नरेंद्र मोदी के बारे में उनके गृहनगर वड़नगर में एक वाकया मशहूर है। मोदी को वड़नगर में मौजूद क्रीर्ति तोरण (द्वार) से खास लगाव है। कहते हैं कि 2001 के गुजरात भूकम्प में मोदी ने अपने बड़े भाई सोमाभाई मोदी से सबसे पहले यही पूछा कि क्रीर्ति तोरण गिरा तो नहीं। उनके घरवालों को आज भी इस बात का मलाल है कि मोदी ने उनका हालचाल नहीं पूछा बल्कि क्रीर्ति तोरण के बारे में पूछा था। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी का ये अलगाव जारी है ये अलगाव घर वालों से भी और दिल्ली के एलीट क्लब से भी। मोदी दिल्ली के इलीट क्लब से दूर रहते हैं। लाल किले की प्राचीर से देश को सम्बोधित करते हुए भी मोदी ने दिल्ली के इलीट क्लब से अपनी दूरियों की बात कही थी। हाल में दिल्ली के विधानसभा चुनाव की हार से ये दूरी और बढ़ गयी हैं। दिल्ली क्लब ने मोदी पर हमले तेज कर दिए हैं। शायद इसीलिए मोदी ने इन हमलों का जवाब संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा में अपने तीखे भाषण में दिया। दिल्ली क्लब में मोदी के दुश्मन सिर्फ बाहर के लोग नहीं हैं बल्कि पार्टी के अंदर के लोग भी शामिल हैं। खासतौर से दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी की करारी हार के बाद मोदी विरोधियों की बांछे खिली हुयी हैं।
गुजरात के मेहसाणा जिले के वड़नगर रेलवे स्टेशन के सामने नरेंद्र मोदी के पिताजी दामोदर मोदी की चाय की दुकान हुआ करती थी। चाय की चुस्कियों के साथ सियासत की बातें होतीं। आर.एस.एस. से जुड़े लोग जब सियासी बातें करते तो नरेंद्र मोदी उसे गौर से सुनते। मोदी ने सियासत का पहला पाठ इसी चाय की दुकान पर सीखा था। चाय की दुकान पर चाय पीने वालों में से एक लक्ष्मणराव इनामदार थे जिसे लोग वकील साहब कहते थे। वकील साहब ही शाखा चलाते थे। वकील साहब ने आठ साल के नरेंद्र भाई को बाल स्वयंसेवक के रुप में शाखा में भर्ती कर लिया। वकील साहब ने नरेंद्र भाई के जिम्मे बच्चों को ट्रेंड करने का काम सौंप दिया। वकील साहब से लेकर केशुभाई पटेल और लाल कृष्ण आडवाणी तक हमेशा मोदी को सही रास्ता बताने वाले लोग उनके साथ थे लेकिन आज मोदी को आगे रास्ता बताने वाला कोई नहीं है। आज मोदी के बनाये रास्ते पर सरकार और पार्टी चल रही है ऐसे में रास्ता आसान नहीं है। मोदी के पीछे चलने वाले या तो चाटुकार हैं या विरोधी। दोनों ही मोदी के लिए मुश्किल खड़े करने वाले हैं। अमित शाह उनके सारथि जरूर हैं लेकिन अमित शाह भी दिल्ली की राजनीति में नए खिलाड़ी हैं और दिल्ली चुनाव का कड़वा स्वाद वे चख चुके हैं।
वड़नगर में नरेंद्र मोदी का पहला घर बहुत ही छोटा था। ईंट और मिट्टी से बना 40 फीट लंबा और 12 फीट चैड़े मकान में पांच भाई और एक छोटी बहन के साथ नरेंद्र मोदी का परिवार रहता था। घर में न टॉयलेट की सुविधा थी और न बाथरुम था। गांव के इसी तालाब में ही नरेंद्र मोदी के घर वाले नहाते थे। इसी तालाब में नरेंद्र मोदी ने तैरना सीखा। धीरे-धीरे गांव के सबसे बढ़िया तैराक बन गए। घर से स्कूल और स्कूल से चाय की दुकान पर आते जाते नरेंद्र मोदी 12 साल के हो गए थे। गांव की जिंदगी और घर की गरीबी ने मोदी को हिम्मतवाला बनाया। इसी हिम्मत से देश की गरीब जनता ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन 12 लाख का सूट पहनकर मोदी ने अपनी उस छवि से बाहर निकलने की कोशिश की या फिर इसे दूसरे तरीके प्रचारित करने की ये दिल्ली के इलीट क्लब की साजिश थी। ऐसी घटनाओं से मोदी को सबक सीखना होगा।
