– जयसिंह रावत, देहरादून
जोशीमठ आपदा को लेकर उत्तराखंड सरकार पहले तो समय से जागी नहीं और जोशीमठ के धंसने की गति तेज होने पर जागी भी तो आपदा पीड़ितों के मुआवजे और पुनर्वास को लेकर फिर स्लीपिंग मोड पर चली गयी। यही नहीं जोशीमठ में कहीं-कहीं अब भी नयी दरारें देखी जा रही हैं, एक-दो जगहों पर दरारें चौड़ी होने की भी सूचनाएं आ रही हैं और सरकार का दावा है कि वहां सब कुछ सामान्य चल रहा है। सरकार का यह भी दावा है कि मारवाड़ी क्षेत्र में हो रहे मटमैले पानी का रिसाव बहुत कम होने से खतरा टल गया है। जबकि 1976 में मिश्रा कमेटी ने भी मटमैले पानी के रिसाव का उल्लेख किया था। जाहिर है कि वह रिसाव कम-ज्यादा या फिर बंद होता रहता है। बरसात के चार महीने रह गये हैं। असली चिन्ता तो बरसात की ही है।

वैसे भी अभी तक यह पता नहीं किया गया कि जोशीमठ में पानी की प्रति व्यक्ति खपत कितनी है और उसमें से नहाने और कपड़े धोने आदि से उपयोग किया हुआ कितना पानी सोकपिट के माध्यम से जमीन के अन्दर जा रहा है? जब तक वह सीवरेज का पानी जमीन के अन्दर जाने से नहीं रोका जाता तब तक कैसे कहा जा सकता कि भूमिगत जल रिसाव समाप्त हो गया। जोशीमठ के लोग पिछले 14 महीनों से किसी अनिष्ट की आशंका से डरे हुये थे। स्थानीय लोगों की इसी आशंका के दृष्टिगत राज्य सरकार ने 5 विशेषज्ञ संस्थानों से पिछले साल जुलाई में जोशीमठ की स्थिति का आंकलन कराया था और उसे विशेषज्ञ दल ने पहले ही जोशीमठ के खतरे से सरकार को अवगत करा दिया था। लेकिन सरकार विशेषज्ञों रिपोर्ट पर ध्यान देने के बजाय कामन सिविल कोड और और धर्मान्तरण कानून पर ध्यान केन्द्रित किया।

जोशीमठ भूधंसाव का संकट शुरू हुये एक महीने से अधिक हो गये। सरकार ने दरारों वाले लगभग 863 मकानों पर लाल निशान लगाये हुये हैं। मगर केवल 181 को ही असुरक्षित बताया जा रहा है। सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र गांधीनगर, सिंहधार, मनोहरबाग और रविग्राम बताये गये हैं। दरारें कुल 9 कालोनियों में दर्ज हुयी हैं। लेकिन सरकारी तौर पर अब तक केवल गांधीनगर वार्ड-1, सिंहधार वार्ड संख्या-4, मनोहरबाग वार्ड संख्या-5 और सुनील वार्ड संख्या 7 ही असुरक्षित घोषित किये गये है।
कुछ लोगों को शिकायत है कि उनके मकानों पर लाल निशान तो लगा दिये मगर उनसे मकान खाली नहीं कराये गये। अगर मकान असुरक्षित नहीं तो फिर मकानों पर क्रास के लाल निशान क्यों लगा दिये। सरकार अभी तक तय नहीं कर पायी कि जोशीमठ में कितने भवन पूर्ण या आंशिक क्षतिग्रस्त हैं। लोगों को इसी आधार पर मुआवजा दिया जाना है और उसी आधार पर पुनर्वास भी होना है। दरारों की लम्बाई चौड़ाई के हिसाब से मुआवजा नहीं दिया जाता। वैसे सामान्य सी बात है कि जिन भवनों के नीचे जमीन खिसक या धंस रही हो वे कैसे सुरक्षित हो सकते हैं। जाहिर है कि जिन मकानों पर दरारें कम भी प्रकट हुयी हैं उनके नीचे की जमीन स्थिर नहीं है।

