Tuesday , 15 September 2026
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मानव–पशु संघर्ष पर ठोस नीति और क्षेत्रीय समाधान जरूरी: त्रिवेन्द्र सिंह रावत

उत्तराखंड सहित हिमालयी राज्यों में बढ़ते मानव–पशु संघर्ष को लेकर चिंता जताते हुए हरिद्वार सांसद एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा है कि यह समस्या अब केवल वन्यजीव संरक्षण का विषय नहीं रह गई है, बल्कि जनसुरक्षा, आजीविका और क्षेत्रीय विकास से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। उन्होंने इस दिशा में ठोस, वैज्ञानिक और क्षेत्र-विशिष्ट नीति तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया।

यह बात उन्होंने केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति की बैठक में कही। बैठक में समिति के सदस्यों, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और संबंधित विभागों के प्रतिनिधियों ने सहभागिता की।

बैठक के दौरान सांसद त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में जंगली पशुओं का आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ता पलायन गंभीर चिंता का विषय है। इसके परिणामस्वरूप मानव जीवन, कृषि, संपत्ति और वन्यजीव—सभी प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मानव–पशु संघर्ष की बढ़ती घटनाएं यह संकेत देती हैं कि मौजूदा व्यवस्थाएं अब पर्याप्त नहीं रह गई हैं।

उन्होंने सुझाव दिया कि संवेदनशील और संघर्ष-प्रवण क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाए, ताकि यह स्पष्ट रूप से समझा जा सके कि किन कारणों से वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास छोड़कर मानव बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं। इन कारणों में वनों का क्षरण, भोजन एवं जल स्रोतों की कमी, अवैज्ञानिक विकास गतिविधियां और पारंपरिक वन्यजीव गलियारों में बाधाएं प्रमुख हैं।

सांसद रावत ने विशेष रूप से हरिद्वार क्षेत्र में रेल दुर्घटनाओं के कारण हाथियों की हो रही मौतों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह केवल एक वन्यजीव संरक्षण का मामला नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता और प्रशासनिक समन्वय की भी परीक्षा है। उन्होंने रेल और वन विभागों के बीच बेहतर समन्वय, प्रभावी चेतावनी तंत्र, ट्रेनों की गति नियंत्रण व्यवस्था और आवश्यक संरचनात्मक उपायों को तत्काल सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

इसके साथ ही उन्होंने लच्छीवाला क्षेत्र में एलिफैंट कॉरिडोर से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए कहा कि वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। यदि प्राकृतिक गलियारों को सुरक्षित नहीं किया गया, तो संघर्ष की घटनाएं और अधिक बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।

बैठक में मानव–पशु संघर्ष से निपटने के लिए समन्वित नीति, स्थानीय समुदायों की सहभागिता, आधुनिक तकनीकी हस्तक्षेप और दीर्घकालिक रणनीति पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया। इस दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि स्थानीय लोगों को समाधान प्रक्रिया का हिस्सा बनाए बिना किसी भी नीति की सफलता सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने बैठक में उठाए गए सुझावों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मानव–पशु संघर्ष एक जटिल चुनौती है, जिसके लिए केंद्र और राज्यों को मिलकर कार्य करना होगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि मंत्रालय इस दिशा में व्यावहारिक और टिकाऊ समाधान विकसित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।

इस बैठक में समिति के अन्य सदस्यगण एवं पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

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Hill Mail

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