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15 साल बाद कारगिल युद्ध का सबक

Kargil War Memorial, Drassकारगिल एक ऐसी लड़ाई ऐसी थी जिसमें भारत को पता ही नहीं चला कि दुश्मन कब सिर पर आ बैठा। लेकिन आज 15 साल बाद कहानी बिल्कुल अलग है। लाईन ऑफ कंट्रोल पर भारतीय सेना की तैयारियों का जायजा लेने के लिए इंडिया टीवी ग्राउंड जीरो पहुंचा। मैं अपने कैमरामैन नासिर खान के साथ लेह से नेशनल हाइवे नंबर 1 से होते हुए कारगिल और द्रास पहुंचा। हमनें एक हफ्ता द्रास, बटालिक और कारगिल में सेना के जवानों के साथ गुजारा। कारगिल युद्ध के बाद पिछले 15 सालों में तीसरी बार कारगिल जाने पर मुझे इस बात का आभास हुआ कि हमारी सेना के जवानों और युवा अधिकारियों के जोश में कोई कमी नहीं है। इसी जोश ने कारगिल में जीत दिलाई थी। आज सरहद पर सेना ने रक्षा तैयारी कई गुना बढ़ाई है लेकिन इन सबके बीच चिंता की बात ये है कि आला अधिकारी जमीनी हकीकत से दूर प्रोटोकॉल और सेल्फ प्रमोशन की ज्यादा फिक्र करते हैं।

पहली अहम बात कारगिल युद्ध से सबक लेते हुए पिछले 15 सालों में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से लगने वाली लाईन ऑफ कंट्रोल पर अपनी तैयारियों को कई गुना बढ़ा दिया है। सरहद पर सबसे खास तैयारी के रूप में सेना ने दुश्मन से मुकाबले के लिए आधुनिक सुरंग बनाई ली हैं। इन खास सुरंगों में जवान हर मौसम में दुश्मन के हर तरह के हमले को नाकाम कर उसको माकूल जवाब दे सकता है। दूसरी अहम बात कारगिल युद्ध दौरान भारतीय सेना को सबसे ज्यादा नुकसान पहाड़ की ऊँची छोटी पर बैठे दुश्मन के हमले से उठाना पड़ा था ऐसे में अब सेना ने ज्यादातर ऊँची चोटियों तक पहुँचने के लिए रास्ते और सड़क बना ली हैं। टाइगर हिल, तोलोलिंग जैसी ऊँची चोटियों पर सेना ने दर्जनों मजबूत पोस्ट कायम कर ली हैं। तीसरी अहम बात लेह से लेकर द्रास कारगिल तक तैनात हर जवान को कारगिल बैटल स्कूल में ऊँचे पहाड़ों पर लड़ाई की खास ट्रेनिंग दी जा रही है। द्रास ब्रिगेड के कManjeet Negi with soldier in Kargilमांडर ब्रिगेडियर जी पी सिंह ने कारगिल युद्ध के बाद पिछले 15 सालों में सरहद पर सेना की तैयारियों के बारे में हमें बताया।

हम सबसे पहले पाकिस्तान से लगने वाली सबसे नजदीक की पोस्ट 43 पहुंचे। पोस्ट 43 के लिए हमनें अपना सफर कारगिल के हरका बहादुर पल से शुरू किया। कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना ने यहां से भारतीय सेना पर काफी गोलाबारी की और सबसे खास बात ऊँचे पहाड़ों पर बैठे घुसपैठिये नेशनल हाइवे नंबर 1 को बाधित करने की कोशिश करते रहे। भारत की पोस्ट 43 से पाकिस्तानी पोस्ट की दूरी मात्र 15 मीटर से लेकर 50 मीटर तक है। ये वही पोस्ट है जहां भारतीय सेना के शहीद लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया का शव भारतीय सेना को सौंपा था। सौरभ कालिया पाकिस्तानी सेना से लोहा लेने वाले पहले शहीद थे।

आज पोस्ट 43 में सेना ने अपनी तैयारियां कई गुना बढ़ा दी हैं। दुश्मन से मुकाबले के लिए 600 मीटर ज्यादा लम्बी सुरंग बनाई गयी है। इस खास सुरंग में जवान के रहने के लिए बंकर बनाये गए हैं। इसके साथ ही जवान के हथियार की तैनाती के लिए भी खास जगह बनाई गयी हैं। पोस्ट 43 के सामने पाकिस्तान की सबसे नजदीकी पोस्ट झंडा पोस्ट है। जब हम पाकिस्तानी पोस्ट की तस्वीरें अपने कैमरे में कैद कर रहे थे तो पाकिस्तानी सैनिकों को ये नागवार गुजरा और उन्होंने हमें लाल झंडा दिखाया। पोस्ट 43 के आसपास की सभी पोस्ट पर भारतीय सैनिक पूरी तरह से मुस्तैद हैं। सेना की इस तैयारी को देखकर कहा जा सकता है की पाकिस्तान के लिए कारगिल को दोहराना आसान नहीं है।

