Home अतुल्य उत्तराखंड ‘काफल पाक्यो – मैं नि चाक्यो’
अतुल्य उत्तराखंडदेहरादून

‘काफल पाक्यो – मैं नि चाक्यो’

‘काफल पाक्यो मैं नि चाक्यो’ यह सिर्फ एक कहावत नही बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ो में पाये जाने वाले फल ‘काफल’ (जो कि बहुत स्वादिष्ट और रसीला होता है) जुड़ी हुई लोकगाथा है। यह फल चैत के महीने पाया जाने वाला फल है। जो कि उत्तराखंड के ऊपरी और ठंडे इलाकों में पाया जाता है।

‘काफल पाक्यो मैं नि चाक्यो’ यह सिर्फ एक कहावत नही बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ो में पाये जाने वाले फल ‘काफल’ (जो कि बहुत स्वादिष्ट और रसीला होता है) जुड़ी हुई लोकगाथा है। यह फल चैत के महीने पाया जाने वाला फल है। जो कि उत्तराखंड के ऊपरी और ठंडे इलाकों में पाया जाता है।

उत्तराखंड यानी देवताओं की भूमि देवभूमि। यहां के पहाड़, संस्कृति, परिधान सभी को बहुत लुभाते है। साथ ही यहां की लोकगाथाओं को सुनना और जानना तो सभी पसन्द करते है। उन्ही लोकगाथाओं में से एक है ‘काफल पाक्यो’ की।

काफल उत्तराखंड के पहाड़ों का चटक लाल रंगी रसीला फल है। यह फल चैत के महीने में होता है। इस फल को जो एक बार खाले वो उसका मुरीद हो जाये। यह फल पहाडियों का रोजगार भी है। जितना रसीला यह फल है उससे कई ज्यादा मार्मिक इसके पीछे छुपी एक कहानी है।

अक्सर जब यह फल पकना शुरू होता है। तो जंगलो में एक चिड़िया की आवाज सुनाई देती है। जो कहती है ‘काफल पाक्यो मैं नि चाक्यो’ (काफल पक गए है लेकिन मैंने नही चखे हैं) लोकगाथाओं के अनुसार एक मां चिलचिलाती धुप में पसीना बहने के बाद जंगल से एक टोकरी में काफल लाती हैं। घर पर उसकी बेटी भूखी होती है, लेकिन मां उसे समझाते हुए कहती हैं की बेटी इसे अभी नहीं अगले दिन खायेंगे।

जब मां अगले दिन अपने काम से वापस घर पर आती है तो देखती हैं की टोकरी में काफल कम हैं। उसे शक होता हैं की बेटी को मना करने बावजूद भी उसने बिना पूछे खा लिया। बिना कुछ देखे वह बेटी को पीटना शुरू कर देती हैं और भूखी बेटी बार बार यही कहती हैं की मां मैंने नहीं खाये। वह अपनी मां से कहती रहती है कि काफल पाक्यो में नी चाक्यो। लेकिन मां उसकी बात नही सुनती।

मार सहन ना होने पर आखिर में छोटी सी लड़की दम तोड़ देती है। बाद में जब मां आंगन में बैठे काम कर रही होती है तब उसे अहसास होता है कि काफल धूप की वजह से सूखे हुए थे। इसलिए कम नजर आ रहे थे। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उसके पास पछतावे के सिवाय कुछ नही बचता विरह में वह भी ‘पूत पोताई पूरे’ अर्थात् पूरे हे बेटी पूरे है। यह कहते हुए दम तोड़ देती है।

मां बेटी की इस कहानी के बाद तब से लेकर अब तक चैत के महीने काफल पकने के समय हमेशा एक चिड़िया ‘काफल पाक्यो मैं नि चाक्यो’ कहती हुई सुनाई देती है। कहते है वह चिड़िया वो ही बेटी है जो कि मरने के बाद आज भी पहाड़ों में बसती है। वह सिर्फ काफल पकने के समय ही सुनाई देती है और गौरतलब है कि वह काफल का एक दाना भी नही चखती।

इस कहानी से यह भी सीख मिलती है कि जल्दबाजी में कभी कोई फैसले नहीं लेने चाहिए। अन्यथा पछतावे के अलावा कुछ नहीं बचता।

Written by
Hill Mail

हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े। हिल-मेल प्रयत्न कर रहा है कि हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं की जानकारी जल्दी से जल्दी लोगों को मिलती रहे।

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

HillMail Magazine – September 2026

HillMail Sep 2026
पत्रिकाओं के सभी अंक देखें

Related Articles

भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए रामशरण नौटियाल, जुबिन नौटियाल के पिता हैं पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष

उत्तराखंड की राजनीति में सोमवार को एक अहम घटनाक्रम सामने आया। देहरादून...

उत्तराखंड में अगले चार महीने में 2000 पदों पर भर्ती की तैयारी, UKSSSC का परीक्षा कैलेंडर जारी

उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए महत्वपूर्ण...

देहरादून में जलेगा 181 फीट ऊंचा रावण, दशहरा आयोजन में बदलेगा एंट्री रूट; रिमोट से होगा दहन

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में इस बार दशहरा पर्व भव्य अंदाज में...