मोदी कितने निडर थे इसका एक दिलचस्प किस्सा है। ये किस्सा वड़नगर के इस तालाब से जुड़ा है। तालाब में मगरमच्छ रहते थे लेकिन गांव वाले इसी तालाब में नहाने आते। तालाब के बीचोंबीच एक मंदिर है जो उस वक्त भी था। मंदिर के ऊपर भगवा झंडा लहराता रहता था। कुछ दिन बाद मंदिर के ऊपर के झंडे को बदलना पड़ता था। एक बार बरसात के मौसम में तालाब लबालब भरा था। मगरमच्छ तालाब के किनारे तक आ गए थे। लेकिन मंदिर का भगवा झंडा भी बदलना था। लोग जब तक कुछ सोचते 12 साल के नरेंद्र भाई मोदी तालाब में भगवा झंडा हाथ में लिए कूद गए। उनके पीछे-पीछे उनके दो दोस्त महेंद्र और बच्चू भी कूद गए। गांव वाले बेहद डरे हुए थे। तालाब के बाहर ड्रम पीटने लगे ताकि मगरमच्छ इनके पास न आए। नरेंद्र मोदी ने मंदिर का झंडा बदल दिया। इससे ज्यादा दिलचप्स किस्सा एक और है। एक दिन दोस्तों के साथ 12 साल के नरेंद्र भाई मोदी तालाब में तैर रहे थे। तभी मगरमच्छ का एक बच्चा दिखा। नरेंद्र ने उसे दबोच लिया। पकड़कर घर लाए। मां हीराबा ने देखा तो अवाक रह गईं। आज की तारीख में मोदी देश के प्रधानमंत्री बन चुके हैं और वे देश और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी छाप छोड़ने के लिए बेचैन नजर आ रहे हैं। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं की और देश के अंदर भी कई ऐसे काम किये जो परंपरा से हटकर थे। फिर चाहे बात सिर पर वसंती पगड़ी पहनकर लाल किले की प्राचीर से देश को सम्बोधित करना हो या अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को बराक कहकर सम्बोधित करना हर बार मोदी ने लीक से हटकर काम किया। भारत जैसे विशाल देश की राजनीति में मोदी का ये साहस कितना कामयाब होगा ये भविष्य बताएगा लेकिन मोदी को बहुत सजग रहने की जरुरत है।
मोदी के बचपन के
दोस्त वड़नगर में डॉक्टरी कर रहे डॉ सुधीर जोशी कहते हैं नरेंद्र भाई स्कूल में भी किसी से नहीं डरते। दोस्त उन्हें एनडी या फिर नरेंद्र भाई कहकर बुलाते। बचपन के दोस्त जसूद खान पठान हैं। जो पहली क्लास से लेकर ग्यारहवीं क्लास तक नरेंद्र मोदी के साथ पढ़े। एक साथ बैठते। एक साथ स्कूल जाते। वड़नगर के भागवताचार्य नारायाणाचार्य हाई स्कूल में जिसे बी एन हाईस्कूल कहा जाता है। इसी स्कूल में नरेंद्र मोदी दसवीं कक्षा तक पढ़े। बचपन के दोस्त हरीश पटेल कहते हैं कि नरेंद्र भाई अंग्रेजी और सामाजिक विज्ञान में बहुत अच्छे थे। स्कूल में होने वाले नाटकों में मोदी को मंत्री का रोल करना सबसे अच्छा लगता था। आज मोदी मंत्री से प्रधानमंत्री बन चुके हैं और सारे देश की नजरें उन पर टिकी हुयी हैं ऐसे में मोदी का हर एक कदम पर सब की नजर है।
