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नये राज्यों पर छाया रहा राजनीतिक अस्थिरता का साया

– जयसिंह रावत

नवम्बर के महीने में देश के 9 नये राज्यों का गठन हुआ है, इसलिये इसे नये राज्यों का महीना या जन्मदाता भी कहा जाता है। इसी महीने देश के तीन राज्य छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड का निर्माण भी हुआ था। हालांकि 29वां राज्य तेलंगाना नवीनतम् राज्य है, लेकिन उसका जन्म 14 साल बाद 2 जून को हुआ था। जहां तक सवाल प्रगति का है तो झारखंड की कुछ धीमी प्रगति के बावजूद ये चारों राज्य नेट स्टेट ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (एनएसडीपी) के मामले में अपने मूल राज्यों से आगे हैं। जो साबित करता है कि इन नये राज्यों की मांग न केवल क्षेत्रीय पहचान के लिये बल्कि विकास के मामले में भी जायज थी। लेकिन इनमें से दो राज्यों में राजनीतिक सिद्धान्तों के अवसरवाद के आगे गौण हो जाने के कारण राजनीतिक अस्थिरता की समस्या इनके जन्म से ही बनी रही। हालत यहां तक आये कि झारखंड में एक बार सिब्बू सोरेन 15 दिन के लिये मुख्यमंत्री रहे जबकि उत्तराखंड में हरीश रावत को एक बार केवल एक दिन के लिये कुर्सी मिली।

उत्तराखंड और झारखंड के भाग्य में नहीं थी स्थिरता

किसी भी प्रदेश या देश की प्रगति के लिये अन्य अनुकूल परिस्थितियों के साथ ही राजनीतिक स्थिरता भी एक आवश्यक शर्त है। क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व के विजन से ही जनता की अभिलाषाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप भविष्य की रूपरेखा तय होती है। नवम्बर में जन्में छत्तीसगढ़ में तो राजनीतिक स्थिरता बनी रही। वहां अंतरिम मुख्यमंत्री अजीत जोगी को ही काम करने के लिये 3 साल 34 दिन और फिर उनके बाद रमन सिंह को पूरे 15 साल काम करने को मिले। वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आन्तरिक चुनौती के बावजूद मजबूती से काम कर रहे हैं। लेकिन झारखंड और उत्तराखंड को राजनीतिक स्थिरता कभी रास नहीं आयी।

झारखंड ने 22 साल में 11 मुख्यमंत्री देख लिये

नवम्बर के महीने की 15 तारीख को जन्मे झारखंड में शिब्बू सोरेन तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, मगर तीनों बार उन्होंने कार्यकाल पूरा नहीं किया। सन् 2005 में वह 2 मार्च से लेकर 12 मार्च तक ही 10 दिन के लिये मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिक सके। वह तीनों कार्यकाल मिला कर भी एक साल से कम 308 दिन मुख्यमंत्री रहे। वहां रघुबर दास (2014 से 2019 तक) के अलावा कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। वहां औसतन एक मुख्यमंत्री का कार्यकाल औसतन लगभग 1 साल 309 दिन रहा। वर्तमान मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन 2 साल पूरे करने के बाद भी काफी आगे बढ़ गये हैं।

इनके अलावा बाबूलाल मरांडी को 15 नवम्बर 2000 से लेकर 18 मार्च 2003 तक कुल 2 साल 123 दिन का कार्यकाल मिला। उनके बाद अर्जुन मुंडा को एक बार में (11 सतिम्बर 2010 से लेकर 18 जनवरी 2013) अधिकतम् 2 साल 129 दिन का समय मिला। राजनीतिक अस्थिरता का पूरा लाभ निर्दलीय मधुकोड़ा ने उठाया जो कि मात्र अपने एक वोट के सहारे मुख्यमंत्री बन गये। उन्होंने 1 साल 343 दिन कर बादशाहत में झारखंड का पूरा दोहन किया और जेल भी जाना पड़ा। इस तरह देखा जाय तो झारखंड ने 22 सालों 11 वीं बार मुख्यमंत्री देख लिये।

झारखंड से भी बुरा हाल उत्तराखंड का

देखा जाय तो राजनीतिक अस्थिरता और आयाराम गया राम की राजनीति के लिये बदनाम झारखंड से भी बुरा हाल 9 नवम्बर 2000 को जन्मे उत्तराखंड का है। झारखंड में शिब्बू सोरेन को जहां एक बार केवल 10 दिन के लिये मुख्यमंत्री पद मिला वहीं उत्तराखंड में वर्ष 2016 के अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान हरीश रावत 21 से लेकर 22 अप्रैल के बीच केवल एक दिन के लिये मुख्यमंत्री रहे। वह हाइकोर्ट से मिली राहत पर सुप्रीम कोर्ट के स्टे के कारण पुनः सत्ता से बाहर हो गये। उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी ( 2 मार्च 2002 से 7 मार्च 2007) के अलावा कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सका।

