अलकनंदा नदी उत्तराखंड की जीवनरेखा मानी जाती है और इसकी जैव-विविधता को संरक्षित रखना पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत आवश्यक है। बीते कुछ वर्षों में प्रदूषण, बांध परियोजनाओं, प्राकृतिक आवासों में बदलाव और अनियंत्रित दोहन के कारण कई जलीय प्रजातियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए नमामि गंगे परियोजना के तहत महाशीर जैसी महत्वपूर्ण मछली प्रजाति के संरक्षण और संवर्धन के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
कार्यक्रम में जंतु विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मंजू प्रकाश गुसाईं, डीएसडब्ल्यू प्रोफेसर ओ.पी. गुसाईं, यूनिवर्सिटी फिश हैचरी के समन्वयक प्रोफेसर दीपक सिंह, मत्स्य विभाग टिहरी गढ़वाल के पुष्कर सिंह नयाल और संजय सिंह सहित कई विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक मौजूद रहे। सभी ने इस पहल को नदी संरक्षण और मत्स्य संसाधनों के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया।
इस अवसर पर प्रोफेसर दीपक सिंह ने कहा कि महाशीर उत्तराखंड की राज्य मछली है और इसे प्रदेश की नदियों की पहचान माना जाता है। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ दशकों में इसकी संख्या में लगातार गिरावट देखी गई है, जो चिंता का विषय है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) द्वारा महाशीर को संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और संस्थागत स्तर पर निरंतर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में अलकनंदा हाइड्रोपावर कंपनी के सहयोग से महाशीर संरक्षण के लिए एक आधुनिक फिश हैचरी विकसित की गई है। यहां वैज्ञानिक पद्धति से महाशीर का प्रजनन और संवर्धन किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त टिहरी गढ़वाल स्थित मत्स्य विभाग की हैचरी में भी इस प्रजाति के संरक्षण और संवर्धन का कार्य संचालित किया जा रहा है। इन दोनों हैचरियों को नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत आईसीएआर-सीआईएफआरआई द्वारा आंशिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।
कार्यक्रम में नमामि गंगे परियोजना से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. उपेंद्र सिंह, डॉ. जितेंद्र सिंह राणा और डॉ. रणजीत सिंह ने महाशीर संरक्षण की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि नमामि गंगे अभियान के तहत अब तक गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के विभिन्न हिस्सों में लगभग 40 हजार महाशीर मत्स्य शिशुओं का प्रवाह किया जा चुका है। इसका उद्देश्य नदियों में प्राकृतिक मत्स्य संसाधनों को पुनर्जीवित करना और जैव-विविधता को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम में शोधार्थियों सचिन, राहुल, अजय, आयुष और राकेश सहित स्थानीय मत्स्य पालकों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। प्रतिभागियों ने अलकनंदा नदी को स्वच्छ, समृद्ध और जीवंत बनाए रखने का संकल्प लिया। साथ ही नदी संरक्षण, जल गुणवत्ता सुधार और जलीय जैव-विविधता के महत्व के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने पर भी विशेष बल दिया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी प्रकार वैज्ञानिक प्रयासों, जनसहभागिता और सरकारी योजनाओं का समन्वय बना रहा तो भविष्य में महाशीर जैसी दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण संभव हो सकेगा और अलकनंदा सहित गंगा तंत्र की नदियां पुनः समृद्ध जैव-विविधता से परिपूर्ण हो सकेंगी।




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