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बदरीनाथ-केदारनाथ के पारंपरिक मार्गों की तलाश

773 (601) Southside of temple, Kedarnath, Garhwal, Griesbach 1882.

राज्य में साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखंड पुलिस की ये कोशिश एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। लेकिन इन पारंपरिक रास्तों को फिर से दुरुस्त करना, उन्हें बनाये रखना, उन रास्तों पर यात्रियों के लिए सुविधाएं जुटाना आसान नहीं होगा।

राजेश डोबरियाल, देहरादून

राज्य में चार धाम यात्रा के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए ऑल वेदर रोड तो बनाई ही जा रही है। इसके साथ ही बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाले उन पारंपरिक मार्गों की तलाश का काम भी किया गया, जिस पर कभी हमारे पूर्वज आवाजाही किया करते थे। तब इन्हीं पारंपरिक मार्गों से चार धाम यात्रा संभव थी। आस्था के साथ साहसिक पर्यटन के रोमांच का अनुभव लेने वाले पर्यटकों के लिए इन मार्गों की फिर से तलाश की गई। ताकि इस पर ट्रैकिंग का रूट विकसित किया जा सके। साथ ही बद्रीनाथ और केदारनाथ तक पहुंचने की वैकल्पिक व्यवस्था भी की जा सके।

समय के साथ पीछे छूट गये इन रास्तों की तलाश के लिए उत्तराखंड पुलिस की एसडीआरएफ टीम ने चार धाम यात्रा शुरू होने से पहले इस अभियान का जिम्मा उठाया। 20 अप्रैल को वे ऋषिकेश से बद्रीनाथ और केदारनाथ के पैदल मार्गों की तलाश के लिए रवाना हुए। एसडीआरएफ की 15 सदस्यीय टीम ने ऋषिकेश से बद्रीनाथ तक पैदल 370 किलोमीटर तक का सफ़र तय किया। रुद्रप्रयाग में टीम दो हिस्सों में बंट गई। एक टुकडी बद्रीनाथ के रास्ते पर निकल गई और दूसरी केदारनाथ के रास्ते पर। ऋषिकेश से केदारनाथ तक का सफ़र 315 किलोमीटर का था। पारंपरिक मार्गों का सर्वेक्षण, तलाश, रास्ते में पड़ने वाले गांवों में लोगों से मुलाकात कर ये टीम 13 मई को वापस देहरादून पहुंची।

वर्ष 1945-50 तक लोग इन पारंपरिक रास्तों पर चलते थे। फिर जैसे-जैसे सड़कें बनती गई, वे रास्ते छूटते गए। साथ ही सड़क निर्माण के दौरान जो मलबा गिरा, उससे भी रास्ते बंद हो गए। फिलहाल बद्रीनाथ तक का करीब 100-102 किलोमीटर का पारंपरिक रूट बचा हुआ है, जबकि केदारनाथ का 70 किलोमीटर का रास्ता बचा हुआ है।

– इंस्पेक्टर संजय उप्रेती, एसडीआरएफ की टीम के लीडर

बद्रीनाथ-केदारनाथ के पैदल पारंपरिक मार्गों की तलाश में निकली एसडीआरएफ टीम की अगुवाई इंस्पेक्टर संजय उप्रेती ने की। इन मार्गों पर सफ़र के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वर्ष 1945-50 तक लोग उन पारंपरिक रास्तों पर चलते थे। फिर जैसे-जैसे सड़कें बनती गई, वे रास्ते छूटते गए। साथ ही सड़क निर्माण के दौरान जो मलबा गिरा, उससे भी वे रास्ते बंद हो गए। उप्रेती बताते हैं कि फिलहाल बद्रीनाथ तक का करीब 100-102 किलोमीटर का पारंपरिक रूट बचा हुआ है। जबकि केदारनाथ का 70 किलोमीटर का रास्ता बचा हुआ है। रुद्रप्रयाग से एसडीआरएफ टीम दो हिस्सों में बंट गई थी। इंस्पेक्टर उप्रेती की अगुवाई में एक जत्था बद्रीनाथ के पैदल मार्ग पर रवाना हुआ। जबकि दूसरा जत्था एसडीआरएफ के रोशन कोठारी की अगुवाई में केदारनाथ मार्ग पर गया।

