद उत्तराखंड पुलिस भी ओवरलोडिंग को लेकर हरकत में आई। क्षमता से अधिक सवारी या माल ढोने वाले वाहनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए विशेष अभियान शुरू किया गया है।11 जुलाई से उत्तराखंड पुलिस 15 दिन का एक विशेष अभियन चला रही है, जिसके तहत ओवरलोडिंग या क्षमता से अधिक सवारी लेने वाले वाहनों और वाहन चालकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। राज्य के अपर पुलिस महानिदेशक (अपराध एवं कानून व्यवस्था) अशोक कुमार ने माना है कि राज्य में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के मुख्य कारणों में से एक ओवरलोडिंग है।

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