उत्तराखंड में 22 सालों में 14 बार मुख्यमंत्री आये

राज्य गठन के बाद इन 11 सालों में राज्य के मुख्यमंत्री की गद्दी पर अब तक 10 नेता आसीन हो चुके हैं। इनमें से भुवन चन्द्र खंडूड़ी भी पांच साल के अन्दर दो बार मुख्यमंत्री रहे और दोनों कार्यकाल मिलाने के बाद भी ( 2 साल 294 दिन) उन्होंने 3 साल पूरे नहीं किये। हरीश रावत को कुल कार्यकाल 1 फरबरी 2014 से 27 मार्च 2017 तक का मिला। असाधारण राजनीतिक घटनाक्रम के बाद 27 मार्च को राष्ट्रपति शासन लगने के कारण उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा।

नैनीताल हाइकोर्ट से राष्ट्रपति शासन के तौर तरीके को असंवैधानिक करार किये जाने के बाद हरीश रावत की कुर्सी बहाल हुयी तो विपक्षी भाजपा 22 अप्रैल को नैनीताल हाइकोर्ट के फसले के खिलाफ स्टे ऑडर ले आयी। लेकिन हरीश रावत अन्ततः सुप्रीम कोर्ट से जीत गये और उनकी कुर्सी 11 मई 2016 को बहाल हो गयी। इस तरह देखा जाय तो 10 नेताओं को उत्तराखंड ने 14वीं बार मुख्यमंत्री के रूप में देख लिया। जब कि 50 साल के पड़ोसी हिमाचल प्रदेश में डा.ॅ यशवन्त परमार से लेकर जयराम ठाकुर तक केवल 6 नेता मुख्यमंत्री बने हैं।

अवसरवाद और पदलोलुपता मिली जन्म के साथ

उत्तराखंड में राजनीतिक अस्थिरता की शुरूआत राज्य गठन के समय से ही तब हो गयी थी जब पार्टी नेतृत्व द्वारा नित्यानन्द स्वामी को राज्य का पहला मुख्यमंत्री घोषित किया गया। पार्टी के अन्दर विरोध के कारण अन्तरिम सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर स्वामी केवल 345 दिन ही राज कर सके। उनके बाद दूसरे अंतरिम मुख्यमंत्री भगतसिंह कोश्यारी को तो केवल 122 दिन ही मिले। खंडूड़ी के बाद भाजपा के ही रमेश पोखरियाल निशंक को 2 साल 75 दिन मिले जबकि कांग्रेस के विजय बहुगुणा 2 साल भी पूरे नहीं कर पाये। हरीश रावत गुट ने बुहुगुणा को 689 दिन में ही बाहर करा दिया। जिसका बदला बहुगुणा ने 16 मार्च 2016 को विधानसभा में हरीश रावत सरकार के खिलाफ विद्रोह करा कर लिया।

भाजपा ने दिये सर्वाधिक मुख्यमंत्री

उत्तराखंड में भाजपा ने सबसे अधिक मुख्यमंत्री बदले हैं जिनमें से तीरथ सिंह रावत (10 मार्च 2021 से 4 जुलाई 2021) को 116 दिन के अन्दर ही चलता कर दिया। भाजपा को अब तक प्रदेश में लगभग 13 साल शासन करने का मौका मिला है। उसे 2007 से लेकर 2012 तक और फिर 2017 से लेकर 2022 तक दो पूरे टर्म के अलावा डेढ़ साल अंतरिम सरकार चलाने का और वर्तमान में 8 महीने से भाजपा की ही सरकार है। इस तरह देखा जाय तो भाजपा ने इन लगभग 13 सालों में 8 मुख्यमंत्री उत्तराखंड को दिये हैं। जबकि कांग्रेस ने 10 साल में केवल तीन नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया है।

उत्तराखंड का इस राजनीतिक अस्थिरता की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। इससे राजनीति में नैतिकता का ह्रास होने के साथ ही अवसरवाद और पदलोलुपता को बढ़ावा मिला है। साथ ही कुर्सी बचाने के लिये सत्ताधरियों को अनैतिक के साथ ही भावनात्मक हथकंडे अपनाने पड़े। जिस कारण राज्य के असली मुद्दे गौण होते चले गये। भाई भतीजावाद और भ्रटाचार चरम पर पहुंचा मगर राज्य का लोकायुक्त विधानसभा की आल्मारी से बाहर नहीं निकला। जबकि जिसे समान नागरिक संहिता का उत्तराखंड में कोई औचित्य नहीं उसे लाने के लिये सरकार ने जान लगा दी। कुर्सी बचाने के लिये राज्य के संसाधनों का भी दुरुपयोग हुआ जिस कारण राज्य तो कर्ज तले डूबता गया मगर संधाधन फिर भी विकास के काम नहीं आये।

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