1962 में भारत-चीन के बीच हुई जंग को 50 साल पूरे हो रहे हैं। 20 अक्तूबर को शुरू हुई ये जंग 21 नवम्बर 1962 को खत्म हुई। लड़ाई में भले ही भारत को हार का सामना करना पड़ा हो लेकिन इस लड़ाई में भारतीय सेना
1962 में भारत-चीन के बीच हुई जंग को 50 साल पूरे हो रहे हैं। 20 अक्तूबर को शुरू हुई ये जंग 21 नवम्बर 1962 को खत्म हुई। लड़ाई में भले ही भारत को हार का सामना करना पड़ा हो लेकिन इस लड़ाई में भारतीय सेना के जवानों ने वीरता की नयी कहानी लिखी। 1962 की लड़ाई दो मोर्चो पर लड़ी गयी, पहला लेह और दूसरा देश की उत्तर-पूर्वी सीमा अरुणाचल। इस लड़ाई में देवभूमि उत्तराखंड के सैकड़ों वीरों ने अपनी जान की बाजी लगाई।
अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में स्थित है नूरानांग की पहाड़ियां जो तेजपुर से तवांग रोड पर लगभग 425 किलोमीटर दूरी पर है। तवांग के उत्तर में चीन है और पश्चिम में भूटान। यह सन् 1962 की बात है, जब चीन ने विस्तारवादी सोच के तहत पंचशील समझौते को धता बताते हुए भारत पर आक्रमण कर दिया था। लगभग 14,000 फीट ऊँचाई पर स्थित सीमान्त क्षेत्र की नूरानांग पहाड़ी व आसपास के इलाके का सुरक्षा का दायित्व तब गढ़वाल रेजिमेंट की चैथी बटालियन पर था। यहाँ तक पहुँचने के लिए टवांग चू नदी को पार करना होता है।
हम आपको 1962 के एक ऐसे ही एक जिन्दा शहीद हवलदार गोपाल सिंह गुसांई से रूबरू कराते हैं। पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हवलदार गोपाल सिंह गुसांई के मुताबिक हाड़ कंपा देने वाली इस ठण्ड में भी चीनी सेना 17 नवम्बर 1962 को सुबह छः बजे से ही छः से अधिक बार हमला कर चुकी थी।
लैंस नायक गोपाल सिंह गुसाईं, त्रिलोक सिंह और रायफ
लमैन जसवंत सिंह रावत तीनों जवान शत्रुओं से मोर्चा लेने के लिए आगे बढे किन्तु चीनी सैनिक एक मरता तो दूसरा उसकी जगह आ कर ले लेता और फिर उनकी ओर से निरन्तर हमला जारी रहा। जिसके परिणाम स्वरुप हमारे जवान एक एक कर देश के काम आते रहे। पीछे से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिल पा रही थी। लड़ते-लड़ते लैंस नायक त्रिलोक सिंह शहीद हो गए। लैंस नायक गोपाल सिंह गुसाईं के हाथ में कई गोलियां लग गयी।
अब अकेले रायफलमैन जसवंत सिंह रावत ने मोर्चा सम्भाल लिया। वहां पर पांच बंकरों पर मशीनगन लगायी गयी थी और रायफलमैन जसवंत सिंह छिप छिपकर और कभी पेट के बल लेटकर दौड़ लगाता रहा और कभी एक बंकर से तो कभी दूसरे से और तुरन्त तीसरे से और फिर चैथे से, अलग अलग बंकरों से शत्रुओं पर गोले बरसाता रहा। पूरा मोर्चा सैकड़ों चीनी सैनिकों से घिरा हुआ था और उनको आगे बढ़ने से रोक रहा था तो जसवंत सिंह का हौसला, चतुराई भरी फुर्ती, चीनी सेना यही समझती रही कि हिंदुस्तान के अभी कई सैनिक मिल कर आग बरसा रहे हैं। जबकि हकीकत कुछ और थी, इधर जसवंत सिंह को लग गया था कि अब मौत निश्चित है अतः प्राण रहते तक माँ भारती और तिरंगे की आन बचाए रखनी है। जितना भी एमुनिशन उपलब्ध था, समाप्त होने तक चीनियों को आगे नहीं बढ़ने देना है। रणबांकुरा बिना थके, भूखे-प्यासे पूरे 72 घंटे (तीन दिन तीन रात) तक चीनी सेनाओं की नाक में दम किये रहा।
लैंस नायक गोपाल सिंह गुसाईं 3 महीनों तक चीन की कैद में रहे। जसवंत सिंह रावत को मरणोपरांत महावीर चक्र और लैंस नायक गोपाल सिंह गुसाईं को वीर चक्र से सम्मानित किया गया। नूरानांग की पहाड़ियों पर जो लड़ाई हुयी उसमें कुल 162 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, 264 कैद कर लिए गए और 256 जवान मौसम की मार से या अन्य कारणों से तितर-बितर हो गए लेकिन भारतीय सेना के वीरों ने इतिहास में अपना नाम सदा के लिए अमर कर लिया।
लेफ्टिनेंट जनरल (रि) शेरू थपलियाल जानेमाने रक्षा जानकार हैं।







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