संजय उप्रेती ने बताया कि उन्होंने ऋषिकेश से 370 किलोमीटर तक का सफ़र तय किया। कई बार वे सड़क पर आए, कई बार जंगलों और नदी के किनारों पर सफ़र किया। हमें महसूस हुआ कि पारंपरिक रास्ता बहुत बढ़िया बनाया गया था। ये आरामदेह था। समय के साथ विलुप्त हो जाने की वजह से अब इन रास्तों पर ठहरने के लिए कोई शेल्टर नहीं है। उप्रेती बताते हैं कि पुराने जमाने में चट्टियां हुआ करती थी। बाबा लोग मणि में रुकते थे और गृहस्थ लोग चट्टियों में रुकते थे। इस तरह हर 6 किलोमीटर की दूरी पर एक चट्टी हुआ करती थी। पूरा रास्ता इस तरह से बनाया गया था कि हर 6 किलोमीटर की दूरी पर ठहरने के साथ ही, भोजन-पानी का इंतज़ाम होता था। लेकिन अब ये सारी चीजें नहीं रहीं। वे बताते हैं कि इस मार्ग पर बहुत से गांव मिले, जो पहले अपने पारंपरिक खाने के लिए जाने जाते थे और यात्रा के दौरान वे यात्रियों को भोजन मुहैया कराते थे। जैसे कोई गांव दूध का मावा बनाता था। कोई गांव केले की खेती किया करता था। वे बताते हैं कि पारंपरिक रास्ते ऐसे बनाये गये थे, कि पहाड़ों में ये पानी के प्राकृतिक स्रोतों के पास से गुजरते थे, जहां पानी नहीं होता था तो रास्ता नदी के पास से होकर जाता है। टीम ने इन रास्तों का पूरा नक्शा तैयार किया है। इसके लिए जीपीएस की भी मदद भी ली है।

इन रास्तों की तलाश के लिए एसडीआरएफ की टीम रास्ते में पड़ने वाले गांवों के बुजुर्गों से बात करती थी। क्योंकि उनके पास इस रास्ते की तलाश के लिए और कोई दूसरा विकल्प नहीं था। संजय उप्रेती कहते हैं कि गांव के बुजुर्गों से बात की। जो उस समय बच्चे रहे होंगे। हम रोज शाम को उनके पास जाकर बैठते थे। वे हमें बताते थे कि कैसे जाना है। उन्हीं के साथ हम अगले दिन की यात्रा की योजना बनाते थे। उन्होंने बताया कि पैदल सफ़र के दौरान हमारे साथ मैट्रेस, स्लीपिंग बैग, ड्राइ फ्रूट्स जैसी चीजें होती थीं। जब हम ऑफ ट्रैक होते थे, तो ये चीजें अपने पास रखते थे, टेंट रखते थे। हमारा रहना ज्यादातर गांव के मंदिरों या स्कूलों में होता था। यात्रा के लिए वे सुबह करीब 5 बजे निकल पड़ते थे और 3 बजे तक वापस स्कूल पहुंच जाते थे।

एसडीआरएफ के इंस्पेक्टर संजय उप्रेती ने बताया कि ऋषिकेश से बद्रीनाथ-केदारनाथ की पैदल यात्रा में पूरे 18 दिन लगे। उनके मुताबिक ये सफ़र 12 दिनों में तय किया जा सकता है। चूंकि उन्हें रास्ते पता नहीं थे, वे समय के साथ खो चुके रास्ते की तलाश कर रहे थे, कई बार भटक भी गए, गलत रास्तों पर चले गए, कई बार पांरपरिक रास्तों पर भूस्खलन था, तो वहां से जा नहीं पाए, इसलिए उन्हें इतना समय लगा। टीम ने इसके साथ ही उन पौराणिक मंदिरों को भी ढूंढ़ा है जो अब खंडहर में तब्दील हो गए हैं, जहां अब कोई आता-जाता नहीं।