सेना की तैयारियों का जायManjeet Negi in Kargilजा लेने के लिए हमारा अगला पड़ाव मास्कोह घाटी था। कारगिल युद्ध के दौरान सामरिक महत्व से अहम मास्कोह घाटी को पाकिस्तानी सैनिकों से मुक्त करवाना आवश्यक था। मस्कोह घाटी को कब्जा करने के मकसद से चोटी 4875 जीतनी अहम थी। विक्रम बतरा ने पाकिस्तानी सैनिकों ने लोहा लेते हुए इस पीक को खाली कराया मगर इस जंग में विक्रम बतरा शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र दिया गया गया। आज हालात बदले हुए हैं द्रास से मास्कोह में मौजुद आखिरी गाँव तक पहुँचने के लिए सड़क बन चुकी है। रास्ते में जगह-जगह पर सेना के कैम्प मौजूद हैं। कारगिल युद्ध के दौरान सेना की मदद करने वाले यार मोहम्मद खान ने हमें कारगिल युद्ध से लेकर अब तक कहानी से रूबरू कराया।

कारगिल युद्ध का सबसे अहम सबक सीखते हुए सेना ने द्रास की ऊँची चोटियों के बीच एक ऐसा ट्रेनिंग स्कूल खोला जहां जवान के सामने गलती की कोई गुंजाइश नहीं है। कारगिल बैटल स्कूल में जवानों को ऊँचे पहाड़ों पर दुश्मन से मुकाबले के खास गुर सिखाये जा रहे हैं। कारगिल युद्ध के दौरान द्रास और बटालिक की ऊँची चोटियों पर बैठकर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने भारतीय सेना को भारी नुकसान पहुंचाया था। कारगिल बैटल स्कूल के मेजर एस जे मैथ्यू ने हमें बताया कि यहां तैनात हर जवान के लिए ये ट्रेनिंग जरुरी है।

कारगिल की लड़ाई में बोफोर्स तोप एक ऐसा ब्रह्मास्त्र साबित हुआ जिसने गेम चेंजर का काम किया। अब हम आपको बोफोर्स की मारक क्षमता से रूबरू कराते हैं। बोफोर्सManjeet Negi, adventure अब इन ऊँचे पहाड़ों पर सेना की मुख्य ताकत बन चुकी है। बोफोर्स की 40 किलोमीटर की मारक को देखते हुए दुश्मन इसके आसपास भी नहीं फटक सकता। 15 साल पहले बोफोर्स तोप को रात के वक्त दुश्मन से छुपाकर लाया गया था लेकिन आज ये तोप द्रास-कारगिल की हर पहाड़ी से परिचित हो गयी है।

इन सब के बीच द्रास में तोलोलिंग पहाड़ी के नीचे बने कारगिल युद्ध स्मारक पर हर साल की तरह शहीदों को याद किया जा रहा है। युद्ध में शहीद 562 सैनिकों की याद में कारगिल वार मेमोरियल में 562 लैम्प जलाये गए हैं। सेना के बैंड शहीदों की याद में खास धुन बजा रहे हैं। भारत ने इस ऑपरेशन विजय का जिम्मा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से करीब दो लाख सैनिकों को सौंपा था। जंग के मुख्य क्षेत्र कारगिल-द्रास सेक्टर में करीब तीस हजार सैनिक मौजूद थे। इस युद्ध के बाद पाकिस्तान के 600 से ज्यादा सैनिक मारे गए और जबकि 1500 से अधिक घायल हुए। भारतीय सेना के 562 जवान शहीद हुए और 1363 अन्य घायल हुए। विश्व के इतिहास में कारगिल युद्ध दुनिया के सबसे ऊंचे क्षेत्रों में लड़ी गई जंग की घटनाओं में शामिल है। दो महीने से ज्यादा चले इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को मार भगाया था। आखिरकार 26 जुलाई को आखिरी चोटी पर भी जीत मिली और ये दिन कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

– मनजीत नेगी, विशेष रक्षा संवाददाता, इंडिया टीवी

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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