जोशीमठ का भूध्ांसाव नया तो नहीं है मगर इसका भयावह रूप नये साल के शुरू होते ही सामने प्रकट हो गया था। तब से लेकर अब तक 243 परिवारों के 878 सदस्यों को विभिन्न राहत शिविरों में रखा गया है। ये राहत शिविर सरकारी गेस्ट हाउसों, होटलों, धर्मशालाओं, स्कूल कालेजों और नगर पालिका मिलन केन्द्रों में बनाये गये हैं। प्रभावितों में से 53 परिवारों के 117 सदस्य अपनी व्यवस्था पर रिश्तेदारों या किराये के मकानों पर चले गये है। प्रभावितों के लिये जोशीमठ के अन्दर कुल 91 भवन और होटल तथा जोशीमठ से बाहर पीपलकोटी में 20 होटल आदि चिन्हित किये गये हैं।
सवाल यह उठ रहा है कि आपदा के प्रकट होने के बाद एक माह से अधिक का समय गुजर गया और राज्य एवं केन्द्र सरकारें आपदा पीड़ितों को मुआवजा और उनके पुनर्वास को लेकर अभी भी अनिर्णय की स्थिति में है। सरकार का धन होटलों और अन्यत्र चल रहे राहत शिविरों पर ही खर्च हो रहा है।
एनडीएमए के नियमों के अनुसार ऐसे शिविर ज्यादा से ज्यादा 60 दिन तक ही चलाये जा सकते हैं और एक महीना वैसे ही निकल गया। राज्य सरकार दावा कर रही है कि जोशीमठ के लिये अब तक का सबसे बेहतर पुनर्वास और मुआवजा पैकेज बन रहा है। लेकिन वह सबसे बेहतर पैकेज जोशीमठ में कब उतरेगा, उसका अभी कोई पता नहीं है। राष्ट्रीय आपदा प्राधिकरण (एनडीएमए) को इस सम्बन्ध में गत 4 फरवरी को निर्णय लेना था लेकिन उस दिन बैठक टल गयी। अब 10 फरवरी को एनडीएमए की बैठक हुयी तो उसमें कोई फैसला नहीं हो सका। अब बताया जा रहा है कि उत्तराखंड की 15 फरवरी को होने वाली केबिनेट बैठक में पैकेज के प्रस्ताव को अंतिम रूप देकर केन्द्र सरकार को भेजा जायेगा। लेकिन लगता नहीं कि राज्य सरकार 15 फरवरी तक भी कोई ठोस निर्णय ले पायेगी।

दरअसल मुआवजा और पुनर्वास पैकेज का सारा दारोमदार एनडीएमए पर निर्भर है। एनडीएमए चाहती है कि जोशीमठ का उसकी संवेदनशीलता के हिसाब से जोनेशन कर बचाव और पुनर्वास का पैकेज तैयार किया जाय। लेकिन अब तक राज्य सरकार ने आपदाग्रस्त क्षेत्र का बेस मैप तक नहीं बनवाया। जबकि नक्शे बनाने वाला देश का संस्थान सर्वे ऑफ इंडिया का मुख्यालय देहरादून में ही है। एनडीएमए की बैठक के बाद सर्वे ऑफ इंडिया से नक्शा बनाने को अब कहा गया है। जबकि इस काम को काफी पहले करा दिया जाना चाहिये था। इस काम में राज्य सरकार ने अपने अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र का भी उपयोग नहीं किया। प्रशासन द्वारा पहले पीपलकोटी में विस्थापितों की कालोनी बसाने का ऐलान किया था। जब वहां विरोध शुरू हुआ तो इरादा बदल गया। अब ढाक में प्रभावित परिवारों को बसाने की बात चल रही है लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ढाक भी सुरक्षित जगह नहीं है। यह जगह 1970 की अलकनन्दा की बाकी चपेट में आ चुकी है।
मुआवजा केन्द्र सरकार के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के नियमों के हिसाब से ही बंटना है और वे नियम घावों पर नमक छिड़़कने के जैसे ही है। यहां सवाल केवल सम्पत्ति की क्षति का नहीं बल्कि आजीविका की क्षति का भी है। सवाल लोगों के जीवन और उनके सपनों के बिखरने का भी है। एनडीएमए के नियमों के अनुसार इस तरह की आपदा की स्थिति में केवल आवासीय भवनों, घरेलू सामान के नुकसान, खेतों और बगीचों के नुकसान आदि के लिये ही मुआवजे का प्रावधान है। इसमें होटल, दुकान या किसी भी आर्थिक गतिविधि वाले व्यावसायिक केन्द्र के नुकसान के लिये मुआवजा देने का प्रावधान नहीं है। एनडीएमए के नियमों में स्पष्ट किया गया है कि व्यावसायिक गतिविधियों वाले केन्द्र को मुआवजे से बाहर रखा गया है। यह प्रावधान सभवतः इन्स्यौरेंश की व्यवस्था के कारण रखा गया है। जबकि जोशीमठ बदरीनाथ यात्रा का बेस होने के साथ ही पर्यटन और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के कारण एक प्रमुख व्यावसायिक केन्द्र है। वहां कई मंजिले होटलों के अलावा लोगों ने यात्रा सीजन में भीड़ को देखते हुये घरों पर ही यात्रियों के ठहरने के लिये कमरे बनाये हुये है। छोटे दुकानदारों, ढाबों और खोमचों का कोई बीमा नहीं है।


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