वीआईपी कल्चर न छोड़ने वाले नेताओं, अफसरों और रसूखदारों के लिए पहाड़ के दो बेटों ने सादगी का ऐसा उदाहरण पेश किया है, जिसकी इन दिनों खासी चर्चा हो रही है। केंद्र शासित प्रदेश अंडमान-निकोबार के उप राज्यपाल पद की जिम्मेदारी संभालने के लिए पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल डीके जोशी खुद अपनी कार ड्राइव कर रानीखेत से दिल्ली पहुंचे। एडमिरल जोशी को लेने के लिए साउथ अंडमान के डीएसपी और एडीजीसी निशांत गुप्ता रानीखेत पहुंचे थे। लेकिन जोशी की सादगी का अंदाजा इसी बात से लगता है कि उनकी कार में कहीं भी कोई लाल-नीली बत्ती, स्टीकर, निशान और नेम प्लेट नहीं लगी थी। एडीजीसी निशांत गुप्ता भी बिना बत्ती वाली एंबेसडर कार में साथ चल रहे थे। जोशी का पहनावा भी उन्हें सबसे जुदा कर रहा था। बेहद आम व्यक्ति की तरह जोशी ने लेदर की सैंडल, हाफ शर्ट पहन रखी थी। अलबत्ता ड्राइविंग करते वक्त वह सीट बेल्ट पहने जरूर नजर आए।

इसी तरह की रेलवे बोर्ड के नए चेयरमैन अश्विनी लोहानी ने भी पदभार संभालते ही अपने इरादे स्पष्ट कर दिए। लोहानी ने रेल मंत्रालय के कामकाज में सुधार के लिए कर्मचारियों को अनुशासित करने के लिए अपरंपरागत मार्ग अपनाया है। उन्होंने मंत्रालय के अधिकारियों को साफ कर दिया है कि सिस्टम में पर्याप्त बदलाव लाने के लिए ‘वीआईपी संस्कृति’ को रोकना होगा। सभी रेलवे अधिकारियों के उपहार स्वीकार करने पर सख्त प्रतिबंध होगा और साथ ही उन्हें अनावश्यक प्रोटोकॉल को छोड़ने के लिए कहा गया है।
हाल ही में रेलवे में शामिल हुए युवा अधिकारियों को बोर्ड के नए चेयरमैन लोहानी ने सलाह दी कि अगर वो रेलवे को स्वच्छ और कचरा-मुक्त बनाने की इच्छा रखते हैं तो अपनी मेज और कार्यालयों को सुव्यवस्थित रखें। उन्होंने डीआरएम को सभी कर्मचारियों को बराबर मानने और ग्राउंड स्टाफ के हर सुझाव पर ध्यान देने का निर्देश दिया है। वीआईपी संस्कृति को खत्म करने के लिए लोहानी ने रेल भवन में वरिष्ठ अधिकारियों के कक्षों से नेम प्लेटें हटाने का आदेश दिया है।
उधर, अंडमान-निकोबार के नए लेफ्टिनेंट गर्वनर एडमिरल डीके जोशी को इससे पहले, इसी वर्ष नवगठित द्वीप विकास एजेंसी (आईडीए) का उपाध्यक्ष बनाया गया था। आईडीए का उद्देश्य देश की सुरक्षा चिंताओं को दूर करते हुए द्वीपों की प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणाली की रक्षा करने के साथ-साथ भारत के समुद्र के निकट अर्थव्यवस्था का विकास करना है। एडमिरल जोशी ने 01 अप्रैल 1974 को भारतीय नौसेना की एक्जीाक्यूटिव ब्रांच में कमीशन प्राप्त किया था। लगभग 38 वर्ष के अपने लंबे सेवाकाल में उन्होंने विभिन्न कमान, कर्मचारी और निर्देशात्मक पदों पर अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने सिंगापुर में भारतीय उच्चायोग में 1996 से 1999 के दौरान रक्षा सलाहकार के रूप में भी काम किया।
वहीं, लोहानी ने कानपुर में इंटर की पढ़ाई करने के बाद मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिकल और टेलीकम्युनिकेशन में डिग्री हासिल कर अपना नाम लिम्का बुक में दर्ज किया। लोहानी का नाम पहली बार तब सुर्खियों में आया जब उन्होंने ने आईटीडीसी में अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक का पद संभाला और मुंबई के सेंटूर होटल को घाटे से उबार लिया। किताबें लिखने और पढ़ने के शौकीन लोहानी को विश्व के सबसे पुराने भाप लोकोमोटिव इंजन फेयरी क्वीन को फिर से पटरी पर लाने का श्रेय जाता है। रेलवे बोर्ड के चेयरमैन बनाए जाने के पहले लोहानी एयर इंडिया के चेयरमैन और सीएमडी रहे।
बहुत कम लोग जानते हैं कि सादगी भरा जीवन बिताने में यकीन करने वाले लोहानी एक बेहतरीन लेखक भी हैं। उन्होंने ‘स्मोकिंग ब्यूटीज’ और ‘विनिंग एट वर्क अगेंस्ट आॅल आॅड्स’ नाम की दो किताबें भी लिखी हैं। उन्हें रेलवे और पर्यटन मंत्रालय से दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।


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