ग्रामीणों के अनुसार यह समस्या लयेड़सैंण उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के बंद हो जाने के बाद से और गंभीर हो गई है। करीब पांच वर्ष पहले विद्यालय बंद होने के कारण आसपास के गांवों के छात्र-छात्राओं को दूरस्थ विद्यालयों में पढ़ाई के लिए जाना पड़ रहा है। इसका सबसे अधिक असर बालिकाओं पर पड़ा है, जिन्हें हर दिन कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।
कांग्रेस नेता रघुबीर बिष्ट ने क्षेत्र भ्रमण के दौरान इस समस्या को गंभीर बताते हुए कहा कि सरकार और क्षेत्रीय विधायक की उदासीनता के कारण लयेड़सैंण विद्यालय बंद हुआ। उन्होंने कहा कि यदि विद्यालय को समय रहते संचालित रखा जाता तो बच्चों को इतनी कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता। उनका कहना है कि पैनल गांव और आसपास के क्षेत्रों के बच्चों को अब अपनी जान जोखिम में डालकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ रही है।
ग्रामीण बताते हैं कि छात्र-छात्राएं रोज सुबह जल्दी घर से निकलते हैं और करीब तीन घंटे पैदल चलकर विद्यालय पहुंचते हैं। वापसी में भी उन्हें उतनी ही दूरी तय करनी पड़ती है। बरसात और सर्दियों के मौसम में यह रास्ता और भी खतरनाक हो जाता है। कई स्थानों पर रास्ते फिसलन भरे हैं, जबकि जंगलों में जंगली जानवरों का भी डर बना रहता है। इसके बावजूद बच्चों का पढ़ाई के प्रति उत्साह कम नहीं हुआ है।
ग्रामीण चंद्रमोहन जदली ने बताया कि पैनल गांव की छह बालिकाएं और कुछ बालक प्रतिदिन इसी कठिन रास्ते से होकर विद्यालय जाते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के हौसले को देखकर गर्व होता है, लेकिन यह स्थिति बेहद चिंताजनक भी है। शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधा के लिए बच्चों को इतना संघर्ष करना पड़े, यह सरकार और प्रशासन के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि लयेड़सैंण विद्यालय को शीघ्र दोबारा शुरू किया जाए ताकि बच्चों को राहत मिल सके। उनका कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो क्षेत्र में बड़ा आंदोलन किया जाएगा।
पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था की यह तस्वीर बताती है कि आज भी कई गांव बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। बावजूद इसके, पैनल गांव की बेटियां अपने सपनों को पाने के लिए हर दिन पहाड़ जैसी कठिनाइयों को पार कर रही हैं। उनका यह संघर्ष केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की उम्मीद का भी प्रतीक बन गया है।