साधु संतों के साथ रहना नरेंद्र मोदी को बचपन से अच्छा लगता था। ये देखकर मां को डर लगता था। नवरात्रि में एक साधु नरेंद्र मोदी के घर आए। भिक्षा देने के बाद मां हीराबा ने अपने दो बच्चों सोम भाई और नरेंद्र भाई की कुंडली साधु महाराज को दिखाईं। उस साधु ने कहा- सोम भाई का जीवन सामान्य रहेगा। लेकिन नरेंद्र भाई अगर राजनीति में गए तो सियासत का बादशाह बनेगें और अगर साधु बन गए तो फिर शंकराचार्य की कुर्सी ले लेंगे। साधु की बात सत्य साबित हो गयी है मोदी आज राजनीति के शिखर पर है। उनके साथ काम कर चुके हरिद्वार के एक शंकराचार्य कहते हैं कि जब रावण अपने सिंहासन पर विराजमान होता था तो सातों ग्रह उसके पैरों के नीचे बिछे रहते थे। आज मोदी भी उसी तर्ज पर सिंहासन पर विराजमान हैं और ग्रह-नक्षत्र सब उनके सामने नतमस्तक हैं। ऐसे अनुकूल समय का मोदी कितना फायदा उठा पाते हैं ये एक बड़ा सवाल है।
अहमदाबाद में चाचा बाबूभाई स्टेट ट्रांसपोर्ट दफ्तर में कैंटीन चलाते थे। नरेंद्र मोदी कैंटीन में काम करने लगे। खाली वक्त में आध्यात्मिक और राजनीति पर चर्चा करते। आर.एस.एस. के पक्के स्वयंसेवक बन चुके थे। अहमदाबाद में भी शाखा में नरेंद्र रोज जाते। नरेंद्र मोदी 21 साल के हो चुके थे। 1971 का साल था। पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान में जंग छिड़ी थी। भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश को मदद कर रही थी। सैनिक जब अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से होकर जाते नरेंद्र भाई उनकी मदद करने में जुट जाते। इसी दौरान वकील साहब से दोबारा मिले। संघ से जुड़कर काम करने की इच्छा जताई। नरेंद्र भाई ने उसी दिन चाचा का घर छोड़ दिया। तय कर लिया शादी नहीं करेंगे। सारी जिंदगी संघ के नाम कर दी। मोदी अहमदाबाद के हेडगेवार भवन में रहने लगे। सुबह सुबह तीन बजे बिस्तर छोड़ देते। सबको जगाते, सबके लिए चाय बनाते, खाना बनाते और बर्तन धोते। वकील साहब को गुरु मान चुके थे। मना करने के बावजूद उनके कपड़े साफ करते। सब काम खुद करने की मोदी की ये जिद आज तक कायम है लेकिन शायद आज प्रधानमंत्री के तौर पर ये तरीका ठीक न हो। इसीलिए विपक्षी आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार में हर फाइल खुद देखते हैं बाकी मंत्रियों के पास कोई काम नहीं है।
25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक की यात्रा शुरू की थी। आडवाणी की इस रथ के पहले सारथी मोदी बने। नरेंद्र मोदी के पास अपना आइडिया था और वो थे मंच के जादूगर थे। सोमनाथ से मुंबई तक मोदी आडवाणी के साथ रहे। इसी यात्रा के दौरान मोदी आडवाणी के बहुत करीब आए। मोदी का कद बढ़ा, उनका भाषण लोगों की जुबान पर चढ़ा। मीडिया ने मोदी के बारे में लिखना शुरू किया। मोदी मशहूर हुए तो गुजरात बीजेपी के दो बड़े नेता केशुभाई पटेल और शंकर सिंह वाघेला जल-भुन गए। गुजरात में इन दोनों ने मोदी को रोकने की बहुत कोशिश की। मोदी दिल्ली आ रहे थे तो गुरु आडवाणी ही उनकी राह का रोड़ा बन गए लेकिन मोदी को रोकना इनके बस की बात नहीं थी। आज की सबसे बड़ी हकीकत यही है कि मोदी लगातार अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रहे हैं। लेकिन जब आप अकेले बहुत तेज दौड़ रहे होते हैं तो शायद ज्यादा सजग रहना पड़ता है क्योंकि आप अपनी ही वजह से धड़ाम से गिर भी सकते हैं।
मनजीत नेगी – लेखक ने विधान सभा और लोकसभा चुनाव के दौरान गुजरात में रहकर नरेंद्र मोदी के जीवन पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनायी।


Leave a comment