रुद्रप्रयाग से केदारनाथ पैदल मार्ग की तलाश में निकले एसडीआरएफ के लीडिंग फायरमैन रोशन कोठारी कहते हैं कि हमारे लिए भी ये नया टास्क था। हालांकि हम फोर्स वाले हैं, तो हमें ज्यादा दिक्कत नहीं आई। लेकिन जो रास्ते 50-60 वर्ष पहले बंद हो चुके हैं, उस पर सफ़र करना आसान तो नहीं था। वे बताते हैं कि पूरे मार्ग में जगह-जगह झाड़ियां उग आई हैं। कहीं पर रास्ता टूट गया है। उसकी मेन्टेनेंस नहीं है। वे कहते हैं कि सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि पलायन की वजह से गांव खाली हो गए हैं। ये पारंपरिक रास्ते इन्हीं गांवों से होकर गुज़रते थे। गांवों में लोग रहते तो वे इन रास्तों पर आवाजाही करते और रास्ता दुरुस्त रहता। लेकिन फिलहाल पलायन के चलते ये रास्ते ज्यादातर जगह टूट- फूट गये हैं। कई जगह प्राकृतिक आपदा और बादल फटने की वजह से भी रास्ते खत्म हो गए हैं। तो कहीं सड़क बन गई तो पैदल मार्ग उन सड़क में दब गये। कोठारी के मुताबिक 60 फीसदी रास्ता अभी बचा हुआ है। इसे ट्रैकिंग के लिये तैयार तो किया जा सकता है। लेकिन यदि उस पर आवाजाही नहीं हुई, तो दो-चार साल बाद वो फिर खंडहर हो जाएगा।

एसडीआरएफ के रोशन कोठारी कहते हैं कि पारंपरिक मार्गों की तलाश का हमारा अनुभव बहुत अच्छा रहा। इस तरह हमें भी अपने लोक संस्कृति को जानने और समझने का मौका मिला। हमें लगा कि हम वाकई देवभूमि में रह रहे हैं। वे कहते हैं कि आज के समय में अच्छी सुविधाओं और अच्छी सड़कों से गुजरते हुए, ये सोचकर अजीब लगता है कि पहले के समय लोग कैसे आवाजाही किया करते थे।

बद्रीनाथ-केदारनाथ के पारंपरिक पैदल मार्ग हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं से शुरू होकर, मध्य हिमालय और फिर ग्रेटर हिमालय में जाकर खत्म होते हैं। इस दौरान यात्री को हर तरह का अनुभव मिलता है। कभी वे झाड़ियों से गुजरते हैं, कभी नदी किनारे जा रहे होते हैं, कभी हाई एल्टीट्यूड में जाते हैं, फिर लो एल्टीट्यूड में आ आ जाते हैं। रोशन कोटारी की टीम को रुद्रप्रयाग से केदारनाथ में के सफ़र में 8 से 9 दिन लग गए। कोठारी कहते हैं क्योंकि हम यात्रा के साथ सर्वे भी कर रहे थे। गांव में जाकर लोगों से बात कर रहे थे। उनकी संस्कृति के बारे में जानकारी ले रहे थे। यदि कोई पर्यटक इन रास्तों से गुजरेगा तो ये सफ़र 6-7 दिनों में भी पूरा हो सकता है।

राज्य में साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखंड पुलिस के जवानों की ये कोशिश एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। लेकिन इन पारंपरिक रास्तों को फिर से दुरुस्त करना, उन्हें बनाये रखना, उन रास्तों पर यात्रियों के लिए सुविधाएं जुटाना आसान नहीं होगा। यदि इन रास्तों के ईर्द-गिर्द बसे गांव आबाद होते, तो ये काम इतना मुश्किल नहीं होता। लेकिन बची-खुची आबादी को सहेजने के लिए और पर्यटन के ज़रिये रोजगार दिलाने के मकसद से ये सोच कामयाब हो सकती है। हालांकि अभी इन रास्तों पर लंबा सफ़र तय करना है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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